जहाँ ज्ञान का तिरस्कार होता है वहाँ सजगता खो जाती है. वास्तव में बेहोश होकर ही हम अज्ञानी हो सकते हैं. हम जानते हैं कि हमारे लिए क्या अच्छा है, पर चुनते वही हैं जो हमें पसंद है, यह जानते हुए भी कि यह हमारे के लिए सही नहीं है. सन्त कहते हैं यदि हम प्रेय मार्ग को चुनेंगे तो दुःख से बचना असम्भव है, श्रेय मार्ग को चुनेंगे तो जीवन में दुःख का कोई स्थान ही नहीं रहेगा. इसका अर्थ यह नहीं है कि जीवन में कोई दुखद परिस्थिति नहीं आएगी, बल्कि हम हर स्थिति में समता में रहना सीख जायेंगे. प्रेय मार्ग हमें कमजोर बनाता है, हम केवल सुख के अभिलाषी बन जाते हैं. जरा सा दुःख हमें अपने केंद्र से विचलित कर देता है. श्रेय मार्ग का चयन हमें भीतर से दृढ़ता प्रदान करता है. इसके लिए पहला कदम है, राग-द्वेष से मुक्त होना, हम यदि जीवन को जिस रूप में वह मिलता है स्वीकार करना चुनते हैं तो एक स्थिरता भीतर प्रकट होती है.यह स्थिरता हमें सही-गलत में भेद करना सिखाती है और सही का चुनाव करने का बल देती है. श्रेय मार्ग का चयन तब सहज हो जाता है.
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Thursday, April 16, 2020
Sunday, March 29, 2020
बाहर से जो भी उबरेगा
यह विचित्र युग है, आज इतिहास बन रहा है, आज से सौ वर्षों बाद इतिहास की किसी किताब में कोई पढ़ रहा होगा कि कोरोना-महामारी ने कैसे दुनिया को हैरान-परेशान कर दिया था. हवाई जहाज, रेल,बसें, कारें सभी थम गए थे और हजारों लोगों ने अपने प्राण गंवाए थे. इस महामारी का आर्थिक विश्लेषण भी किया जायेगा और राजनीतिक भी. वर्तमान में जो भी घट रहा है हम उसके साक्षी हैं, जो कोरोना के शिकार हुए हैं, जिनके परिवार का कोई सदस्य नहीं रहा, उनके दुःख का अंदाजा हम नहीं लगा सकते. जिनका रोजगार छिन गया, जिनके घर छूट गये, उनका दुःख तो समय के साथ कम हो जायेगा, किंतु उसका असर किसी न किसी रूप में बना ही रहेगा. स्थिति को सुधारने के लिए हममें से हरेक अपने तौर पर कुछ न कुछ मदद कर सकता है, और कुछ न भी कर सके घर में बने रहकर बीमारी से बच सकता है और अंततः औरों को बचा सकता है. जब ऊर्जा को बाहर जाने का कोई अवसर नहीं मिलता तो वह गतिशील होने के कारण भीतर ही तो जाएगी, आज हमें अवसर मिला है कुछ दिन अपने साथ रहने का, अपने भीतर जाने का. जीवन की इस उहापोह भरी स्थिति में जब बाहर कोई आधार नहीं मिलता हो तब भीतर के केंद्र को पाकर उसे आधार बनाकर हम जीवन के मर्म को समझ सकते हैं.
Thursday, August 9, 2018
स्वयं के निकट रहेगा जो
१० अगस्त २०१८
मन सकारात्मक हो तो समस्या को नहीं उसके पीछे छिपे हल को
देखता है, और नकार से भरा हो तो समस्या इतनी बड़ी दिखाई देती है कि स्पष्ट नजर आता
हुआ हल भी उसे दिखाई नहीं पड़ता. जितना-जितना हम अपने केंद्र के नजदीक होते हैं,
ज्ञान से जुड़े रहते हैं, परिधि पर आते ही मन डोलने लगता है, उसे हानि-लाभ की चिंता
सताने लगती है. वह अपने सिवा कुछ और देख ही नहीं पाता. आज समाज में जो इतनी असंवेदनशीलता
है, उसका कारण है कि हम स्वयं से बहुत दूर निकल आये हैं. केंद्र पर स्थिरता है,
वहाँ आश्वासन है, भरोसा है, विश्वास है. वहाँ से परमात्मा निकट है. मन्दिरों में
बढ़ती भीड़ इस बात को नहीं दर्शाती कि लोग ज्यादा धार्मिक हो गये हैं, बल्कि इस बात
को ही दिखाती है कि लोगों का भरोसा स्वयं से उठ गया है. उनके घरों में रहने वाले
कुल देवताओं से उठ गया है. परमात्मा के प्रति आस्था तभी हो सकती है, जब मन में शुभता
के प्रति, सत्य के प्रति आस्था हो.
Monday, September 21, 2015
सांचा तेरा नाम..
कृष्ण व्यापक है, परम सत्य व्यापक है
किन्तु मद तथा मूढ़ता के कारण हम उसे देख नहीं पाते. जब हम सत्य की खोज में निकलते
हैं तो मन भटकाता है, हम केंद्र से दूर हो जाते हैं. सत्य खोजने से नहीं मिलता
बल्कि हम जहाँ हैं वहीं उसे प्रकट कर सकते हैं. सत्य शास्त्र से भी नहीं मिलता,
शास्त्र उसका अनुमोदन भर करते हैं. जब-जब हम धर्म के मार्ग पर चले हैं, उसी में
स्थित हैं. ईश्वर हमसे दूर नहीं है, वह तो निकटस्थ है, चाहे हम उसे याद करें अथवा न
करें, वह हमारी आत्मा की भी आत्मा है.
