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Thursday, May 6, 2021

गहराई में जो जा पाए

 आज दुनिया एक महामारी से जूझ रही है, किन्तु क्या यह पहली बार हुआ है, क्या इतिहास में हमें इसकी गवाही नहीं मिलती. कुछ वर्ष पहले भी सार्स, इबोला और भी कितने ही वायरस का मुकाबला मानवता ने किया है. यह सही है कि इस बार का हमला अभूतपूर्व है पर यह बिलकुल ही अचानक नहीं हुआ है. वैज्ञानिक इसकी चेतावनी देते रहे हैं, इस पर शोध कार्य भी दुनिया की कितनी प्रयोगशालाओं में चल रहा था. अब हमें लगता है सब कुछ खत्म हो गया है, किन्तु संत कहते हैं, दुनिया केवल सतह पर ही अपूर्ण दिखाई देती है। पूर्णता छिपी रहती है, अपूर्णता प्रकट होती है। ज्ञानी सतह पर नहीं रहता बल्कि गहराई में खोज करता है। जब हालात कठिन हों और जिनमें परिवर्तन करना हमारे बस में न हो तब परिस्थितियों को बदलने की कोशिश करने के बजाय हमें अपनी धारणाओं को बदलने की जरूरत है। ऐसे समय में आगे बढ़ने का एकमात्र तरीका यह है कि हम अपना निर्धारित कार्य करते रहें और स्थितियों को उसी तरह स्वीकार करें, जैसी वे हैं. जिस क्षण हम किसी स्थिति को स्वीकार करते हैं, मन शांत हो जाता है और हमें प्रतिक्रिया के बजाय सोचने और कार्य करने के लिए एक स्पष्ट स्थान मिल जाता है। हम अपनी ऊर्जा का सही उपयोग कर सकते हैं. वर्तमान में हम कोरोना के प्रोटोकॉल का अनुसरण करके तथा जीवनशैली में उचित परिवर्तन करके स्वयं को स्वस्थ बनाये रख सकते हैं. 


Monday, April 26, 2021

मिलकर जब सब करें सामना

 कोरोना के खिलाफ जो जंग भारत ने लगभग जीत ही ली थी, सकुचाते हुए जिसकी विजय का जश्न भी मनाया था. उसे फिर हार न जाएं ऐसा डर आज हम सभी के मनों में समाया है। ऐसा लग रहा है जैसे हम सोते ही रहे और दुश्मन घर तक आ गया, और देखते ही देखते हर शहर, हर गली मोहल्ले में छा गया. आज सब ओर भय का वातावरण है लेकिन हमें याद रखना होगा, जो भयभीत है वह मन है। जो  उस भय को देखता है, वह हम हैं। जब हम कहते हैं मुझे भय लग रहा है, हम मन के साथ एकात्म हो जाते हैं. मन माया है. हम माया से बंध जाते हैं. जो जानता है, वह हम हैं जानने में एक दूरी है। इस दूरी का अनुभव करते हुए हम पुन: जीतेंगे इस दुगने विश्वास से लड़ना है. लॉक डाउन का पालन बड़ी सख्ती से करना है जीवनचर्या में प्राणायाम को शामिल कर प्राणों में नैसर्गिक वायु भरनी है. न कि अस्पतालों में आक्सीजन के लिए लंबी कतारें खड़ी करनी हैं.  हम भूल गए कि वायरस अभी जिंदा है, हर मौत जो किसी की कहीं हुई, उसके लिए हर भारतीय शर्मिंदा है। किन्तु हमें इसे अपनी कमजोरी नहीं बनने देना है। हर नागरिक हर नियम का कड़ाई से पालन करे, इस मुश्किल घड़ी में हमें मिलकर सुरक्षित निकलना है। अगली लहर आए उससे पहले ही मुस्तैदी से तैयार रहना है। स्वच्छता का दामन थाम पौष्टिकता का ध्यान रखना है। वैक्सीन लगवा कर प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करना है। सब उपाय करके अब घर-घर से वायरस को विदा करना  है। 



Wednesday, September 16, 2020

खो जायेगा छोटा मन जब

 महामारी  के इस काल में सब कुछ अनिश्चतता के दौर से गुजर रहा है. एक भय और असुरक्षा की भावना पहले से बढ़ गयी लगती है. ऐसे में अध्यात्म का आश्रय लेकर हम सहज ही अपने मन को तनाव से मुक्त रख सकते हैं. ‘मैं’ और ‘मेरा’ के सीमित दायरे से निकाल कर अध्यात्म हमें औरों के प्रति संवेदनशील होना सिखाता है. तनाव होता है स्वयं के बारे में सोचते रहने से, यदि हम अपनी सोच में बदलाव ले आएं और यह विचारें कि क्या इस दौर में हम अन्यों की किसी भी तरह की मदद कर सकते हैं, तो हमें अपनी चिंता करने का समय ही नहीं मिलेगा. जिस परम शक्ति ने इस विराट सृष्टि का निर्माण किया है, उसके प्रति समर्पण करने से भी मन भय मुक्त हो जाता है. सुबह और शाम आधा घण्टा ध्यान करने से भी हम मन में स्थिरता और शांति का अनुभव कर सकते हैं. ध्यान हमें ऊर्जावान बनाता है, हमारा छोटा मन विशाल मन के साथ जुड़ कर गहन विश्राम का अनुभव कर सकता है, जो मन के साथ-साथ तन को भी स्वस्थ रखने में सहायक है. 

