आगे नारद जी कहते हैं, कर्म और ज्ञान से भक्ति श्रेष्ठ है क्योंकि वह दोनों में ओतप्रोत है. भक्ति कर्म का भी आधार है. कर्मयोगी अति संवेदनशील होता है.. कर्म के आरंभ में निष्ठा के रूप में भक्ति है, कर्म करते समय आनंद के रूप में भक्ति है और कर्म का लक्ष्य यदि शांति है तो उस रूप में भी भक्ति का अनुभव ही कर्मयोगी करता है. इसी तरह जिस विषय के प्रति लगाव नहीं है उसका ज्ञान भी कैसे प्राप्त करेंगे. ज्ञान में रूचि के रूप में भक्ति है. जिस ज्ञान से हम विस्मित नहीं होते, वह ज्ञान भी ज्ञान नहीं है, विस्मय आनंद देता है, इसलिए ज्ञान के लक्ष्य पर भी भक्ति है. भक्ति के बिना ज्ञान अंधा हो जाता है, कर्म लँगड़ा हो जाता है.
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Friday, June 19, 2020
Thursday, May 14, 2020
चकित हुआ जो मन देखेगा
शिव सूत्र में शिव कहते हैं विस्मय योग की भूमिका है. योग में स्थित होने का अर्थ है समता में टिक जाना, जीवन में गहन सन्तुष्टि का अनुभव करना अथवा कृतकृत्य हो जाना. विस्मय से योग की इस यात्रा का आरंभ होता है. जब आकाश में स्थित अरबों तारों को देखकर मन चकित रह जाता है, सागर की गहराई में स्थित अनोखे प्राणी संसार को देखकर आश्चर्य होता है तो कुछ पलों के लिए मन ठहर जाता है. एक बच्चे के लिए सारा जगत ही विस्मय का कारण है इसीलिए वह आनंद से भरा होता है. सुबह का उगता हुआ सूरज, फूलों पर मंडराती तितलियाँ, जुगनुओं का टिमटिमाना उसके लिए विस्मयकारी हैं, पर जैसे -जैसे वह बड़ा होने लगता है किताबों में उनके बारे में पढ़कर उसे वे सब बातें सामान्य ही प्रतीत होती हैं. विज्ञान ने सब प्रश्नों के उत्तर खोज लिए हैं, किन्तु अभी भी प्रकृति के अनेक रहस्यों से वह पर्दा नहीं उठा पाया है. एक छोटा सा वायरस ही उसकी प्रतिष्ठा को धूल-धूसरित करने के लिए काफी है.
Wednesday, September 13, 2017
विस्मय से जब मन भर जाये
१३ सितम्बर २०१७
जीवन में कदम-कदम पर हमें कितनी
ही आश्चर्यजनक स्थितियों का अनुभव होता है पर ज्यादातर हम उनका कोई न कोई उत्तर
खोज कर मन को शांत कर देते हैं. विज्ञान के द्वारा जगत के कार्यकलापों का कारण
खोजने लगते हैं. एक ऐसा आश्चर्य जिसका कोई निराकरण न हो सके विस्मय कहलाता है, और गहराई
से देखें तो इस जगत का एक नन्हा सा रेत का कण भी मन को विस्मय से भर देने के लिए
पर्याप्त है. हमारी देह की एक कोशिका भी अपने भीतर कितने रहस्य छिपाए है. विज्ञान
के जवाब हमें भ्रमित करते हैं, ऐसा लगता है हम इसके बारे में सब जान सकते हैं.
नींद भी एक रहस्य है और स्वप्न भी. चारों तरफ जैसे एक तिलिस्म छाया है. विस्मय से
भरा मन ही फिर उस अज्ञात के सामने झुक जाता है. वह भी जैसे उस रहस्य का ही एक भाग
बन जाता है.
Friday, February 24, 2017
विस्मयकारी है जीवन यह
२५ फरवरी २०१७
प्रकृति से हम जितना जुड़े होते हैं, विस्मय हमें निरंतर आह्लादित किये रहता है. प्रकृति से कटकर कंक्रीट की दुनिया में रहने वाले नन्हे बीज से अंकुरित होते गेहूँ के पौधे को बालियों से भरते भी नहीं देख पाते और उनके लिए अन्न के लिए सम्मान की भावना भी नहीं उपजती. सृष्टि एक रहस्य से भरी है, पर विज्ञान पढने वाले के लिए जैसे हर रहस्य का उत्तर मानो पुस्तकों में बंद है. नीले आकाश को यदि एक बार भर नजर कोई देखे तो मन खो जाता है, बुद्धि शांत हो जाती है. अनंत है जिसका विस्तार उसके बारे में कोई कहे भी तो क्या..संतों के पास जाकर भी मन ठहर जाता है, वे भी एक रहस्य ही जान पड़ते हैं. ध्यान उसी विस्मय में डूबने का ही तो नाम है.
