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Wednesday, November 16, 2022

जो बाहर वह भीतर भी है

जैसे एक दुनिया बाहर है, हमारे भीतर भी एक संसार है. स्वप्नों में हमारा मन जिन लोकों में विचरता है, वह अवचेतन का जगत है. ध्यान में योगी इस जगत को अपने भीतर देख लेते हैं. आत्मा को इन्द्रियों की जरूरत नहीं है, वह आँखों के बिना भी देख सकती है, कानों के बिना सुन सकती है, इसी तरह सूँघने, चखने व स्पर्श का अनुभव भी कर सकती है. हमारा जीवन कई आयामों पर एक साथ चल रहा है. देह के भीतर न जाने कितने प्रकार के जीवाणु हैं, जिनके जीवन और मृत्यु पर हमारा जीवन टिका है. सूक्ष्म कोशिकाएं हैं, जिनमें से हर एक स्वयं में पूर्ण है तथा अन्य कोशिकाओं से संयुक्त भी है. एक तरह की कोशिकाएं मिलकर ऊतक बनाती हैं, जिनसे अंग बनते हैं, वे अंग फिर एक तरह का संस्थान बनाते हैं. जिसे चलाने के लिए कुशलता व बुद्धि की आवश्यकता है, जो उनमें ही विद्यमान है. वह बुद्धिमत्ता उनमें ईश्वर द्वारा प्रदत्त ही मानी जा सकती है. हमारे प्राण शरीर को भी हम कितना कम जानते हैं. शरीर में होने वाली सब गतियां इन्हीं के कारण होती हैं. भोजन का पाचन, रक्त का परवाह, छींक आना, पलकों का झपकना आदि सभी क्रियाएं प्राणों के कारण हो रही हैं. मन के तल पर तो मनुष्य के पास अनंत स्मृतियों का ख़ज़ाना है, न जाने वह कितने जन्मों की यात्रा करके आया है, जिनकी स्मृति भीतर क़ैद है। ज्ञान का एक अनंत भंडार भी हमारे विज्ञान मय कोश में है, जिसके पार आनन्दमय कोश है।इसलिए कहा गया है यथा पिंडे, तथा ब्रह्मांडे ! 


Wednesday, September 13, 2017

विस्मय से जब मन भर जाये

१३ सितम्बर २०१७ 
जीवन में कदम-कदम पर हमें कितनी ही आश्चर्यजनक स्थितियों का अनुभव होता है पर ज्यादातर हम उनका कोई न कोई उत्तर खोज कर मन को शांत कर देते हैं. विज्ञान के द्वारा जगत के कार्यकलापों का कारण खोजने लगते हैं. एक ऐसा आश्चर्य जिसका कोई निराकरण न हो सके विस्मय कहलाता है, और गहराई से देखें तो इस जगत का एक नन्हा सा रेत का कण भी मन को विस्मय से भर देने के लिए पर्याप्त है. हमारी देह की एक कोशिका भी अपने भीतर कितने रहस्य छिपाए है. विज्ञान के जवाब हमें भ्रमित करते हैं, ऐसा लगता है हम इसके बारे में सब जान सकते हैं. नींद भी एक रहस्य है और स्वप्न भी. चारों तरफ जैसे एक तिलिस्म छाया है. विस्मय से भरा मन ही फिर उस अज्ञात के सामने झुक जाता है. वह भी जैसे उस रहस्य का ही एक भाग बन जाता है.