Saturday, July 12, 2014
सत्य ही हो लक्ष्य हमारा
सितम्बर २००६
कृष्ण
व्यापक है, परम सत्य व्यापक है किन्तु हम मद तथा मूढ़ता की कारण उसे देख नहीं पाते.
सत्य में स्थित रहकर कोई स्वयं को भूल नहीं सकता. हर हाल में जो शांत है, भीतर की
समता बनाये रखता है, वह भक्त कृष्ण का प्रिय है. कृष्ण तथा सद्गुरु हमारे मद को
दूर करने के लिए कभी-कभी कठोर हो जाते हैं. जब हम सत्य की खोज में निकलते हैं तो
मन भटकाता है, हम केंद्र से दूर हो जाते हैं. सत्य शास्त्र से नहीं मिलता, शास्त्र
उसका अनुमोदन भर करते हैं. हम जहाँ हैं वहीं थमकर देखने से मिलता है. सत्य जब
प्रकट होता है तो ही भीतर का प्रेम प्रकट होता है, उसी प्रेम के कारण भक्त कभी
गाता है, अश्रु बहाता है, नृत्य करता है.
Monday, July 7, 2014
चलती चाकी देख के
सितम्बर २००६
संतजन
कहते हैं कि हम समस्या मूलक भी बन सकते हैं और समाधान मूलक भी. यदि हम अपने केंद्र
से जुड़े नहीं हैं तो समाधान मूलक हो जाते हैं. केंद्र से जुड़े रहने के लिए एक आधार
चाहिए, एक सूक्ष्म तन्तु, जो कि प्रेम ही हो सकता है. यदि हम परिधि पर ही रह गये
तो दूसरों के साथ-साथ स्वयं के लिए भी समस्या खड़ी कर देंगे. परिधि पर रहने से हम
डगमगाते रहते हैं, केंद्र से जुड़े रहना स्थिरता प्रदान करता है. आत्मा केंद्र है,
मन परिधि है, मन स्वयं ही योजनायें बनता है फिर उन्हें तोड़ता है. वह कल्पनाओं का
जाल अपने इर्द-गिर्द बुना लेता है. हमें सच्चाई की ठोस जमीन चाहिए न कि कल्पना का
हवा महल. हम सत्य के पारखी बनें.
Sunday, February 2, 2014
मुक्त रहें जो कर्तापन से
जुलाई २००५
हमारा
सारा जीवन कर्मों की एक श्रृंखला ही तो है. मन जब निज केंद्र में रहना सीख जाता है,
स्वयं में स्थित रहकर परमात्मा को पूर्ण समर्पित अनुभव करता है, तब कर्त्ता भाव से
मुक्त होता है और तब वह भी उसी तरह सम्पूर्ण कार्यों को होते हुए देखता है जैसे
कोई अन्य व्यक्ति. जब हम कर्तापन के भाव से दब जाते हैं तभी दुःख के भोक्ता बनते
हैं. गुण-गुणों में बरत रहे हैं यह जानकर जब हम अलिप्त रहते हैं हमारे भीतर आनन्द
की अजस्र धारा निरंतर बहती रहती है. एक क्षण का भी व्यवधान उसमें हुआ तो साधक को
सहन नहीं होता.
Thursday, January 2, 2014
जुड़ जाएँ हम अपने से ही
जून २००५
सन्त
कहते हैं, जाने-अनजाने सभी प्राणी ईश्वर की ओर जा रहे हैं, वही हमारा ध्येय है,
वही हमारा प्राप्य है, मित्र है, आत्मीय है, अपना है, सदा साथ है. संसार साथ रहते
हुए भी कभी साथ नहीं रहता, अन्यथा किसी को अकेलेपन का अनुभव नहीं हो सकता था.
संसार में सभी कुछ बदल रहा है, पर भीतर एक केंद्र है जहां कुछ भी नहीं बदलता
अन्यथा हम इस परिवर्तन का आभास ही नहीं हो सकता था. जो उस केंद्र से परिचित है
जुड़ा है, वह स्थितप्रज्ञ है जो वियुक्त है वह हवा में उड़ने वाले पत्ते की तरह
इधर-उधर भटकता है. हमारे केंद्र में जिसे आत्मा भी कह सकते हैं, असीम प्रेम है,
सभी के भीतर उस की सत्ता है, जो परमात्मा का अंश है. उसका भान न होने पर व्यक्ति
स्वयं को विशिष्ट मानता है जो दुःख का कारण है. ध्यान के द्वारा हम अपने केंद्र से
जुड़ सकते हैं, तब व्यक्ति, वस्तु, परिस्थिति हमें अपना गुलाम नहीं बना सकती, पूर्ण
स्वाधीनता का अनुभव तभी होता है. स्वराज्य घटित होता है. तभी अध्यात्म में प्रवेश
मिलता है. जीवन तब सहज हो उठता है, कोई कार्य तब सप्रयास नहीं होता, छोटा हो या बड़ा
सभी कार्य अपने-आप होते प्रतीत होते हैं, हम साक्षी भाव में आ जाते हैं.
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