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Thursday, April 16, 2020

ज्ञान का जो सम्मान करे मन


जहाँ ज्ञान का तिरस्कार होता है वहाँ सजगता खो जाती है. वास्तव में बेहोश होकर ही हम अज्ञानी हो सकते हैं. हम जानते हैं कि हमारे लिए क्या अच्छा है, पर चुनते वही हैं जो हमें पसंद है, यह जानते हुए भी कि यह हमारे के लिए सही नहीं है. सन्त कहते हैं यदि हम प्रेय मार्ग को चुनेंगे तो दुःख से बचना असम्भव है, श्रेय मार्ग को चुनेंगे तो जीवन में दुःख का कोई स्थान ही नहीं रहेगा. इसका अर्थ यह नहीं है कि जीवन में कोई दुखद परिस्थिति नहीं आएगी, बल्कि हम हर स्थिति में समता में रहना सीख जायेंगे. प्रेय मार्ग हमें कमजोर बनाता है, हम केवल सुख के अभिलाषी बन जाते हैं. जरा सा दुःख हमें अपने केंद्र से विचलित कर देता है. श्रेय मार्ग का चयन हमें भीतर से दृढ़ता प्रदान करता है. इसके लिए पहला कदम है, राग-द्वेष से मुक्त होना, हम यदि जीवन को जिस रूप में वह मिलता है स्वीकार करना चुनते हैं तो एक स्थिरता भीतर प्रकट होती है.यह स्थिरता हमें सही-गलत में भेद करना सिखाती है और सही का चुनाव करने का बल देती है. श्रेय मार्ग का चयन तब सहज हो जाता है. 

Saturday, June 10, 2017

मार्ग वही जो घर पहुँचाये

११जुन २०१७ 
जीवन हमें श्रेय और प्रेय दो मार्ग सुझाता है. पहला श्रेय मार्ग सदा ही कल्याण की ओर लेकर जाने का मार्ग है और दूसरा प्रेय मार्ग संसार के आकर्षणों का अनुभव कराते हुए सुख-दुःख के मार्ग पर भटकाने वाला है. हमारे सम्मुख अस्तित्त्व हर क्षण चुनाव का अवसर प्रस्तुत करता है. हम लगभग सदा ही प्रेय का चुनाव कर लेते हैं, यह आरम्भ में सुख देने वाला प्रतीत होता है, इसमें ज्यादा श्रम भी नहीं करना पड़ता, यह हमारी रुचियों के अनुकूल पड़ता है और हमें लगता है हम अपनी स्वतंत्र इच्छा से इस मार्ग पर चल रहे हैं. जबकि हमारे संस्कार विवश करते हैं और हम बने बनाये रास्तों पर ही चलते रहते हैं, जो बार-बार उन्हीं पर घुमाते रहते हैं, पहुंचना कहीं होता ही नहीं. दूसरी तरफ कल्याण का मार्ग आरम्भ में कष्टपूर्ण लग सकता है, इस पर प्रयास पूर्वक चलना होता है, पर अंत में यही मार्ग हमें ऐसे जीवन की ओर ले जाता है जो सहज है, आनंदपूर्ण है और जिसको पाने के लिए संत सदा से कहते आये हैं.  

Tuesday, September 17, 2013

गहरे पानी पाए मोती

फरवरी २००५ 
मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार आदि मानो आत्मा रूपी झील पर उठने वाली तरंगे हैं, जो आती हैं और मिट जाती हैं. मन में हर पल नये-नये विचार उठते रहते हैं और साथ ही समाप्त होते रहते हैं. यदि हम किसी विचार को पकड़ कर बैठ जाते हैं तो रुके हुए पानी जैसी काई उस पर जमने लगती है, यदि वह विचार सद् है तो कुछ समय के लिए अन्य अशुभ विचारों को ढक लेता है पर जब तक आत्मा तक हमारी पहुंच नहीं होगी, ऊपर-ऊपर का बदलाव विशेष बदलाव नहीं देता. क्षण-प्रतिक्षण हमारी बुद्धि बदलती रहती है, सुख-सुविधा की ओर खींचती है. प्रेय के मार्ग पर ले जाती है, श्रेय को तजकर हम दुःख ही पाते हैं. आत्मा की झील में उतरे बिना काम नहीं चलेगा. आत्म ज्ञान के बिना हम सुरक्षित नहीं है. 

Sunday, August 5, 2012

हो प्रेय वही जो श्रेय भी हो


जुलाई २००३ 
प्रेय और श्रेय यह दोनों रास्ते जीवन में हर क्षण हमारे सम्मुख आते हैं, हमें हर पल चुनाव करना होता है. जो श्रेष्ठ है यदि उसका चुनाव किया तो हम साधक हैं पर प्रेय के पीछे गए तो अपने पद से नीचे गिर गए. ईश्वर हर क्षण हम पर नजर रखे है, वह हमारे चुनाव में दखलंदाजी नहीं करता, वह द्रष्टा है पर जैसे ही हम श्रेष्ठता का मार्ग चुनते हैं, वह हम पर एक स्नेह भरी मुस्कान छोड़ता है, उसका स्पर्श हम अपनी आत्मा में महसूस करते हैं. जब भी हम अच्छाई के रास्ते पर चलते हैं  आत्मा पुष्ट होती है और जब भी हम तुच्छता को चुनते हैं आत्मा संकुचित होती है. उस पर एक धब्बा लग जाता है. हमें तो इस चादर को ज्यों का त्यों प्रभु को सौंपना है. स्वच्छ, निर्मल और पवित्र और यह कितना सरल है, यह तब सरल हो जाता है जब हम ईश्वर से प्रेम करते हैं, उसके और अपने बीच अहं आड़े नहीं आने देते. उसने हमें अपने सा ही बनाया है. उसी की तरह हमें भी जगत में बाँटना ही बाँटना है. हम में भी अनंत सम्भावनाएं छुपी हैं, साधना उन्हीं को जागृत करती है.


