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Sunday, July 19, 2026

मन जब भीतर मुड़ जाएगा

 मानव की दृष्टि सदा बाहर की तरफ़ रहती है। सभी इंद्रियाँ मन को बाहरी जगत की खबर देने के लिए तत्पर रहती हैं। जरा कहीं खटका हुआ, कान उधर मुड़ जाते हैं, जरा कहीं सुगंध की लहर आयी, नासिका सजग हो जाती है। इस तरह हमारी सारी ऊर्जा जो हम भोजन और नींद से प्राप्त करते हैं, जगत का ज्ञान प्राप्त करने में ही व्यय होती रहती है। ऐसे में जब कोई ध्यान करने के लिए कहता है, तो आधे घंटे के लिए भी शांत होकर इंद्रियों को भीतर की ओर मोड़ने का अभ्यास नहीं सध पाता। उस समय भी मन बाहर की ओर ही जाता है, बंद आखों से ही हम कल्पना में देख लेते हैं कि शायद दरवाज़े पर कोई आया है। अथवा सुगंध बता रही है कि आज खाने में क्या बना है। इस तरह भीतर जाने का एक और अवसर निकल जाता है। इसलिए ध्यान में बैठने से पहले ही मन को यह समझा देना चाहिए, कि उसे अगले कुछ समय तक केवल देह के भीतर चल रहे कार्य-कलापों पर भी ध्यान देना है। सबसे पहले श्वास पर ध्यान टिकाना है, इसके बाद नासिका के आगे के स्थान पर। इस तरह इंद्रियाँ कुछ देर के लिए शांत रहना सीख जायेंगी और यह भी समझ जायेंगी कि हर समय हमें उनकी ज़रूरत नहीं है, आख़िर गहरी नींद में भी तो मन जगत से विमुख होता है।वास्तव में ध्यान जागते हुए नींद में रहना ही है, जब मन जागे-जागे सोया हुआ है, वही ध्यान है। ऐसे में मन स्वयं को देख पाने में समर्थ होता है, वरना तो वह जगत को देखने में ही लगा रहता है।  

Monday, March 17, 2025

आभारी हो मन यह प्रतिपल

जीवन में धन का अभाव हो या किसी भी और बात का, फिर भी उतनी हानि नहीं उठानी पड़ती जितनी हानि तब होती है जब मन में कृतज्ञता का अभाव हो। कृतघ्न व्यक्ति से ख़ुशी ऐसे ही दूर भागती है जैसे सिपाही को देखकर चोर। मानव रूप में जन्म मिला है, तो ईश्वर के प्रति इतनी कृतज्ञता हमारे मन में होनी चाहिए मानो कोई अनमोल ख़ज़ाना मिल गया हो। न जाने कितनी योनियों से गुजर कर हम आये हैं, चट्टान से वनस्पति, कीट, पक्षी, पशु होते हुए मानव का मस्तिष्क मिला है। इसके बाद माता-पिता के प्रति कृतज्ञता का पौधा मन में उगाना चाहिए जो कभी न सूखे, इसके लिए उसमें सदा ही स्नेह व आदर  का जल डालते रहना होगा। यदि जीवन में उत्साह और उमंग का आगमन निर्विरोध चाहिए तो अपने परिवार के प्रति, पति-पत्नी और बच्चों के प्रति कृतज्ञता जताने का कोई अवसर छोड़ना नहीं चाहिये। अपने शिक्षकों, गुरुजनों, लेखकों, और शासकों के प्रति भी हमें कृतज्ञ होना है। किसानों और व्यापारियों के लिए और समाज के हर उस व्यक्ति के प्रति कृतज्ञ होना है, जिसने हमारे जीवन को सरल और सुंदर बनाने में कोई न कोई योगदान दिया है। 


