Saturday, September 14, 2013

मैं से भरा उससे खाली

फरवरी २००५ 
जब तक हम देहात्म बुद्धि से जगत में रहते हैं, मन पर एक बोझ पड़ा ही रहता है, यह बोझ ‘मैं’ का है, ‘मैं’ जो अपने को कल्पनाओं के अनुसार एक पहचान दे देता है. बाहर जो दीखता है वह जगत बंधन का कारण नहीं है, बल्कि हमारी कल्पनाओं द्वारा गढ़ा गया संसार ही बंधन का कारण है. जब मन सारी, उपाधियों, कल्पनाओं, वासनाओं से खाली हो जाता है, तभी देहातीत का अनुभव होता है, तब हम स्वालम्बी हो जाते हैं, अपनी ख़ुशी के लिए संसार के आश्रित नहीं रहते, जगत तो अपनी प्रकृति के अनुसार पल-पल बदल रहा है, पर हम ‘वह’ हैं जो कभी नहीं बदलता.

10 comments:

  1. आपकी इस प्रस्तुति की चर्चा कल सोमवार [16.09.2013]
    चर्चामंच 1370 पर
    कृपया पधार कर अनुग्रहित करें
    सादर
    सरिता भाटिया

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    1. सरिता जी, बहुत बहुत आभार!

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  2. शुक्रिया आपकी स्नेह पूर्ण टिप्पणियों का। आप लोगों के लिए ही लिखा जा रहा है गीता भावार्थ।

    मनमनाभव मामेकम शरणम् गच्छ। ज्योति (आत्मा )परम -ज्योति (परमात्मा )को तभी प्राप्त होगी जब हम खुद को शरीर समझे जाने की भूल से बाहर आयेंगे।सामान चीज़ ही परस्पर कनेक्ट होती हैं।

    मैं शरीर नहीं हूँ। ये शरीर मेरा है। ये हाथ मेरा है मैं हाथ नहीं हूँ। ये घर मेरा है मैं घर नहीं हूँ। मैं देही हूँ ,रथी हूँ रथ नहीं हूँ। ड्राइवर हूँ गाड़ी नहीं हूँ।

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  3. बहुत बढ़िया
    आपका पूरा ब्लॉग ही आध्यात्मिक है

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  4. बहुत सुंदरता से मन के बंधन से बाहर आने का अर्थ समझाया है ... आभार ...

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  5. अनुपमा जी, वीरू भाई, सरिक जी, लक्ष्मण जी, सैनी जी, दिगम्बर जी, उपासना जी आप सभी का स्वागत व आभार !

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