Sunday, April 22, 2012

घट घट में घटती रामायण


फरवरी २००३ 
प्रतिपल हमारे भीतर रामायण चल रही है. राम, हमारी आत्मा का जन्म तब होता है, अर्थात हम स्वयं का अनुभव तब करते हैं जब दशरथ यानि दस इन्द्रियों का मिलन कुशलता (कौशल्या) से होता है. जीवन में मैत्री (सुमित्रा), और श्रद्धा(कैकेयी) होती हैं. श्रद्धा जब अटूट न रहे तो स्वयं से अलगाव हो जाता है. बुद्धि रूपी सीता का हरण तब अहंकार रूपी रावण कर लेता है.  श्वास-प्राणायाम (हनुमान) की सहायता से हम पुनः बुद्धि का आत्मा से मिलन कराते हैं.
इसी तरह महाभारत का युद्ध भी लड़ा जा रहा है. एक ओर लोभ आदि दुर्गुणों का प्रतीक दुर्योधन है  तो दूसरी ओर सात्विकता का प्रतीक अर्जुन, आत्मा रूपी कृष्ण उसके सारथि हैं. सदगुणों को जब  वनवास मिलता है, दुःख उठाना ही पड़ता है पर अंत में विजय सत्य की होती है. हमें प्रतिक्षण प्रेय तथा श्रेय में से चुनाव करना होता है. यह चयन ही हमारे भविष्य की नींव रखता है.

Friday, February 3, 2012

फूल और काँटे


नवम्बर २०१२ 
दो मार्ग हर वक्त हमारे सामने होते हैं एक है श्रेय और दूसरा है प्रेय. जो पहले कठिन हो पर बाद में लाभकारी हो वही श्रेय है और जो इस समय सुखकर हो पर बाद में जिसका परिणाम दुखकारी हो वह प्रेय है. प्रेय के मार्ग पर भी काँटे होते है पर फूलों से ढके होते हैं, मोह और अहंकार इस प्रेय के मार्ग के साथी हैं, जबकि सद्विचार श्रेय के मार्ग के साथी हैं. विवेक भीतर जगे तभी श्रेय की चाह उठती है. विवेक जगने पर भीतर मात्र करुणा रह जाती है, आध्यात्मिक जीवन का अर्थ ही है स्नेह भरा जीवन. संसार से भागना नहीं है बल्कि अपने अंतर में डूबकर प्रेम भरे हृदय से संसार की तरफ आना है.  

Wednesday, December 14, 2011

प्रेय और श्रेय

अगस्त २००२ 
मन जब भी उद्विग्न होता है कारण वही एक ही होता है. भीतर कोई इच्छा जन्मती है और जब तक वह पूरी नहीं होती मन कुरेदता रहता है. मन को अच्छी न लगे कोई ऐसी बात कह दे तो उसे ही समझाने लगता है. कोई बाधा बने तो क्रोध भी आता है. अर्थात मन पर हमारा नियंत्रण नहीं है, इसी बात की कसक भीतर रहती है. प्रेय और श्रेय दो प्रकार के कर्म हैं. प्रेय, जो क्षणिक सुख देते हैं, जो कार्य हमें प्रिय हैं चाहे वह श्रेष्ठ न भी हों, श्रेय वे हैं जो आरम्भ में सुखद न लगते हों पर अंततः सुखद होते हैं, जिन्हें कर के हमें कभी पछताना नहीं पड़ता. भक्त व साधक को तो श्रेय कार्य ही करने हैं, सजग रहना है. किसी के दोष देखना व समझाना भी छोड़ना होगा. व्यर्थ का चिंतन, व्यर्थ की वाणी, व्यर्थ के कार्यों से भी स्वयं को दूर करना होगा. क्योंकि मन को तृप्त करना वैसा ही है जैसे अग्नि को ईंधन देना. ईश्वरीय मार्ग पर चलने की इच्छा ही अपने आप में तृप्तिदायक है, आरम्भ में मध्य में और अंत में भी यह सुखद है. यह हमें मुक्त करती है, जैसे वह परमात्मा मुक्त है

Friday, November 18, 2011

प्रेम ही पूजा है


july 2002 
हृदय में श्रद्धा और विश्वास की पूंजी हो तो जीवन का पथ सरल हो जाता है, मात्र सरल ही नहीं  सरस भी हो जाता है. सामर्थ्य बढ़ जाता है, समर्थ वही है जो किसी भी देश, काल में अपनी आत्मा पर ही निर्भर रहे, अहंता व ममता छोड़कर श्रेय के पथ पर चले. एक बार ईश्वरीय प्रेम का अनुभव हो जाने के बाद वह कभी हमारा हाथ नहीं छोड़ता. बल्कि पग-पग पर ध्यान रखता है, इतने स्नेह से वह हमारी खोजखबर लेता है जैसे पुराना परिचित हो. इस जग में जितना प्रेम हमें मिलता है या हमारे हृदयों में अन्यों के लिये रहता है वह उसी के प्रेम का का प्रतिबिम्ब है. मनसा, वाचा, कर्मणा वह हमारे सभी कर्मों का साक्षी है. उसे अर्पित करने के लिये इस जग के सभी पदार्थ तुच्छ हैं, एक मात्र प्रेमपूर्ण हृदय ही उसे समर्पित करने योग्य है, उसकी बनायी इस सृष्टि में हर कहीं उसे ही देखने की कला ही पूजा है.