Sunday, April 21, 2024

लक्ष्य उच्च होगा जब अपना

मानव के सम्मुख लक्ष्य यदि स्पष्ट हो तो जीवन यात्रा सुगम हो जाती है। मन की समता बनी रहे तो भीतर का आनंद सहज ही प्रकट होता है, इसलिए योग के साधक के लिए मन की समता प्राप्त करना सबसे बड़ा लक्ष्य हो सकता है। परमात्मा तो सुख का सागर है ही, इसलिए भक्त के लिए परमात्मा के साथ अभिन्नता अनुभव करना उसका लक्ष्य है. निष्काम कर्मों के द्वारा कर्मयोगी कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाता है, इसलिए कर्मयोगी अपने कर्मों से समाज को उन्नत व सुखी देखकर  सुख का अनुभव करता है। तीनों का अंतिम लक्ष्य तो एक ही है, वह है आनंद ! देखा जाये तो सांसारिक व्यक्ति भी हर प्रयत्न सुख के लिए ही करते हैं, किन्तु दुःख से मुक्त नहीं हो पाते क्योंकि उन्होंने अपने सम्मुख कोई बड़ा लक्ष्य नहीं रखा. 


Wednesday, July 19, 2023

जाने क्या है राज अनोखा

संत जन सदा ही कहते हैं, मानव देह दुर्लभ है. वाणी भी इसी देह में सम्भव है. अनुभव करने की शक्ति, स्वयं को जानने की शक्ति, जीने की शक्ति, सोचने की शक्ति इसी में मिलती है. मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार इसी देह में प्राप्त होते हैं. इसी में रहकर परम का अनुभव किया जा सकता है. किसी अन्य के लिए परम का अनुभव नहीं करना है, परम के लिए भी नहीं, स्वयं के लिए. स्वयं का सही का आकलन करने के लिए ही उसका अनुभव करना है. हम उसी असीम सत्ता का अंश हैं, उसकी शक्ति हममें भी है, उस का अनुभव हम कर सकते हैं, यह देह इसी काम के लिए मिली है. वाणी का वरदान जो हमें मिला है, अब वह वाणी किसी को दुःख न दे, पूर्णता को प्राप्त हो. बुद्धि जो सदा छोटे दायरे में सोचती रही है, अब उस परम को ही भजे. हम पल-पल मृत्यु की ओर बढ़ने को ही जीवन कहे चले जाते हैं. इतना सुंदर जीवन केवल मृत्यु की प्रतीक्षा ही तो नहीं हो सकता, अवश्य ही इसके पीछे कोई राज है, और जिसका पता केवल परम ही बता सकता है.  

Tuesday, February 21, 2023

जीना यहाँ मरना यहाँ

उपनिषद कहते हैं सृष्टि पूर्ण है, पूर्ण ब्रह्म से उपजी है और उसके उपजने के बाद भी ब्रह्म पूर्ण ही शेष रहता है, सृष्टि ब्रह्म के लिए ही है. इस बात को यदि हम जीवन में देखें तो समझ सकते हैं मन पूर्ण है, पूर्ण आत्मा से उपजा है अर्थात विचार जहाँ  से आते हैं वह स्रोत सदा पूर्ण ही रहता है, मन आत्मा के लिए है. विचार ही कर्म में परिणित होते हैं और कर्म का फल ही आत्मा के सुख-दुःख का कारण है. यदि आत्मा स्वयं में ही पूर्ण है तो उसे कर्मों से क्या लेना-देना, वह उसके लिए क्रीड़ा मात्र है. हम इस सत्य को जानते नहीं इसीलिए मात्र 'होने' से सन्तुष्ट न होकर दिन-रात कुछ न कुछ करने की फ़िक्र में रहते हैं. जहाँ  हमें जाना है वहाँ  हम पहुँचे  ही हुए हैं. जैसे मछली सागर में है, पंछी हवा में है आत्मा परमात्मा में है. मछली को पता नहीं वह सागर में है, पंछी को ज्ञात नहीं वह पवन के बिना नहीं हो सकता, वैसे ही आत्मा को पता नहीं वह शांति के सागर में है. मीन और पंछी को इसे जानने की न जरूरत है न ही साधन हैं उनके पास पर मानव क्योंकि स्वयं को परमात्मा से दूर मान लेता है और उसके पास ज्ञान के साधन हैं, वह इस सत्य को जान सकता है. यही आध्यात्मिकता है, यही धार्मिकता है, यही साधना का लक्ष्य है.   प्रतिपल जीवन यह याद  दिलाता है, अनन्त ऊर्जा का एक स्रोत चारों और विद्यमान है. कितने ही लोग सूर्य ऊर्जा का इस्तेमाल कर रहे हैं और कितने ही पवन ऊर्जा का. युगों से ये स्रोत मानव के पास थे पर उसे वह उपाय नहीं ज्ञात था जिसके द्वारा मानव इनका लाभ ले सकता था. इसी तरह  ज्ञान, प्रेम, शांति, सुख की अनन्त ऊर्जा भी परमात्मा के रूप में हर स्थान पर विद्यमान है पर कोई जानकार  ही उसका अनुभव कर पाता है. 


