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Wednesday, September 13, 2017

विस्मय से जब मन भर जाये

१३ सितम्बर २०१७ 
जीवन में कदम-कदम पर हमें कितनी ही आश्चर्यजनक स्थितियों का अनुभव होता है पर ज्यादातर हम उनका कोई न कोई उत्तर खोज कर मन को शांत कर देते हैं. विज्ञान के द्वारा जगत के कार्यकलापों का कारण खोजने लगते हैं. एक ऐसा आश्चर्य जिसका कोई निराकरण न हो सके विस्मय कहलाता है, और गहराई से देखें तो इस जगत का एक नन्हा सा रेत का कण भी मन को विस्मय से भर देने के लिए पर्याप्त है. हमारी देह की एक कोशिका भी अपने भीतर कितने रहस्य छिपाए है. विज्ञान के जवाब हमें भ्रमित करते हैं, ऐसा लगता है हम इसके बारे में सब जान सकते हैं. नींद भी एक रहस्य है और स्वप्न भी. चारों तरफ जैसे एक तिलिस्म छाया है. विस्मय से भरा मन ही फिर उस अज्ञात के सामने झुक जाता है. वह भी जैसे उस रहस्य का ही एक भाग बन जाता है.

Wednesday, June 14, 2017

कभी छुप न सकेगा परमात्मा

१५ जून २०१७ 
परमात्मा से हमारा मिलन क्यों नहीं होता, इसका सबसे बड़ा कारण है हमारी नकारात्मकता. परमात्मा सकारात्मकता का पुंज है. जैसे प्रकाश का अँधेरे से मिलन नहीं हो सकता वैसे ही परमात्मा का द्वेषपूर्ण मन से मिलन नहीं हो सकता. रेत और चीनी के कण कभी नहीं मिलते, मगर जल और चीनी मिल सकते हैं, ऐसे ही आत्मा व परमात्मा मिल सकते हैं, मन और परमात्मा नहीं. मन आत्मा के सागर पर उठी लहरों का ही नाम है, कुछ पल के लिए मन यदि शांत हो जाये तो परमात्मा की शांति का अनुभव हमें होता है. ध्यान, साधना के द्वारा जब हम मन को नकारात्मकता से मुक्त करते हैं, हमारे भीतर परमात्मा का सूर्य जगमगाने लगता है. 

Wednesday, September 11, 2013

प्रेम से प्रकट होए मैं जाना

फरवरी २००५ 
साधक को आत्म-वीक्षण की जरूरत है, आत्म-परीक्षण की नहीं, हमें अपने मन को संशय में नहीं डालना है, जो मन से परे है उसे मन से नहीं जाना जा सकता. जब भीतर मन ध्यानस्थ होने लगता है तो रस प्रकट होता है और तब अहंकार को ठहरने के लिए कोई स्थान नहीं रह जाता, अहंकार का भोजन दुःख है, प्रेमपूर्ण होने से वह स्वतः ही गिरने लगता है. और जहाँ सुख हो वहीं शांन्ति है, तब सारा जगत अपना ही विस्तार लगता है, रेत के कण से लेकर तारागण तक सभी कुछ. तब उस परमात्मा से मिलने की प्यास जगती है जिसने इतना सारा प्रेम भीतर भर दिया है, तब उससे दूरी सही नहीं जाती.

Monday, August 27, 2012

प्रेम गली अति सांकरी


जुलाई २००३ 
चींटी को अगर हिमालय जितना विशाल मिश्री का पहाड़  मिल जाये तो वह उसका कितना अनुभव कर सकती है? उसी तरह उस परमात्मा का बखान हमारी अल्प मति कितना कर सकती है.? वह अनंत है उसे जानने के लिए किये हमारे सारे प्रयत्न विफल हो जाते हैं. उसकी कृपा सदा ही बरस रही है, हमने अहंकार का छाता लगा लिया है जिसके कारण वह हमें छूती ही नहीं. पर जब उसकी कृपा को हम महसूस करते हैं, तब वह हमारे भीतर शक्ति देता है, मोक्ष की इच्छा को जन्म देता है. वह हमारे मन को हर लेता है, वह ज्ञान की कुंजी देता है. उसने हमें अपने समान बनाया है, हमारे भीतर ज्ञान, प्रेम और ऊर्जा का अनंत स्रोत उसने दिया है. नश्वर सम्बन्ध बनाकर हम उस भूले रहते हैं और जीवन समाप्त हो जाता है. रेत की दीवारों पर खड़ा यह जगत हमें सदा खुद से मिलने में बाधा बना रहता है. उसके और खुद के मिलने में कोई अंतर नहीं है. उसके घर का रास्ता खुद से होकर ही जाता है और जब वहाँ से साधक लौटता है तो दो नहीं होते, एक ही रहता है.