जीवन जिस स्रोत से आया है और जिसमें एक दिन समा जाएगा, जिससे सब कुछ हुआ है, जो पंच भूतों का स्वामी है, जो जगत का कारण है, उसे ही जानना है। यहाँ जो भी हो रहा है, उन सब कारणों का जो कारण है। जो हमारे जीवन का आधार है। हवा, पानी, अग्नि, आकाश का जो जनक है, मानव ने उसे भुला दिया और दिशा विहीन सा आज भटक रहा है। मानव ने केवल अपने सुख-सुविधा को महत्व दिया। केवल शरीर को आराम देने के लिए बड़ी-बड़ी इमारतें बना कर रहने लगा। प्रकृति से दूर हो गया। कुछ दूर चलने के लिए भी वाहन का इस्तेमाल करने लगा, जो वायु प्रदूषण करते हैं। जल को दूषित किया। भोजन के लिए हज़ारों का जीवों का नाश किया। हिंसा को प्रश्रय देने वाला मानव आज स्वयं प्रकृति की विनाश लीला का सामना कर रहा है। मौसम की मार से बचने के लिए किए गए उपाय आज काम नहीं आ रहे हैं। कहीं जंगलों में आग लगी है, धरती का तापमान बढ़ता जा रहा है, अतिवृष्टि, बाढ़, तूफ़ान और भूकम्प आज सामान्य घटना बनते जा रहे हैं। वैज्ञानिकों की दी चेतावनी आज सत्य सिद्ध हो रही है। मानव को चेतना होगा कि जीवन को बनाए रखने के लिए प्रकृति के साथ सामंजस्य बनकर जीना ही उसके लिए एक मात्र उपाय है ।
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Thursday, September 8, 2022
Friday, October 8, 2021
समरसता जब सध जाएगी
जीवन में सामंजस्यऔर समरसता की साधना करने के लिए शरीर का अध्ययन अत्यंत आवश्यक है. शरीर का यदि पूरा ज्ञान हो और शरीर के अंगों पर ध्यान किया जाये तो अपने आप ही सामंजस्य की भावना भीतर आने लगती है. शरीर के विभिन्न अंग मिलजुल कर मस्तिष्क की सहायता से काम करते हैं, उसी प्रकार हम समाज में तथा परिवार में रहकर सामंजस्य बना सकते हैं, सबसे जरूरी है हमारा अपने साथ सम्बन्ध अर्थात हमारे मन, बुद्धि का आत्मा के साथ सम्बन्ध, फिर हमारा अपने निकटवर्ती जनों के साथ सम्बन्ध. जब हमारे शरीर की शक्ति का बोध हो जाता है तो प्रमाद, जड़ता तथा आलस्य नहीं रहता, भीतर एक स्फूर्ति का उदय होता है, वह स्फूर्ति हमारे सम्बन्धों में झलक उठती है, तब मन हर क्षण नया-नया सा रहता है, सम्बन्धों में बासीपन नहीं आता, कोई दुराग्रह नहीं रहता, मन तब एक अनोखी स्वतन्त्रता का अनुभव करता है, मन की ऐसी स्थिति कितनी अद्भुत है, कहीं कोई उहापोह नहीं, विरोध नहीं, कोई अपेक्षा नहीं, बिना किसी प्रतिकार व अपेक्षा के द्रष्टा भाव में जीना आ जाता है.
Monday, July 22, 2013
तन्द्रा त्याग जागरण मांगें
नवम्बर २००४
सामंजस्य की साधना करने के लिए शरीर का अध्ययन अत्यंत आवश्यक
है. शरीर का यदि पूरा ज्ञान हो और शरीर के अंगों पर ध्यान किया जाये तो अपने आप ही
सामंजस्य की भावना भीतर आने लगती है. शरीर के विभिन्न अंग मिलजुल कर मस्तिष्क की
सहायता से काम करते हैं, उसी प्रकार हम समाज में तथा परिवार में रह सकते हैं, सबसे
जरूरी है हमारा अपने साथ सम्बन्ध, हमारे मन का आत्मा के साथ सम्बन्ध, फिर हमारा
अपने निकटवर्ती जनों के साथ सम्बन्ध. जब हमारे शरीर की शक्ति का बोध हो जाता है तो
प्रमाद, जड़ता तथा आलस्य नहीं रहता, भीतर एक स्फूर्ति का उदय होता है, वह स्फूर्ति
हमारे सम्बन्धों में झलक उठती है, तब मन हर क्षण नया-नया सा रहता है, सम्बन्धों
में बासीपन नहीं आता, कोई दुराग्रह नहीं रहता, मन तब एक अनोखी स्वतन्त्रता का
अनुभव करता है, मन की ऐसी स्थिति कितनी अद्भुत है, कहीं कोई उहापोह नहीं, विरोध
नहीं, कोई अपेक्षा नहीं, बिना किसी प्रतिकार, अपेक्षा के द्रष्टा भाव में जीना आ
जाता है.
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