Thursday, November 10, 2022

सच की राह पकड़ ले राही

दिखावा करना और दूसरों की नक़ल करने की आदत हमें जीवन में आगे बढ़ने से रोकती है। हम दिखावा करते हैं तो अहंकर को बढ़ावा देते हैं। दूसरों की नक़ल करते हैं तो असत्य को प्रश्रय देते हैं। संतुष्ट जीवन सत्य की राह से ही पाया जा सकता है, प्रामाणिकता वह पहली ईंट है जिस पर एक सुखद जीवन की इमारत खड़ी होती है। अहंकार चाहे कितना भी निर्दोष हो हमें अपने सच्चे स्वरूप से दूर ही रखता है। कोई भी व्यक्ति अपने आप में पूर्ण है क्योंकि दिव्य चेतना हर एक के भीतर विद्यमान है। अपनी निजता को पहचान कर हमें उस एकता को पाना है जिसके बाद न ही दिखावा करने की ज़रूरत रह जाती है और न ही किसी की तरह बनने की आकांक्षा।जैसे बगीचे में खिला हर पुष्प अनोखा है वैसे  हर  मानव अपनी निजी पहचान लेकर दुनिया में आता है, जन्म-जन्मांतर की यात्रा करके वह स्वयं की दिव्यता को पहचान कर अस्तित्त्व के साथ मिलकर कर्त्तव्य पथ पर आगे बढ़ता है। 


Sunday, October 23, 2022

एकै साधै सब सधै

इस जगत में जड़ पदार्थ और चेतना के पीछे कोई एक तत्त्व छुपा हुआ है, जिसने स्वयं को इन दो भागों में बाँट लिया है. जड़ पदार्थ में  वह  सत्ता रूप में स्थित है, मानव से इतर प्राणियों और वनस्पति में सत्ता व चेतना के  रूप में और मानव में सत्ता, चेतना व आनंद के रूप में. भौतिक जगत में रहते हुए हम अनेक वस्तुओं को देखते हैं, किन्तु उनके भीतर एकत्व का अनुभव नहीं कर पाते. अध्यात्म का अर्थ है इस विभिन्नता के पीछे उस एक्य को देख लेना। उस समरसता और एकता का बीज सभी के भीतर है, किंतु केवल मानव के भीतर वह सामर्थ्य है कि उसे पहचाने और अपने अहैतुक प्रेम, आनंद और शांति के रूप में बाहर व्यक्त करे। अध्यात्म से जुड़े व्यक्ति के लिए कर्म का अर्थ केवल अपना सुख प्राप्त करना नहीं है, उसके कर्म सारे जगत के कल्याण की भावना से भरे होते हैं। उसके मन की मूल भावना स्वार्थ से ऊपर उठ जाती है। ऐसे में वह स्वयं तो अपना कल्याण करता ही है, सहज ही जगत के प्रति मैत्री भाव से भर जाता है।

