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Wednesday, July 19, 2023

जाने क्या है राज अनोखा

संत जन सदा ही कहते हैं, मानव देह दुर्लभ है. वाणी भी इसी देह में सम्भव है. अनुभव करने की शक्ति, स्वयं को जानने की शक्ति, जीने की शक्ति, सोचने की शक्ति इसी में मिलती है. मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार इसी देह में प्राप्त होते हैं. इसी में रहकर परम का अनुभव किया जा सकता है. किसी अन्य के लिए परम का अनुभव नहीं करना है, परम के लिए भी नहीं, स्वयं के लिए. स्वयं का सही का आकलन करने के लिए ही उसका अनुभव करना है. हम उसी असीम सत्ता का अंश हैं, उसकी शक्ति हममें भी है, उस का अनुभव हम कर सकते हैं, यह देह इसी काम के लिए मिली है. वाणी का वरदान जो हमें मिला है, अब वह वाणी किसी को दुःख न दे, पूर्णता को प्राप्त हो. बुद्धि जो सदा छोटे दायरे में सोचती रही है, अब उस परम को ही भजे. हम पल-पल मृत्यु की ओर बढ़ने को ही जीवन कहे चले जाते हैं. इतना सुंदर जीवन केवल मृत्यु की प्रतीक्षा ही तो नहीं हो सकता, अवश्य ही इसके पीछे कोई राज है, और जिसका पता केवल परम ही बता सकता है.  

Wednesday, March 1, 2023

द्रष्टा में जो रहना सीखे

 परमात्मा ही वास्तव में ज्ञाता-द्रष्टा है, मन में उसका प्रतिबिम्ब पड़ने से जीवात्मा की उत्पत्ति होती है। जैसे चंद्रमा पर सूर्य की रोशनी पड़ती है तो ज्योत्सना का जन्म होता है। वह अपना स्वतंत्र अस्तित्त्व मानक प्रकृति  पर अपना अधिकार जताना चाहता है, पर सदा से विफल होता आया है।  परमात्मा स्वयं को विभिन्न रुपों में प्रकट करना चाहता है। उसके अनंत गुण हैं, जिनका प्रकटीकरण एक से नहीं हो सकता, वह हज़ार रुपों में अपनी विभूतियों  और शक्तियों को प्रकट करना चाहता है; जीवात्मा उन्हें निज सम्पत्ति मान लेता है, वह उनका सुख लेना चाहता है, अहंकार का पोषण करना चाहता है पर उससे दुःख ही पाता है। यदि कलाकार अपनी कला का अभिमान करे तो दुखी होने ही वाला है।यदि वरदान समझकर जगत में अन्य लोगों को उससे सुख पहुँचाए तो वह परमात्मा का सहयोगी बन जाता है। जब कोई इंद्रियों के द्वारा जगत का सुख लेना चाहता है तो उसकी क़ीमत शक्ति का व्यय करके चुकानी पड़ती है। देह दुर्बल होती है, इंद्रियाँ कमजोर होती हैं और एक दिन जीवन का अंत आ जाता है। यदि जीते जी ही इनके प्रति आकर्षण से मुक्त होना सीख लें तो सचेत होकर मृत्यु का वरण किया जा सकता है तथा जब तक जग में हैं आनंद का अनुभव सहज ही होता है। 