Wednesday, July 1, 2020

जीवन की कीमत जो जाने

अभी तक दूर था कोरोना, कल ही पता चला हमारी कालोनी में भी चेन्नई से लौटे एक व्यक्ति को संक्रमण हुआ, स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारी उसे ले गए, परिवार को क्वारन्टाइन कर दिया गया है. पूरी बिल्डिंग को ही बंद कर दिया है. यह इमारत हमारे घर से आधा किमी दूर है. सुबह-शाम अभी तक बिना किसी भय के टहलने जाते थे, शायद अब संभव न हो. आज सुबह पहली बार बाहर जाते समय इसका अहसास हुआ. पूरे विश्व में लाखों लोग इसी और इससे कहीं ज्यादा आशंका में जी रहे हैं. ऐसे में आवश्यक है कि मन यदि एक क्षण के लिए भी विक्षेपित हो तो तत्क्षण उसे सचेत कर दिया जाये. जीवन क्षण-क्षण में मिलता है, यदि एक पल गया तो उसका अगला पल भी वैसा  ही फल लाने वाला है. सचेत रहना होगा और नजर खुले विस्तीर्ण आकाश पर रखनी होगी, जिसके नीचे न जाने कितनी महामारियाँ  जन्मी, पनपीं और नष्ट हो गयीं. कोरोना भी अपना असर कुछ काल तक और डालेगा, कुछ महीने, एक साल, दो साल या उससे भी ज्यादा, अभी कुछ नहीं कहा जा सकता. जीवन कितना बहुमूल्य है यह सबक सीखने का सुनहरा अवसर है आज, धन की सही कीमत क्या है और रिश्तों की अहमियत क्या है, यह सीखने का वक्त भी है आज. परमात्मा ही संचालक है मानव की अल्पबुद्धि सदा काम नहीं आती, यह पाठ भी तो हमें सीखना है. कोरोना ने सारे विश्व की पाठशाला खोल दी है, सभी देशों के वासी उसके विद्यार्थी हैं.  

Saturday, April 11, 2020

स्वयं को जो जन सबल बनाये


धरती की आयु अरबों वर्ष की है, मानव को धरती पर आये भी लाखों वर्ष बीत गये हैं. हमारे पास मानव सभ्यता का जो ज्ञात इतिहास है उसमें अनेक महामारियों का जिक्र आता है, अर्थात यह कोई नयी बात नहीं है. आज विज्ञान का युग है इसलिए इस महामारी का असर कम हुआ है, जी, हाँ, पिछली महामारी में जो लगभग सौ वर्ष पूर्व आयी थी, उसमें करोडों जानें गयी थीं. आज हमारे पास साधन हैं और बचाव के बेहतर उपाय हैं. जो लोग कोरोना से संक्रमित हो चुके हैं, वे ठीक भी हो रहे हैं और दुर्भाग्यवश जो बच नहीं पाए उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कम थी. अब सबसे पहली आवश्यकता है हम जो अभी तक बचे हुए हैं, स्वयं को मजबूत बनाएं. मानसिक रूप से सबल व्यक्ति की रोग से लड़ने की ताकत ज्यादा होती है. एक न एक दिन तो हमें अपने घरों से बाहर जाना ही है, और जब तक इस रोग की कोई वैक्सीन नहीं आती, इससे बचने का उपाय एक ही है कि हम सामाजिक दूरी बनाये रखें. कोरोना का वायरस हर मौसम में जिन्दा रह सकता है, सो यह कहीं चला जायेगा इसकी उम्मीद करना व्यर्थ है. हमें स्वयं को सुरक्षित रखने के लिए आने वाले छह-आठ महीनों तक नाक-मुख को ढक कर ही बाहर निकलना होगा. इसी तरह बार-बार हाथ धोने की आदत तो तब तक स्वभाव में ही बदल चुकी होगी. अति आवश्यक कार्य होने पर ही हमें घर से बाहर जाना होगा. धीरे-धीरे ताला-बंदी में ढील दी जाएगी लेकिन नागरिकों को किसी भी प्रकार के संक्रमण से सतर्क रहने की अपनी आदत को स्वयं ही विकसित करना होगा. 

