Tuesday, September 17, 2013

गहरे पानी पाए मोती

फरवरी २००५ 
मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार आदि मानो आत्मा रूपी झील पर उठने वाली तरंगे हैं, जो आती हैं और मिट जाती हैं. मन में हर पल नये-नये विचार उठते रहते हैं और साथ ही समाप्त होते रहते हैं. यदि हम किसी विचार को पकड़ कर बैठ जाते हैं तो रुके हुए पानी जैसी काई उस पर जमने लगती है, यदि वह विचार सद् है तो कुछ समय के लिए अन्य अशुभ विचारों को ढक लेता है पर जब तक आत्मा तक हमारी पहुंच नहीं होगी, ऊपर-ऊपर का बदलाव विशेष बदलाव नहीं देता. क्षण-प्रतिक्षण हमारी बुद्धि बदलती रहती है, सुख-सुविधा की ओर खींचती है. प्रेय के मार्ग पर ले जाती है, श्रेय को तजकर हम दुःख ही पाते हैं. आत्मा की झील में उतरे बिना काम नहीं चलेगा. आत्म ज्ञान के बिना हम सुरक्षित नहीं है. 

5 comments:

  1. आत्मा की झील में उतरे बिना काम नहीं चलेगा. आत्म ज्ञान के बिना हम सुरक्षित नहीं है.
    sukhad evam sarthak kathan ....

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  2. आपकी यह रचना कल बुधवार (18-09-2013) को ब्लॉग प्रसारण : 120 पर लिंक की गई है कृपया पधारें.
    सादर
    सरिता भाटिया
    गुज़ारिश

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  3. अनुपमा जी व सरिता जी, आपका स्वागत व आभार !

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  4. बेह्तरीन अभिव्यक्ति बहुत खूब , शब्दों की जीवंत भावनाएं... सुन्दर चित्रांकन
    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
    http://madan-saxena.blogspot.in/
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  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लागर्स चौपाल में शामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा कल - शनिवार हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल :007 \
    लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया आप भी पधारें, सादर .

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