Wednesday, November 25, 2020

मुक्त हुआ है जो प्रमाद से

बुद्ध कहते हैं, प्रमाद मृत्यु है। प्रमाद अर्थात जानते हुए भी कि यह अनुचित है उससे छूटने का प्रयास न करना और जानते हुए भी कि यह सही है, उसे न करना। हम सभी जानते हैं रात्रि में जल्दी सोना और सुबह जल्दी उठना स्वास्थ्य के लिए अच्छा है, सात्विक और हल्का भोजन, स्वाध्याय, सेवा, सत्संग, नियमित व्यायाम और ध्यान; शारीरिक और मानसिक आरोग्य के लिए जरूरी है, पर क्या इसका पालन करते हैं। मृत्यु के क्षण में जब देह जड़ हो जाती है और चेतन शक्ति बाहर से उसे जरा सा भी हिला नहीं पाती, तब उसे वे पल स्मरण हो आते हैं जब जीवित रहते हुए इस देह को हिलाया जा सकता था, तब श्रम से बचते रहे। जब पैरों में दौड़ने की ताकत थी, हाथों में काम करने की शक्ति थी, मन में चिंतन का बल था, अब यह देह पत्थर की हो गई है, पर उस वक्त जब देह में स्पंदन था, मन को कितनी बार पत्थर सा नहीं बना लिया था, जिससे कोमल भाव झर सकते थे, जिससे मैत्री और करुणा के गीत फूट सकते थे, उससे द्वेष और रोष को उगने दिया था। मृत्यु के बाद वह सब याद आता है जो करना शेष रह जाता है, जो अभी किया जा सकता है, उस सबके प्रति जागना ही प्रमाद से मुक्त होना है। 

Monday, September 28, 2020

प्रकृति का सम्मान करे जो

 दुनिया में कोरोना से मरने वालों का आंकड़ा बढ़ता ही जा रहा है। मौत की खबर अब किसी को पहले की भांति नहीं कंपाती। मृत्यु एक संख्या बनकर रह गई है। मृत व्यक्तियों का अंतिम संस्कार भी कई बार अस्पताल द्वारा ही अजनबियों के हाथों कर दिया जाता है। सफेद बैगों में बंद वे तन अपनों के अंतिम स्पर्श व दर्शन से भी वंचित हो जाते हैं।कुछ दिन पहले उनके भीतर भी धड़कते दिल थे, उन्हें भी यकीन था कि कोरोना उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा। वे भी शक्ति के एक पुंज थे और उसी अनंत स्रोत से आए थे।  मानव को अब जागकर देखना होगा कि  जीवित रहना कितना सरल है यदि वह हवा को मैला  न करे। मिट्टी से जुड़ा रहे. कीट नाशक दवाओं का अंधाधुंध प्रयोग न करे। दूध में रसायन न मिलाए। सब्जियों और फलों को इंजेक्शन न लगाए।  समुद्री जीवन हो या बर्फीले स्थानों के प्राणी और वनस्पति, कहीं भी मानव की नीतियों का गलत असर न हो। जीवन का स्रोत तो एक ही है, यदि प्रकृति के साथ प्रेमपूर्ण व्यवहार  होगा तो वह देख पाएगा जीवन कितना सुंदर है। झरनों का संगीत, वर्षा  की रिमझिम, हवाओं का स्पर्श, नदियों के तट की सुषमा सभी को अनुभव करके दैवी गुणों का विकास हो तो प्रकृति का शांत रूप ही प्रकट होगा। 


Thursday, June 27, 2019

स्वयं को जान लिया है जिसने



संत और शास्त्र कहते हैं, 'स्वयं को जानो', इसके पीछे क्या कारण है ? अभी हम स्वयं को देह मानते हैं, इस कारण जरा और मृत्यु का भय कभी छूटता ही नहीं. देह वृद्ध होगी और एक न एक दिन उसे त्यागना होगा. यदि कोई स्वयं को प्राण ऊर्जा मानता है, तो उसे भूख व प्यास सदा सताते रहेंगे. समय पर या पसंद का भोजन न मिले तो कितने लोग संतुलन ही खो देते हैं. भोजन के प्रति आसक्ति का कारण है प्राणमय कोष में निवास. कोई-कोई इससे आगे बढ़ जाते हैं और मन में रहने लगते हैं, कलाकार, कवि, लेखक उनका मन ही उनका संसार होता है. पर मन कभी शोक और मोह से मुक्त होता ही नहीं. अतीत का शोक और भविष्य के प्रति मोह उन्हें चैन से कहाँ रहने देता है. जब हम स्वयं को शुद्ध चेतन स्वरूप में जान जाते हैं, जरा-मृत्यु, भूख-प्यास, शोक-मोह सभी से परे जा सकते हैं. अपने भीतर एक शांत, आनन्दमयी स्थिति को अखंड रूप से अनुभव कर सकते हैं, तब भी देह अशक्त होगी, इसका अंत भी होगा पर इसका भय नहीं होगा. भूख लगने पर भोजन भी करेंगे और प्यास लगने पर जल भी ग्रहण करेंगे पर इनके प्रति आसक्ति नहीं होगी. समुचित आहार स्वस्थ रहने में भी सहायक होगा. विषाद का सदा के लिए अंत हो जायेगा और मोह की जगह निस्वार्थ प्रेम सहज ही प्रकट होगा. इसीलिए शास्त्र कहते हैं, स्वयं को जानना खुद के लिए ही सच्चा सौदा है.