Thursday, September 29, 2022

सोहम का जो मर्म जानता

 हरेक मानव को अपने होने का आभास होता है। स्वयं के होने में किसी को संदेह नहीं है। जड़ वस्तु स्वयं को नहीं जान सकती। पर्वत नहीं जानता कि वह पर्वत है। केवल चेतन ही खुद को  जान सकता है। परमात्मा पूर्ण चैतन्य है। चेतना का स्वभाव एक ही है, जैसे बूँद हो या सागर दोनों में जल एक सा है। वही चेतना हर सजीव के भीतर उपस्थित है जो परमात्मा के भीतर है। इस तरह जीव और परमात्मा एक तत्व से निर्मित हैं। जीव यानी हम उससे पृथक हो ही नहीं सकते। शास्त्रों में ‘सोहम’ इसीलिए गाया है, अर्थात हम वही हैं। किंतु यदि हम स्वयं को जड़ देह अथवा मन मानते हैं तो हमारी आस्था का केंद्र भी भौतिक व दैविक होगा। अधिकतर मानव जड़ वस्तुओं की पूजा करते हैं या देवी-देवताओं से मन्नत माँगते हैं। शुद्ध चैतन्य के रूप में परमात्मा, स्वयं को चेतन जानने से प्रकट होता है; जिसे जानने के बाद जीवन से भय, असुरक्षा, अभाव, विषाद आदि जो कुछ भी जड़ता के साथ जुड़ा हुआ है, वह समाप्त हो जाता है। पुराने संस्कारों के अनुसार देह व मन से कर्म होते हैं पर आत्मा उनसे बंधती नहीं है। वह स्वयं के शुद्ध स्वरूप तथा परमात्मा से निकटता का अनुभव करती है।   

Thursday, September 8, 2022

प्रकृति का सम्मान करें हम

जीवन जिस स्रोत से आया है और जिसमें एक दिन समा जाएगा, जिससे सब कुछ हुआ है, जो पंच भूतों का स्वामी  है, जो जगत का कारण है, उसे ही जानना है। यहाँ जो भी हो रहा है, उन सब कारणों का जो  कारण है। जो हमारे जीवन का आधार है। हवा, पानी, अग्नि, आकाश का जो जनक है, मानव ने उसे भुला दिया और दिशा विहीन सा आज भटक रहा है। मानव ने केवल अपने सुख-सुविधा को महत्व दिया। केवल शरीर को आराम देने के लिए बड़ी-बड़ी इमारतें बना कर रहने लगा। प्रकृति से दूर हो गया। कुछ दूर चलने के लिए भी वाहन का इस्तेमाल करने लगा, जो वायु प्रदूषण करते हैं। जल को दूषित किया। भोजन के लिए हज़ारों का जीवों का नाश किया। हिंसा को प्रश्रय देने वाला मानव आज स्वयं प्रकृति की विनाश लीला का सामना कर रहा है। मौसम की मार से बचने के लिए किए गए उपाय आज काम नहीं आ रहे हैं। कहीं जंगलों में आग लगी है, धरती का तापमान बढ़ता जा रहा है,  अतिवृष्टि, बाढ़, तूफ़ान और भूकम्प आज सामान्य घटना बनते जा रहे हैं। वैज्ञानिकों की दी चेतावनी आज सत्य सिद्ध हो रही है। मानव को चेतना होगा कि जीवन को बनाए रखने के लिए प्रकृति के साथ सामंजस्य बनकर जीना ही उसके लिए एक मात्र उपाय है । 


Monday, July 18, 2022

अंतर में जब ध्यान सधे

महाभारत के शांति पर्व में मनु द्वारा बृहस्पति को दिया गया सुंदर उपदेश है जिसमें जीवन को सुखपूर्वक जीने का सुंदर मार्ग बताया गया है। प्रत्येक मानव को शारीरिक या मानसिक कष्टों का सामना जीवन में करना पड़ सकता है। यदि उन्हें  टालने का कोई उपाय दिखायी न दे तो शोक न करके उस दु:ख के निवारण का प्रयत्‍न करना चाहिये।उसे चाहिए कि कष्ट से होने वाले दुःख का चिंतन करना छोड़ दे। चिंतन करने से वह और भी बढ़ता है। शरीर के रोगों को दूर करने के लिए आवश्यक औषधियों का आश्रय लिया जा सकता है। मानसिक दुःख को बुद्धि और विचार द्वारा दूर करे। जगत अनित्य है, यह जानकर इसमें आसक्त नहीं होना है। जो मनुष्‍य सुख और दु:ख दोनों को छोड़ देता है, वह अक्षय ब्रह्म को प्राप्‍त होता है। अत: ज्ञानी पुरुष कभी शोक नहीं करते हैं। विषयों के उपार्जन में दु:ख है। अत: उनका नाश हो जाये तो चिन्‍ता नहीं करनी चाहिये।इसमे संदेह नहीं कि जीवन में सुख की अपेक्षा दु:ख ही अधिक है।परंतु जब साधक सबके आदिकारण निगुर्ण तत्त्व को ध्‍यान के द्वारा अपने अन्‍त:करण में प्राप्‍त कर लेता है, तब कसौटी पर कसे हुए सोने के समान ब्रह्म के यथार्थ स्‍वरूप का ज्ञान होता है।जब  बुद्धि अन्‍तर्मुखी होकर हृदय में स्थित होती है, तब मन विशुद्ध हो जाता है।​​ इस स्थिति में वह जगत में कमलवत रहता है। 


