Wednesday, September 18, 2013

हुकुम रजाई चालिए

फरवरी २००५ 
जब जीवन का लक्ष्य तय हो जाता है तो रास्ता मिलने लगता है, हमारे अंतर की सच्ची पुकार कभी भी अनसुनी नहीं रहती, परम पिता परमात्मा हमारे लिए वह सारे साधन जुटा देता है जो हमारे विकास के लिए आवश्यक हैं. हमारा जीवन प्रकृति के सूक्ष्म नियमों द्वारा संचालित होता है. पूर्व में किये गये कर्मों के अनुसार हमारे भावी कर्म नियत होते हैं, प्रमादवश मानव स्वयं को कर्ता मानता है, लेकिन वास्तव में प्रकृति के गुणों के अनुसार ही उसके कर्म होते हैं. साधक साधना के द्वारा इन गुणों के पार जाना चाहता है. चेतना में जगा हुआ जीव ही सचेत होकर कर्म करता है, जब वह गुणों के पार चला जाता है.

5 comments:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल गुरुवार (19-09-2013) को "ब्लॉग प्रसारण : अंक 121" पर लिंक की गयी है,कृपया पधारे.वहाँ आपका स्वागत है.

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  2. चेतना में जगा हुआ जीव ही सचेत होकर कर्म करता है, जब वह गुणों के पार चला जाता है.

    गुनातीत होना माना सुख दुःख उसमें होकर गुज़र जाएँ बिना अपना प्रभाव छोड़े ऐसा व्यक्ति फिर भगवान् में स्थित हो जाता है भगवान् को प्राप्त हो जाता है।
    बहुत सुन्दर सार प्रस्तुत किया हैआपने अनिता जी।

    ॐ शान्ति

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  3. कहते हैं न मन साफ़ हो नियत में सच्चाई हो तो इंसान कुछ भी हासिल कर सकता है। पर मंजिल तक पहुँचने का रास्ता नेक हो या गलत, फल इसी जनम में मिलता है, क्योंकि स्वर्ग और नर्क दोनों यहीं हैं।

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  4. राजेन्द्र जी, वीरू भाई, व अपर्णा जी, आप सभी का स्वागत व आभार !

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  5. बहुत सत्य एवं सुन्दर ..

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