Tuesday, September 1, 2015
रुक जाये पल भर को मन
जगत आश्चर्यों से भरा
है..यह सृष्टि अनोखी है. हजारों तरह के फूल, रंग-बिरंगी तितलियाँ, सुंदर मछलियाँ,
उगता हुआ सूर्य, रात्रि के नीरव आकाश में लाखों सितारे..और उन सबसे बढ़कर मानव का मन-मस्तिष्क. जिसमें न जाने कितने जन्मों की
स्मृतियाँ और संस्कार अंकित हैं. जिन्हें हम स्वप्न के रूप में देखते हैं. इन सबको
देखने वाला द्रष्टा जब विस्मय से भर जाता है तो स्तब्ध रह जाता है, विस्मय से भरा
मन कुछ पल के लिए ही सही थम जाता है और तब उसे उसका पता चलता है जो इन सबको देख
रहा है, वही हम हैं. यह सृष्टि मानो हमें आश्चर्य चकित करने के लिए ही बनाई गयी है
ताकि हम खुद को पा सकें उन क्षणों में जब बाहर की विविधता हमें स्तब्ध कर दे.
Tuesday, August 12, 2014
कर्मों में कुशलता ही योग है
जनवरी २००७
जब भीतर विस्मय जगे या
कर्मों में कुशलता की चाह हो, मन को समता में रखने की कला सीखनी हो तो हम योगमार्ग
के अधिकारी हैं. जब हम सारे दुखों से छूटना चाहते हैं तो योग की शरण में जाने के
योग्य हैं. परम की भक्ति अग्नि की तरह है जो सदा ऊपर की ओर ले जाती है. योग में बाधक
है जड़ता और मन की वृत्तियाँ. विस्मय में जाने से हमें ज्ञान रोकता है, जहाँ निश्चय
होता है वहाँ विस्मय नहीं होता. जो ज्ञान हमें अन्यों से अलग करे, जगत से भेद कराए
वह अधूरा है. हमें अद्वैत तक पहुंचना है, जहाँ दो हैं ही नहीं. मन हमें एक होने से
रोकता है, बुद्धि भेद करना सिखाती है और अहंकार हर क्षण दूसरों से श्रेष्ठ होने का
आभास दिलाता है. ये सभी मन की वृत्तियाँ हैं जिनसे हमने मुक्त होना है, तब भीतर अद्वैत
का अनुभव होगा और जगत के साथ भी हमारा कोई विरोध नहीं रह जायेगा.
Thursday, May 31, 2012
अद्भुत खेल रचाया किसने
अप्रैल २००३
विस्मय अथवा कृतज्ञता ही हमें ध्यान में ले जाते हैं. हमारी मुस्कान को स्थिर रखते
हैं. तब ही एक मुक्ति का आभास हमें होता है जब भीतर एक स्थिरता छा जाती है. इस मुक्ति
से ही भीतर प्रेम का भी जागरण होता है. प्रेम से मन शक्तिशाली अनुभव करता है,
शक्ति से ही समाधान मिलता है यानि द्वंद्व से पार हुआ जा सकता है. तो प्रथम हुई
कृतज्ञता की भावना और उस सृष्टि कर्ता की लीला को देखकर विस्मित होना. द्वंद्व से पार
हुआ मन ही स्वयं के पार जाकर उसकी गहराई में जाना चाहता है, जहाँ उसे आनंद का
अनुभव होता है. एक ऐसा भाव हमारे भीतर उतरता है कि देह का कण-कण एक धागे में
पिरोया हुआ है, वह धागा प्राण ऊर्जा ही है. ध्यान का ही परिणाम है कि हम अपने भीतर
स्थित देव तत्व से जुड़ जाते हैं. जीवन में जो पात्र निभाना है वह आनंद पूर्वक
निभाते हैं फिर लौट आते हैं अपने आप में, वैसे के वैसे, कबीर ने ऐसे ही भाव में
आकर लिखा होगा “ज्यों की त्यों रख दीनी चदरिया” !
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