Monday, May 2, 2022

समाधान जो चाहे पाना

मानव को यदि अपनी उलझनों का समाधान चाहिए तो भीतर मिलेगा। मन की गहराई में जो शुद्ध चैतन्य है, जो सत् है, आनंद है, उसके सान्निध्य में मिलेगा। बाहर जगत में उलझाव है, प्रतिस्पर्धा है, तनाव है, बाहर सब कुछ निरंतर बदल रहा है। सागर में उठी लहरों की तरह जग निरंतर विनाश को प्राप्त हो रहा है। भीतर एक अवस्था ऐसी है जो सदा एकरस है, उसमें टिके बिना पूर्ण विश्रांति नहीं मिलती। वहाँ जाने में बाधा क्या है ? स्वयं के और दूसरों के बारे में हमारी धारणाएँ, मान्यताएँ और विचार ही सबसे बड़ी बाधा हैं। वह निर्विकल्प अवस्था है, मन कल्पनाओं का घर है। वहाँ प्रेम का साम्राज्य है, मन जगत में दोष देखता है। जब हम जगत को जैसा वह है पूर्ण रूप से वैसा ही स्वीकार करके मन को कुछ समय के लिए ख़ाली कर देते हैं तब उस शांति का अनुभव अपने भीतर करते हैं। 


Monday, February 21, 2022

भक्ति करे कोई सूरमा

संत कहते हैं, मानव के मन के भीतर आश्चर्यों का खजाना है, हजारों रहस्य छुपे हैं आत्मा में. जो कुछ बाहर है वह सब भीतर भी है. मानव यदि परमात्मा को भूल भी जाये तो वह किसी न किसी उपाय से याद दिला देता है. एक बार कोई उससे प्रेम करे तो वह कभी साथ नहीं छोड़ता. वह असीम धैर्यवान है, वह सदा सब पर नजर रखे हुए है, साथ है, उन्हें बस नजर भर कर देखना है. उसे देखना भी हरेक के लिए बहुत निजी है, बस मन ही मन उसे चाहना है, कोई ऊपर से जान भी न पाए और उससे मिला जा सकता है. उसके लिए अनेक शास्त्रों को पढ़ने की जरूरत नहीं, कठोर तप करने की जरूरत नहीं, बस भीतर प्रेम जगाने की जरूरत है. सच्चा प्रेम, सहज प्रेम, सत्य के लिए, भलाई के लिए, सृष्टि के लिए, अपने लिए और परमात्मा के लिए..जिस प्रेम में कभी परदोष देखने की भावना नहीं होती, कोई अपेक्षा नहीं होती, जो सदा एक सा रहता है, वह शुद्ध प्रेम है, वही भक्ति है. जिस प्रेम में अपेक्षा हो वह सिवाय दुःख के क्या दे सकता है ? दुःख का एक कतरा भी यदि भीतर हो, मन का एक भी परमाणु यदि विचलित हो तो मानना होगा कि मूर्छा टूटी नहीं है, मोह बना हुआ है. इस जगत में किसी भी मानव को जो भी परिस्थिति मिली है, उसके ही कर्मों का फल है. राग-द्वेष के बिना यदि उसे वह स्वीकारे तो कर्म कटेंगे वरना नये कर्म बंधने लगेंगे. 