Thursday, June 6, 2019

निकट आ गया जो स्वयं के ही



दिन-रात, सुबह-शाम, सर्दी-गर्मी सभी कुछ तो अपने आप हो रहे हैं. जन्म-मृत्यु, स्वास्थ्य-रोग, सुख-दुःख, यश-अपयश भी अपने आप आते-जाते हैं. मानव की भूमिका इसमें कहाँ आरम्भ होती है ? कितना अच्छा हो कि पूर्वजों की सीख के अनुसार वह दिन में पूरी निष्ठा से कार्य करे और रात्रि को विश्राम करे. सुबह-शाम दोनों समय संध्या करे अर्थात कुछ देर शांत होकर बैठे और अस्तित्त्व के साथ अपनेपन को अनुभव करे. सर्दी में सर्दियों का आहार-विहार अपनाये और गर्मियों में उस ऋतु के अनुसार स्वयं को ढाले. जन्म-मृत्यु दोनों का स्वागत करे, स्वास्थ्य-रोग दोनों में पथ्य-अपथ्य का ध्यान रखे. सुख-दुःख में मन को समता में रखे. यश-अपयश को साक्षी भाव से सहन करे. आज विश्राम खो गया है, संध्या खो गयी है, ऋतुु के अनूरूप आहार-विहार खो गया है और भक्ष्य-अभक्ष्य का विवेक भी नहीं रहा. जन्म को रोका जा रहा है, मृत्यु को दूर खिसकाया जा रहा है. नकली मुस्कान को सुख का पर्यायवाची मान लिया गया है और दुःख से सीखने की बजाय किसी न किसी तरह उसे भुलाने का प्रयत्न चलता है. स्वयं ही स्वयं का यशगान होता है और जरा सी उपेक्षा आहत कर देती है. मानव जैसे अस्तित्त्व से दूर हो गया है. जरूरत है एक बार फिर अपने भीतर लौटने की, और सब कुछ बदल जाता है.

Sunday, March 11, 2018

जिस मरने से जग डरे


११ मार्च २०१८ 
हम जीवन से प्रेम करते हैं पर मृत्यु से डरते हैं. यह जानते हुए भी कि एक दिन यह देह छूटने वाली है, मृत्यु के बारे में जानना तो दूर सोचना भी नहीं चाहते. सुकरात को जब जहर दिया गया तो उसने अपने साथियों से कहा, मृत्यु कैसे आती है मैं अपने अनुभव से तुम्हें बताता हूँ, इसे लिख लो. जीवन रहते जो स्वयं से परिचित हो जाता है, उसे कैसा भय, और स्वयं के सच्चे स्वरूप से परिचित न भी हो तब भी जो घटना निश्चित ही घटने वाली है, उससे परिचित होने में हमें क्यों देर करनी चाहिए. किसी की मृत्यु अचानक आती है, उसे सोचने का भी समय नहीं मिलता, कोई लम्बी या छोटी बीमारी के कारण देह त्यागता है. दोनों ही स्थितियों में यदि मरने वाला पहले से ही मृत्यु के लिए तैयार हो तो उसका और उसके सम्बन्धियों का दुःख-दर्द काफी कम हो जायेगा. देखा जाये तो हर घड़ी हम अंत की और बढ़ ही रहे हैं, देर-सवेर वह अंतिम घड़ी आने ही वाली है. शास्त्रों के द्वारा हो या चिकित्सा विज्ञान के द्वारा किसी भी भांति हमें जीवन रूपी सिक्के के दूसरे पहलू को भी देख लेना होगा.

