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Thursday, November 10, 2022

सच की राह पकड़ ले राही

दिखावा करना और दूसरों की नक़ल करने की आदत हमें जीवन में आगे बढ़ने से रोकती है। हम दिखावा करते हैं तो अहंकर को बढ़ावा देते हैं। दूसरों की नक़ल करते हैं तो असत्य को प्रश्रय देते हैं। संतुष्ट जीवन सत्य की राह से ही पाया जा सकता है, प्रामाणिकता वह पहली ईंट है जिस पर एक सुखद जीवन की इमारत खड़ी होती है। अहंकार चाहे कितना भी निर्दोष हो हमें अपने सच्चे स्वरूप से दूर ही रखता है। कोई भी व्यक्ति अपने आप में पूर्ण है क्योंकि दिव्य चेतना हर एक के भीतर विद्यमान है। अपनी निजता को पहचान कर हमें उस एकता को पाना है जिसके बाद न ही दिखावा करने की ज़रूरत रह जाती है और न ही किसी की तरह बनने की आकांक्षा।जैसे बगीचे में खिला हर पुष्प अनोखा है वैसे  हर  मानव अपनी निजी पहचान लेकर दुनिया में आता है, जन्म-जन्मांतर की यात्रा करके वह स्वयं की दिव्यता को पहचान कर अस्तित्त्व के साथ मिलकर कर्त्तव्य पथ पर आगे बढ़ता है। 


Sunday, October 25, 2020

विजय सभी की जब चाहें हम

 

आज दशहरा है, हजारों वर्षों से असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीक यह पर्व मानव को जीने का सही पथ दिखाता आ रहा है। रावण के दस सिर उसके अहंकार के प्रतीक हैं और राम की विजय उनके आदर्श की प्रतीक है। अब हमें यह निश्चय करना है कि  जिस अहंकार का एक दिन नाश ही होना है उसे प्रश्रय दें अथवा अपने मूल्यों पर दृढ़ रहकर एक ऐसे जीवन का निर्माण करें जो युगों-युगों से मानव का आदर्श बना हुआ है। अहंकार व्यक्ति को सबसे तोड़ता है, पहले रावण अपने भाई से दूर हो गया फिर अपनी पत्नी मंदोदरी से दूर हो गया, यहाँ तक कि अंतत: वह जगत से ही चला गया। रामायण की कथा अपने भीतर न जाने कितने संदेश छुपाये है। आज जब हर कोई महामारी के भय से आक्रांत है, समाज को मिलजुल कर एकदूसरे का सहयोग करते हुए जीने की कला सीखनी होगी। हम देख ही रहे हैं कि एक व्यक्ति को अपना जीवन यापन करने के लिए कितने ही लोगों का सहयोग चाहिए। सफाई कर्मचारी, आसपास के दुकानदार, डाक्टर, दूध-सब्जी विक्रेता, बैंक कर्मचार सीमा पर जवान, मीडिया के लोग, अध्यापक और न जाने कितने ही व्यक्तियों का सहयोग लेकर हमारा जीवन सुचारु रूप से आगे चल सकता है। हम समाज का अंश भी हैं और समाज भी हैं, समाज हमसे है और हम समाज से हैं। यदि हर व्यक्ति सभी के प्रति एक सद्भावना का विचार लेकर जीवन यापन करता है तो वह राम के पथ का अनुगामी है, यदि किसी भी कीमत पर केवल अपने सुख की कामना करता है तो रावण ही उसका आदर्श है।

Friday, July 26, 2019

सत के पथ पर चलना होगा



मानव जीवन सत्य से मिलने का एक अवसर है. शास्त्रों में सत्य की परिभाषा दी गयी है, जो सदा से है, सदा रहेगा, जिसमें कोई परिवर्तन नहीं होता पर जो सारे परिवर्तनों का आधार है. यदि हम अपने जीवन पर दृष्टि डालें तो शैशवावस्था नहीं रही, किशोरावस्था भी चली गयी, युवावस्था और प्रौढ़ावस्था भी टिकने वाली नहीं हैं. एक दिन यह तन भी नहीं रहेगा, अर्थात देह की अवस्थाएं सत्य नहीं हैं. जो इन सभी अवस्थाओं को देखने वाला था, वह सदा रहेगा. इसी तरह उदासी आई और चली गयी, ख़ुशी के पल आये और चले गये. हम सबका अनुभव है कि सुख-दुःख ज्यादा देर टिकते नहीं हैं, इनका आधार मन भी सदा अपने रंग-ढंग बदलता रहता है. यदि कोई इस मन की मानकर चलेगा तो सत्य से दूर ही रहेगा. शास्त्र और गुरूजन जो मार्ग दिखाते हैं, उस साधना के मार्ग पर चलकर ही हम मन के पार जाकर उसके आधार की झलक पाते हैं. यह सत्य से हमारा प्रथम मिलन होता है. जब इस ज्ञान का जीवन में प्रयोग आरम्भ हो जाता है, तब इसमें हमारी स्थिति दृढ़ होने लगती है और जीवन से असत्य का लोप होने लगता है.

