जैसे एक दुनिया बाहर है, हमारे भीतर भी एक संसार है. स्वप्नों में हमारा मन जिन लोकों में विचरता है, वह अवचेतन का जगत है. ध्यान में योगी इस जगत को अपने भीतर देख लेते हैं. आत्मा को इन्द्रियों की जरूरत नहीं है, वह आँखों के बिना भी देख सकती है, कानों के बिना सुन सकती है, इसी तरह सूँघने, चखने व स्पर्श का अनुभव भी कर सकती है. हमारा जीवन कई आयामों पर एक साथ चल रहा है. देह के भीतर न जाने कितने प्रकार के जीवाणु हैं, जिनके जीवन और मृत्यु पर हमारा जीवन टिका है. सूक्ष्म कोशिकाएं हैं, जिनमें से हर एक स्वयं में पूर्ण है तथा अन्य कोशिकाओं से संयुक्त भी है. एक तरह की कोशिकाएं मिलकर ऊतक बनाती हैं, जिनसे अंग बनते हैं, वे अंग फिर एक तरह का संस्थान बनाते हैं. जिसे चलाने के लिए कुशलता व बुद्धि की आवश्यकता है, जो उनमें ही विद्यमान है. वह बुद्धिमत्ता उनमें ईश्वर द्वारा प्रदत्त ही मानी जा सकती है. हमारे प्राण शरीर को भी हम कितना कम जानते हैं. शरीर में होने वाली सब गतियां इन्हीं के कारण होती हैं. भोजन का पाचन, रक्त का परवाह, छींक आना, पलकों का झपकना आदि सभी क्रियाएं प्राणों के कारण हो रही हैं. मन के तल पर तो मनुष्य के पास अनंत स्मृतियों का ख़ज़ाना है, न जाने वह कितने जन्मों की यात्रा करके आया है, जिनकी स्मृति भीतर क़ैद है। ज्ञान का एक अनंत भंडार भी हमारे विज्ञान मय कोश में है, जिसके पार आनन्दमय कोश है।इसलिए कहा गया है यथा पिंडे, तथा ब्रह्मांडे !
Wednesday, November 16, 2022
Friday, September 2, 2022
चाह ज्ञान की जगे निरंतर
जीवन अनुभवों का दूसरा नाम है। हर अनुभव हमें कुछ न कुछ सिखाता है। यदि हम सीखने को सदा जारी रखें तो जीवन एक सुंदर यात्रा बन जाता है। यदि कोई कुछ सीखना न चाहे तो उसके लिए जीवन एक संघर्ष बन जाएगा। बच्चा सीखता है, इसलिए उसका मन ताज़ा बना रहता है। विद्यार्थी सीखता है और नए-नए विषयों को जानकर चमत्कृत होता है। प्रौढ़ होते-होते जैसे-जैसे सीखने की चाहत कम होती जाती है और तब सीमित ज्ञान के सहारे जीवन को चलाए जाने में सुरक्षा महसूस होती है। धीरे-धीरे जीवन से रस और आनंद सूखने लगता है। यह दुनिया अति विशाल है, इसके बारे में हम कितना कम जानते हैं। अपनी रुचि के अनुसार ज्ञान का कोई भी क्षेत्र लेकर हम उसके बारे में पढ़ें, सोचें व मनन करें तो कई नई बातों की ओर हमारा ध्यान अनायास ही जाएगा। कई ऐसी बातें हमें नज़र आ सकती हैं जो पहले नज़र अन्दाज़ कर देते थे। नियमित ध्यान इसमें अति सहायक है। ध्यान हमें एक विषय पर केंद्रित रहने की कला सिखाता है। ज्ञान अनंत है और हमारी चेतना में ही निहित है। उसमें प्रवेश करने का तरीक़ा ध्यान, अध्ययन व मनन ही हो सकता है।
Thursday, May 6, 2021
गहराई में जो जा पाए
आज दुनिया एक महामारी से जूझ रही है, किन्तु क्या यह पहली बार हुआ है, क्या इतिहास में हमें इसकी गवाही नहीं मिलती. कुछ वर्ष पहले भी सार्स, इबोला और भी कितने ही वायरस का मुकाबला मानवता ने किया है. यह सही है कि इस बार का हमला अभूतपूर्व है पर यह बिलकुल ही अचानक नहीं हुआ है. वैज्ञानिक इसकी चेतावनी देते रहे हैं, इस पर शोध कार्य भी दुनिया की कितनी प्रयोगशालाओं में चल रहा था. अब हमें लगता है सब कुछ खत्म हो गया है, किन्तु संत कहते हैं, दुनिया केवल सतह पर ही अपूर्ण दिखाई देती है। पूर्णता छिपी रहती है, अपूर्णता प्रकट होती है। ज्ञानी सतह पर नहीं रहता बल्कि गहराई में खोज करता है। जब हालात कठिन हों और जिनमें परिवर्तन करना हमारे बस में न हो तब परिस्थितियों को बदलने की कोशिश करने के बजाय हमें अपनी धारणाओं को बदलने की जरूरत है। ऐसे समय में आगे बढ़ने का एकमात्र तरीका यह है कि हम अपना निर्धारित कार्य करते रहें और स्थितियों को उसी तरह स्वीकार करें, जैसी वे हैं. जिस क्षण हम किसी स्थिति को स्वीकार करते हैं, मन शांत हो जाता है और हमें प्रतिक्रिया के बजाय सोचने और कार्य करने के लिए एक स्पष्ट स्थान मिल जाता है। हम अपनी ऊर्जा का सही उपयोग कर सकते हैं. वर्तमान में हम कोरोना के प्रोटोकॉल का अनुसरण करके तथा जीवनशैली में उचित परिवर्तन करके स्वयं को स्वस्थ बनाये रख सकते हैं.