Thursday, December 21, 2017

जीना यहाँ मरना यहाँ

२२ दिसम्बर २०१७ 
जीवन और मृत्यु देखने में विपरीत लगते हैं पर वास्तव में एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. जीवन आरम्भ हुआ उससे पूर्व आत्मा एक देह त्याग कर आई थी. शिशु बड़ा हुआ, किशोर और युवा होने तक देह विकसित होती रही, फिर प्रौढ़ावस्था और बुढ़ापा आने पर देह सिकुड़ने लगी और एक दिन आत्मा ने पुनः शरीर को त्याग दिया. जीवन के साथ-साथ ही मृत्यु की धारा भी निरंतर बहती रहती है. हमें एक देह में रहते-रहते उसी तरह उससे लगाव हो जाता है जैसे किसी को अपने ईंट-पत्थरों के घर से हो जाता है, घर बदलते समय भीतर कैसी हूक उठती है, उसी तरह आत्मा को नई देह मिलेगी पर इस जर्जर देह को त्यागने में उसे अत्यंत कष्ट होता है. धरती का आकर्षण उसे अपनी ओर खींचता है और अनजान का भय भी सताता है.

Thursday, September 7, 2017

जीवन का जो मर्म जान ले

८ सितम्बर २०१७ 
जीवन कितना पुराना है कोई नहीं बता सकता, वैज्ञानिकों को मानव के लाखों वर्ष पुराने जीवाष्म भी  मिले हैं. हम न जाने कितनी बार इस धरती पर आये हैं और भिन्न देहें धारण करके सुख-दुःख का भोग कर चुके हैं. शास्त्र कहते हैं यह देह हमें दो कारणों के लिए मिली है भोग और मोक्ष, पहला अनुभव तो हो चुका, जब तक दूसरा नहीं होगा, बार-बार देह लेकर आना होगा और मृत्यु को प्राप्त होना होगा. यदि त्याग पूर्वक भोग किया जाये तो मुक्ति का अनुभव इसी जन्म में हो सकता है. मानव जीवन के चार पुरुषार्थ भी यही कहते हैं. धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का कर्म कहता है कि धर्म पूर्वक प्राप्त किया गया अर्थ ही कामनाओं के त्याग का हेतु बनता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है. यदि धन अनीति से प्राप्त किया गया है वह कामनाओं को बढ़ाने वाला ही होगा. उस स्थिति में दुखों से मुक्ति सम्भव ही नहीं है. 

Sunday, September 3, 2017

मृत्यु को जो मीत बना ले

३ सितम्बर २०१७ 
प्रकृति पल-पल बदल रही है, चाहे पेड़-पौधों की हो, पशुओं की हो या मानवों की. समय के साथ-साथ उनमें परिवर्तन आ रहा है. मानव को छोड़कर सब उसे सहज ही स्वीकारते हैं, वृक्ष बूढ़े होते हैं और देह त्याग देते हैं. मानव अजर-अमर रहना चाहता है, जरा को जितना हो सके दूर रखना चाहता है और मृत्यु से सदा ही भयभीत रहता है. यहाँ तक कि वृद्ध हो जाने पर भी उसे ऐसा नहीं लगता कि कोई भी क्षण जीवन का अंतिम क्षण हो सकता है. यदि बचपन से ही जीवन और मृत्यु दोनों की बात घर-परिवार, विद्यालय में की जाये तो कितने तरह के दुखों से बचा जा सकता है. तब न तो अधिक संग्रह करने की प्रवृत्ति का जन्म होगा और न ही मन में भय होगा. जीवन को सम्मान मिलेगा यदि यह सदा स्मरण रहे कि यह कभी भी हाथ से जा सकता है. मन में किसी के प्रति द्वेष नहीं रहेगा जब यह स्मरण रहेगा कि एक दिन सब कुछ छूटने ही वाला है. 

Saturday, July 22, 2017

निज स्वभाव है सदा एक रस

२३ जुलाई २०१७ 
संत, शास्त्र और हमारे जीवन के अनुभव हमें बताते हैं कि धर्म ही हमें थामता है. धर्म जो हमारा स्वभाव है, वही ताओ है, वही नियम है, वही ऋत है और वही जानने योग्य है. हम इस जीवन में अनेक लोगों से मिलते हैं पर खुद से मिलना मृत्यु तक टालते रहते हैं. हम जगत को महत्व देते हैं पर जो इस जगत को देखता है, उस आत्मा को अनदेखा ही रहने देते हैं. द्रष्टा दृश्य से बड़ा है या छोटा ? छोटी सी आँख में इतना बड़ा आकाश समाने की शक्ति है, छोटे से मन में सारा ब्रह्मांड समा जाता है. कितनी अपार शक्ति है हमारे भीतर. अनेक जन्मों के अनंत संस्कार मन पर अंकित हैं. स्वयं को पहचान कर ही हम सदा अडोल रह सकते हैं.