Friday, February 2, 2018

उस विराट की करें कामना

३ फरवरी २०१८ 
सत्य के प्रति आग्रह जब मानव को देव बना देता है, महात्मा बना देता है, असत्य का आश्रय लेने वाला कहाँ पहुँचेगा इसकी कल्पना आसानी से की जा सकती है. अल्प की कामना करने से विराट कैसे मिल सकता है, उसके लिए तो विराट की ही कामना करनी होगी. इन्द्रियों व मन से मिलने वाला हर सुख अल्प है, मन के पार जहाँ द्वंद्व नहीं है, वहाँ आत्मा का सुख है, जो कभी खत्म नहीं होता. संत के मुख से यह बात सुनकर भी हमें भरोसा नहीं होता, हम छोटे-छोटे सुखों को ही अपनी झोली में भर कर प्रसन्न होते रहते हैं. ओस की बूंदों की तरह ये सारे सुख शीघ्र समाप्त हो जाते हैं, फिर खाली झोली लिए हम मायूस हो जाते हैं. क्यों न एक बार उस परमसुख की कामना करें जिसके गीत गाते हुए कृष्ण थकते नहीं.  

Wednesday, August 2, 2017

सांच बराबर तप नहीं

३ अगस्त २०१७ 
योग के साधक को आसन व प्राणायाम के साथ-साथ यम व नियम का पालन करना नहीं भूलना चाहिए. योग का अंतिम लक्ष्य मुक्ति की प्राप्ति है, जिसका अर्थ है सर्वदुखों से मुक्ति. जो मन के विकारों से मुक्त हुए बिना सम्भव ही नहीं है. यम और नियम मन को शुद्ध करने के उपाय हैं, सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य, ये पांच यम हैं तथा शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय तथा ईश्वरप्रणिधान ये पांच नियम हैं. सत्य के पालन करने का अर्थ है मनसा और वाचा में समता. जो मन में है वही वाणी से उजागर होने लगे तो साधक सत्य के निकट पहुँचने लगता है. किसी की कही बात को ज्यों की त्यों कहना, उसमें अपनी ओर से जरा भी फेर-बदल न करना, वस्तुओं, व्यक्तियों और परिस्थितयों को जैसी वे हैं वैसा ही देखना भी सत्य व्यवहार कहा जाता है. अपने लाभ के लिए असत्य का सहारा लेने वाला तो सत्य से बहुत दूर है.


Friday, April 24, 2015

जागो जागो माँ

जनवरी २००९ 
हम असत्य में ही जन्मते हैं, असत्य में ही जीते हैं और असत्य में ही मर जाते हैं. कामना हमारे जन्म का कारण है, वासना हमारे जीते चले जाने का कारण है और वासना ही हमारी मृत्यु का कारण है. असत्य हमारे स्वभाव में इस तरह घुलमिल गया है कि उसका भास तक हमें नहीं होता. इस मामले में हम बड़े वीर बन गये हैं. समय बीतता जा रहा है और हम व्यर्थ के कामों में लगे रहते हैं. श्वासें घट रही हैं, मृत्यु सिर पर नाच रही है और हम अब भी नहीं चेते. यह देह जो एक दिन आग की भेंट चढ़ जाने वाली है उसे तो रोज हम नहलाते-धुलाते हैं, और हम जो स्वयं बच जाने वाले हैं उसकी कोई फ़िक्र नहीं. पाँचों इन्द्रियों के घाट पर हम रहते आये हैं और वहीं रहने का इरादा कर लिया है. जिव्हा अपनी ओर खींचती है, कान मधुर सुनने को आतुर हैं. इन पर तो चलो नियन्त्रण कर भी लें, मन जो मनमानी करता है उसका क्या, बुद्धि जो मन के पीछे दौड़-दौड़ कर अपना अपमान करने से भी बाज नहीं आती. हजार बार ठोकर खाने के बाद भी हम सचेत नहीं होते. आखिर एक दिन तो जगना ही होगा. 