Friday, December 31, 2021

नए वर्ष पर हार्दिक शुभकामनाएँ

अनंत काल से यह सृष्टि चल रही है, लाखों मानव आये और चले गये, कितने नक्षत्र बने और टूटे. कितनी विचार धाराएँ पनपी और बिखर गयीं. कितने देश बने और लुप्त हो गये. इतिहास की नजर जहाँ तक जाती है सृष्टि उससे भी पुरानी है, फिर एक मानव का सत्तर-अस्सी वर्ष का छोटा सा जीवन क्या एक बूंद जैसा नहीं लगता इस महासागर में, व्यर्थ की चिंताओं में फंसकर वह इसे बोझिल बना लेता है. हर प्रातः जैसे एक नया जन्म होता है, दिनभर क्रीड़ा करने के बाद जैसे एक बालक निशंक माँ की गोद में सो जाता है, वैसे ही हर जीव प्रकृति की गोद में सुरक्षित है. यदि जीवन में एक सादगी हो, आवश्यकताएं कम हों और हृदय परम के प्रति श्रद्धा से भरा हो तो हर दिन एक उत्सव है और हर रात्रि परम विश्रांति का अवसर !  हर बार नया वर्ष आकर हमें इस सत्य से अवगत कराता है कि जीवन का लक्ष्य भीतर के आनंद को पाना और उसे जगत में लुटाना मात्र है। 


Monday, June 14, 2021

स्वधर्म में जो टिक पाए

 भगवद्गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन से स्वधर्म में स्थित होकर युद्ध करने के लिए कहते हैं. स्वधर्म यानि आत्मा का धर्म, प्रेम और शांति का धर्म ! हृदय में प्रेम रहे और अंतर की गहराई में स्थित शांति का अनुभव होता रहे, उसके बाद ही कोई जीवन के संघर्ष में बिना किसी भय के उतर सकता है. यदि भीतर क्रोध है और मन अशांत है तो जीवन का संघर्ष हम लड़े बिना ही हार सकते हैं. यदि लड़ते भी हैं तो हमारी आधी ऊर्जा अपने आपको संभालने में ही व्यय होती है. हम अपने जीवन में कई धर्म निभाते हैं, एक मानव का धर्म, नागरिक का धर्म, पुत्र या पिता का धर्म, पति या पत्नी, शिष्य या शिक्षक का अथवा अपनी आजीविका कमाते समय अधिकारी या कर्मचारी का धर्म. ये सभी धर्म कभी-कभी एकदूसरे के विरोधी हो सकते हैं. देश सेवा करते हुए कोई अपने परिवार के प्रति उपेक्षा कर सकता है. कोई अपने काम में इतना खो जाता है कि परिवार स्वयं को उपेक्षित महसूस करता है. किन्तु यदि कोई आत्मा के धर्म में स्थित रहकर इन्हें निभाये तो सभी धर्म स्वतः ही निभने लगते हैं. जीवन में प्रेम और शांति के फूल खिले हों तो कोई भी कर्म सहज होता है उसके लिए विशेष श्रम नहीं करना पड़ता. इसी कारण श्रीकृष्ण अर्जुन को योगी होने का उपदेश देते हैं. 


Monday, May 17, 2021

जब समाज में सत्व बढ़ेगा

 पुराणों में कथा आती है, जब-जब पृथ्वी पर असुरों का भार बढ़ गया तो उनके विनाश के उपाय करने पड़े. असुरों के सींग नहीं होते, वे भी मानव ही होते हैं. उनमें दैवीय अथवा मानवीय गुणों की अपेक्षा आसुरी प्रवृत्तियां अधिक प्रकट होती हैं. सात्विक भावों से भरे मानव देवता होते हैं. सात्विक व राजसिक दोनों गुणों से युक्त मानव तथा राजसिक व तामसिक गुणों से भरे हुए लोग असुर कहलाते हैं. जब जीवन में सत्व की कमी हो जाती है, लोग ईमानदारी को अपवाद तथा बेईमानी को जीवन व व्यापार का सहज अंग मानने लगते हैं, मिलावट, कालाबाजारी बढ़ जाती है. रिश्वत लेकर या देकर काम निकालना बुरा नहीं समझा जाता. जब विद्यालयों में अध्ययन के साथ साथ व्यसनाधीन होने की सुविधा भी मिलती है, तब आसुरी प्रवृत्ति बढ़ने लगने लगती है. अहंकार, धन या बल का प्रदर्शन आसुरी गुण हैं. मानव को सन्मार्ग पर लाने के लिए अस्तित्त्व द्वारा समय-समय पर उपाय किये जाते हैं. सम्भवतः आज हम उसी दौर से गुजर रहे हैं, यदि मानव अब भी नहीं संभला तो भविष्य में और भी कठिन समय से गुजरना पड़ सकता है. 