Sunday, March 29, 2020

बाहर से जो भी उबरेगा


यह विचित्र युग है, आज इतिहास बन रहा है, आज से सौ वर्षों बाद इतिहास की किसी किताब में कोई पढ़ रहा होगा कि कोरोना-महामारी ने कैसे दुनिया को हैरान-परेशान कर दिया था. हवाई जहाज, रेल,बसें, कारें सभी थम गए थे और हजारों लोगों ने अपने प्राण गंवाए थे. इस महामारी का आर्थिक विश्लेषण भी किया जायेगा और राजनीतिक भी. वर्तमान में जो भी घट रहा है हम उसके साक्षी हैं, जो कोरोना के शिकार हुए हैं, जिनके परिवार का कोई सदस्य नहीं रहा, उनके दुःख का अंदाजा हम नहीं लगा सकते. जिनका रोजगार छिन गया, जिनके घर छूट गये, उनका दुःख तो समय के साथ कम हो जायेगा, किंतु उसका असर किसी न किसी रूप में बना ही रहेगा. स्थिति को सुधारने के लिए हममें से हरेक अपने तौर पर कुछ न कुछ मदद कर सकता है, और कुछ न भी कर सके घर में बने रहकर बीमारी से बच सकता है और अंततः औरों को बचा सकता है. जब ऊर्जा को बाहर जाने का कोई अवसर नहीं मिलता तो वह गतिशील होने के कारण भीतर ही तो जाएगी, आज हमें अवसर मिला है कुछ दिन अपने साथ रहने का, अपने भीतर जाने का. जीवन की इस उहापोह भरी स्थिति में जब बाहर कोई आधार नहीं मिलता हो तब भीतर के केंद्र को पाकर उसे आधार बनाकर हम जीवन के मर्म को समझ सकते हैं. 

Wednesday, March 18, 2020

जिस पल चेतेगा मानव


अखबारों में जिस खबर को हेडलाइन बनाया जा रहा है टीवी पर वही ब्रेकिंग न्यूज है, सोशल मीडिया पर जिसे प्रमुखता दी जा रही है फोन पर चर्चा का भी वही विषय है. अपने अब तक के जीवन में ऐसा न कभी देखा न सुना, जब एक न दिखने वाले दुश्मन से डर कर लोग घरों में बन्द हो गए हों. जो सक्षम हैं वे कुछ हफ्ते घर में बन्द रहकर भी आराम से समय बिता सकते हैं पर जिनका जीवन दैनिक रोजगार पर आधारित हो, वे काम न मिलने से कितने प्रभावित हो रहे होंगे. क्या आज यह सोचने की जरूरत नहीं है कि ऐसा क्यों हुआ, क्या यह मानव की नियति है अथवा उसके किसी कर्म का फल. महामारियां पहले भी फैलती रही हैं जब इलाज की इतनी सुविधाएँ नहीं थीं पर विज्ञान के इस युग में मानव का इस तरह विवश हो जाना कई गहरे प्रश्न उठाता है. आज नहीं कल कोरोना का इलाज ढूंढ लिया जायेगा और जल्दी ही यह भय का वातावरण खत्म हो जायेगा, किन्तु उन प्रश्नों के हल तलाशना फिर भी जरूरी है. मानव ने जंगलों को काटकर बस्तियां बनायीं,शाक-सब्जी, फल, दूध होते हुए भी जीव हत्या करके अपनी क्षुधा मिटाई. फैशन के लिए और अपनी शक्ति के प्रदर्शन के लिए भी निरीह पशुओं की हत्याएँ  कीं. धरती का अनियमित दोहन किया, जल व हवा को दूषित किया, इतना करके भी स्वयं को प्रकृति का स्वामी समझकर कभी इन बातों के लिए स्वयं को दोषी नहीं माना, बल्कि विकास के नाम पर इन्हें बढ़ावा ही दिया. मनोरंजन के लिए लाखों लुटाने वाले जब यह भूल जाते हों कि उनके ही पड़ोस में कोई भूखा सोने को विवश है, उच्च शिक्षा के लिए करोड़ों देकर दाखिला लेने वाले जब यह न देखते हों कि किसी असमर्थ पर कुशाग्र  विद्यार्थी की एक सीट वे ले रहे हैं. जब इतना अन्याय होता हो तो प्रकृति भी दूषित हो जाये इसमें क्या अस्वाभाविक है. काम, क्रोध, लोभ, हिंसा और अत्याचार के परमाणु जब वातावरण में बढ़ जाते हैं तो प्रकृति में हलचल होती है. आज लोग घरों में बैठे हैं तो कुछ चिंतन भी करते होंगे, सजगतापूर्वक कुछ समय स्वयं के साथ बिताकर हम अपने जीवन की नई दिशा के बारे में निर्णय ले सकते हैं. हमारा जीवन इस सुंदर ग्रह के लिए एक वरदान बने, हम इसके पोषक हों, शोषक नहीं.