Tuesday, February 26, 2013

मन जब चुप होना सीखेगा


मौन में शांति है. जब अति आवश्यक हो तभी बोला जाये, तो हम वाणी के कई अपराधों से बच सकते हैं. अधिक बोलने से हम असत्य भी बोल सकते हैं, पर मन का मौन भी इतना ही आवश्यक है, जितना वाणी का. मन आखिर सुनाता ही किसको है ? स्वयं को ही सुनाता रहता है. सुने हुए को, कहे हुए को बार-बार दोहराता है. आत्मा तो उसको सुनना नहीं चाहता, अहंकार को ही सुनाता होगा, तो यदि भीतर शांति चाहिए तो अहंकार रूपी श्रोता को भगा देना होगा. ध्यान में जैसे-जैसे हम गहरे जाते हैं, अहंकार से मुक्त होते जाते हैं, तभी शांति का अनुभव होता है. 

Sunday, October 28, 2012

दिल का फसाना



बुराई की बहुत सारी शक्लें हैं, बहुत सारे चेहरे हैं, पर बुराई अपनी असली शक्ल हमें नहीं दिखाती. वह सदा अच्छाई का लिबास ओढ़ कर आती है, उसमें इतनी हिम्मत नहीं कि अपने असली रूप में सामने आये. हम जब असत्य बोलते हैं तो यही कहते हैं कि सत्य बोल रहे हैं. बेईमानी करने वाला भी स्वयं को ईमानदार घोषित करता है. फरेब, धोखा, जुर्म सभी इतने कमजोर हैं कि उनको करने वालों को उनसे कोई सहारा नहीं मिल सकता. विकारों में उतनी ताकत नहीं जितनी संस्कारों में है. मानव का हृदय दोनों में से किसी की आधीनता स्वीकार नहीं करता. दिल ही हमारा सच्चा निर्णायक है. वह हमारा साथ तभी तक देता है जब तक हम सच्चाई के रास्ते पर चलते हैं, गलत कार्य करना तो दूर उसका विचार ही हमारे दिल को बेकाबू कर देता है. वह धड़क कर हमसे शिकायत करता है, हमें टोकता है, कचोटता है जिससे हम पुनः सही मार्ग पर आ सकें. अपने दिल पर यदि किसी की हुकुमत चलती है तो वह है उस दिलबर कि जो सारी कायनात का मालिक है, जिसने इस खूबसूरत दिल को बनाया है, यह खूबसूरत भी तभी तक है जब तक इसमें उसका निवास है.

Wednesday, January 18, 2012

सत्य और असत्य


अक्तूबर २००२ 
सत्य एक है, सत्य ही धर्म है, सत्य ही वह पथ है जिस पर चल कर सत्य का अनुभव होता है. हमारे भीतर जो हलचल असत्य बोलने पर होती है वह सत्य की ही खबर देती है. कितनी ही बार हम बिना झिझके असत्य बोल जाते हैं, कभी सहज भाव से कभी विनोद में ही, कितना भी निर्दोष हो हमारा असत्य सत्य पर ही एक आवरण डाल रहा होता है. जितना-जितना हम इस बात को स्वीकार करते हैं, सत्य भी स्पष्ट होता जाता है और एक दिन असत्य झर जाता है. साक्षी भाव जब सधता है तब जो भी भीतर घटता हो उसे सहज भाव से देखते हुए ही हम विकार से मुक्त हो जाते हैं. सजग होकर आखिर कितनी देर तक हम पथ से दूर रह सकते हैं.

Friday, June 24, 2011

जीवन



जून २००० 
सार्थक जीवन, सही मायनो में जीना अथवा वास्तविक जीवन क्या है, यह प्रश्न हर कोई कभी न कभी  खुद से पूछता है. जीने को तो हम सभी जिए चले जा रहे हैं. लेकिन अपनी सारी योग्यताओं, क्षमताओं को पहचाने बिना, हमें अपने सामर्थ्य का ज्ञान ही नहीं है. जीवन की गहराई में गए बिना एक अधूरा-अधूरा सा उथला-उथला सा जीवन जीते जाते हैं कि जीवन की शाम हो जाती है. कितने ही निराधार भय, अनेकों व्यर्थ दुश्चिंताएं, व्यर्थ की कल्पनाएँ करते रहते हम अपने आस-पास की सच्चाई को नहीं देखते. बस कल्पना के असत्य को ही सत्य मान कर उसके पीछे दौड़ते रहते हैं. सत्य ठोस और स्थूल नहीं होता सो हम उसे देख नहीं पाते. मन को व्यर्थ के झाड़-झंखाड़ से भरे उन्हीं कंटीली पगडन्डियों पर उलझते चलते रहते हैं. अपने को सीमा में बांध हम एक कैदी का सा जीवन व्यतीत करते हैं, जबकि हमारे भीतर उन्मुक्त गगन में उड़ने की क्षमता मौजूद है. बस जागरण की ओर कदम बढ़ाने भर की देर है.