Sunday, January 24, 2021

जहाँ विजय है लोकतंत्र की

कल देश का बहत्तरवाँ गणतंत्र दिवस है, कोरोना के कारण इस बार परेड में कुछ बदलाव हुए हैं, मुख्य अतिथि भी नहीं आ रहे हैं। राजधानी में किसानों के आंदोलन के कारण भी कुछ अनिश्चितता का वातावरण है। किन्तु कुछ भी हो, देश वासियों के दिलों में गणतंत्र दिवस मनाने का जोश उतना ही है। पिछले एक वर्ष में बहुत कुछ ऐसा हुआ जो पहले कभी नहीं हुआ था, लंबा लॉक डाउन, मजदूरों की घर वापसी, कोरोना के कारण अस्पतालों में मरीजों की बेतहाशा भर्ती, आर्थिक मंदी, स्कूलों का बंद होना और भी कितनी कठिनाइयों को झेलते हुए यह पिछला वर्ष पूरी दुनिया के लिए एक चिंता की वजह छोड़ गया है। इन सबके बावजूद मानव आगे की ओर देख रहा है,  वैक्सीन का निर्माण हो चुका है, कोरोना पर काफी हद तक नियंत्रण हो चुका है। भारत विश्व के कई देशों को इसकी वैक्सीन भेजने में सक्षम है, यह बात भी हमारे लिए कितने गर्व की है। एक बार फिर राजपथ पर सुंदर झाँकियाँ, बच्चों के द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम तथा सैन्य बलों का प्रदर्शन एक बार फिर यह सिद्ध कर देगा कि आपदा चाहे कितनी भी भीषण क्यों न हो मानवता अपना मार्ग ढूंढ ही लेती है। अंधेरा कितना भी घना क्यों न हो उजाले को रोक नहीं सकता। बांग्ला देश की आजादी की स्वर्णजयंती के अवसर पर वहाँ का एक सैन्य बैंड भी गणतंत्र दिवस परेड में भाग लेगा।  

 

Wednesday, October 28, 2020

मानव जन्म अमोल है

 

संतों से हम सभी सुनते आए हैं, मानव जन्म अनमोल है। मानव ही कर्म करके अपना भाग्य बदल सकता है। मानव से इतर सभी योनियाँ केवल भोग के लिए हैं। यदि हमारा जीवन मात्र सुख-सुविधा को बढ़ाते जाना है तो हम अपनी क्षमता का विकास नहीं कर सकते। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए उससे काम लेना, व्यायाम करना आवश्यक है तो मन को स्वस्थ रखने के लिए ध्यान साधना। प्राणों को सबल बनाने में प्राणायाम की बहुत बड़ी भूमिका है और बुद्धि को तीव्र करने हेतु अध्ययन, मनन, श्रवण और चिंतन की। आनंद को बढ़ाने के लिए संगीत, कला अथवा प्रात: व सांय काल का भ्रमण, प्रकृति का सान्निध्य आवश्यक है। यदि हमारी दिनचर्या इन सबके अनुकूल ढली हो तो व्यर्थ की चिंता अथवा किसी समस्या के लिए स्थान ही नहीं रह जाता। भारत की संस्कृति इतनी दिव्यता से परिपूर्ण है कि शास्त्रों में लगायी छोटी सी डुबकी भी भीतर तक तृप्त कर देती है। भारत का ज्ञान और योग आज सारे विश्व का मार्ग दर्शन कर रहा है। मानव धर्म सिखाने वाला सनातन मार्ग हमें सहज ही पूर्णता की ओर ले जाता है।

Monday, September 28, 2020

जीवन का जो मर्म जानता

 सृष्टि में प्रतिपल सबकुछ बदल रहा है. वैज्ञानिक कहते हैं जहाँ आज रेगिस्तान हैं वहाँ कभी विशाल पर्वत थे. जहाँ महासागर हैं वहाँ नगर बसते थे. लाखों वर्षों में कोयले हीरे बन जाते हैं. यहाँ सभी कुछ परमाणुओं का पुंज ही तो है. जीवन की धारा में बहते हुए ये सूक्ष्म कण कभी दूर तो कभी निकट आ जाते हैं. किन्तु जीवन नहीं बदलता, वह ऊर्जा है, सत्य है. सदा एक रस रहता हुआ वह इस प्रवाह को जानता है. वह साक्षी है और यह सारा विस्तार उसी से उपजा है. एक दिन उसी में लीन  होता है और पुनः नया रूप धर कर सृजित होता है. पदार्थ ऊर्जा में और ऊर्जा पदार्थ में बदलते रहते हैं. मानव इस बात को भुला देता है और सुख की तलाश में अपने हिस्से में दुखों का इंतजाम कर लेता है. जीवन का अर्थ उसके लिए क्या है ? जन्मना, बड़ा होना, वृद्ध होना और मर जाना, यही तो जीवन की परिभाषा है उसके लिए. उसकी आँख में उपजा हर अश्रु किसी अधूरेपन से उपजा  है. जब तक जीवन के वास्तविक रूप को नहीं जानता पूर्णता की यह तलाश जारी रहती है.

Tuesday, September 15, 2020

दिव्य चेतना जिसमें जागे

 संत कहते हैं दिव्यता मानव का स्वभाव है. जीवनी शक्ति दिव्य है, पंच तत्व दिव्य हैं तो फिर उनसे सृजित यह मानव भला दिव्य क्यों नहीं होगा. वैज्ञानिक भी कहते हैं यह सारा विश्व तरंगित है, एक ही ऊर्जा है जो विभिन्न प्रकार से व्यक्त हो रही है. इसका अर्थ हुआ उस परम की चेतन शक्ति ने स्वयं को व्यक्त करने के लिए अनेक नाम और रूप धारण किये हैं. इस जगत का जो भी मूल है वह शक्ति के माध्यम से प्रकट हो रहा है यह बात जब पहले-पहल किसी ऋषि ने जानी होगी,  तभी उसे अपनी दिव्यता का अनुभव हुआ होगा. ध्यान और स्वाध्याय के द्वारा साधक अपनी उसी दिव्य चेतना से जुड़ सकता है और जगत में रहते हुए भी जगत उसे प्रभावित नहीं कर पाता। जैसे अग्नि की दाहिका शक्ति से अग्नि को कोई हानि नहीं पहुँचती, इसी तरह चैतन्य को उसकी शक्ति प्रभावित नहीं कर सकती. साधना का लक्ष्य उस शक्ति को जगाना है, उसे जानकर ही उसके पर जाया जा सकता है.

Wednesday, September 2, 2020

सजग हुआ जो भीतर देखे

 संकल्प से ही सृष्टि का निर्माण होता है. सृष्टि परमात्मा की सुंदर कल्पना है. प्रकृति का सौंदर्य जहाँ-जहाँ अक्षुण्ण है, वहां देवों का वास है. मानव ने जिसे कुरूप कर दिया है वहाँ दानव बसते हैं. मन जब सुकल्पना के प्रांगण में विचरता है, मोर की तरह नृत्य करता प्रतीत होता है, उसके सौंदर्य की झलक भी मन में मिलती है. मोर जिनकी सवारी है वह देव क्या स्वतः ही वहां प्रकट नहीं हो जाते होंगे. जहाँ मन चिंताओं और कटुता  से भर जाता है, भूत-प्रेत वहाँ अड्डा जमा लेते हैं. सुंदर कल्पनाएं और भाव आत्मा की ही शक्ति है. भाषा का जन्म आत्मा की गहराई में होता है फिर शब्दों का चुनाव मन पर निर्भर करता है. वहां क्रोध भी है और करुणा भी, वहां असजगता भी है और जागरूकता भी. साधक को भीतर जाकर देखना होगा और चुनना होगा करुणा को अपने लिए , छोड़ देना होगा क्रोध. अनेक जन्मों में उसे ही तो चुना था और अपने लिए कर्मों का जाल बुना था.