Tuesday, April 4, 2017

जीवन बन मुस्कान बंटे

५ अप्रैल २०१७ 
जीवन क्या है, इसकी समझ आते-आते ही आती है,  कभी कभी तो मृत्यु के द्वार पर जाकर ही आती है, किन्तु उस समय उसका कोई अर्थ नहीं रह जाता. नया शरीर पाकर फिर दुनिया की रंग रलियों में उलझ कर मन रह जाता है और जीवन से मुलाकात ही नहीं हो पाती. जिसे आमतौर पर हम जीवन कहते हैं, वह तो एक बंधी-बंधायी दिनचर्या है, क्रिया और प्रतिक्रिया का एक निरंतर चल रहा खेल है. मन एक तरह से सोचना सीख जाता है और तमाम उम्र उन्हीं दायरों में खुद को कैद कर सुरक्षित होने का भ्रम पाल लेता है. जीवन का गीत अनगाया ही रह जाता है. प्रकृति को निकट से देखें तो प्रतिपल जीवंतता का अनुभव होता है, शिशु और पशु-पक्षी भी एक तरह से जीवन के अत्यंत निकट होते हैं. इसका अर्थ यह नहीं है कि शिशु को विकसित नहीं होना है या मानव को पशु और प्रकृति में फिर से लौट जाना है. जीवन को एक विशाल दृष्टिकोण से देखना है, मानव की भूमिका व उसकी महत्ता को अनुभव करना है. जैसे प्रकृति, प्राणी व शिशु सहज ही तृप्त हैं, वैसे ही हर मनुष्य यदि भीतर एक तृप्ति का अनुभव करे तो विकास के नाम पर अनावश्यक दोहन नहीं होगा. विकास करके मानव सुख ही तो पाना चाहता है, पर दुःख के साधन बढाये चला जाता है, जीवन स्वयं मुस्कुराने और जगत में मुस्कुराहट बांटने के लिए है यह भाव जगते ही सारे अभाव नष्ट हो जाते हैं.

Wednesday, February 8, 2017

मृत्यु जीवन का सच है

८ फरवरी २०१७ 
संत कहते हैं मन में सदा मृत्यु का स्मरण रखना चाहिए, मृत्यु किसी भी पल हमें अपना ग्रास बना सकती है. वह हमारे दो कदम पीछे ही चल रही है साथ-साथ. वास्तव में हर पल हम अपनी मृत्यु के लिए मार्ग बना रहे हैं., हर नया दिन मृत्यु को और करीब ले आता है. हम इस सबसे अनभिज्ञ ऐसे जिए चले जाते हैं जैसे सदा ही बने रहेंगे. जीवन की भव्यता से भी परिचित नहीं पाते, यदि किसी को यह पता चल जाये कि कल उसे मरना है तो वह आज को किस शिद्दत से न जियेगा. संत ऐसे ही जीते हैं हर पल को गहराई से महसूस करते हुए, कुदरत के नजरों को देख निहाल होते हुए और मन को सदा हल्का और खाली रखते हुए. इसका अर्थ हुआ मृत्यु ही जीवन को सुंदर बनाती है.

Tuesday, December 20, 2016

मर्म धर्म का जानेंगे जब

२० दिसम्बर २०१६ 
धर्म के जिस रूप को हम जानते और मानते हैं, जिसमें मूर्ति पूजा भी शामिल है और व्रत-उपवास भी, धार्मिक उत्सवों और कुछ रीति-रिवाजों का पालन भी, उससे हम वास्तविकता से दूर ही रह जाते हैं, स्वयं की वास्तविकता, जगत की वास्तविकता और परमात्मा की वास्तविकता इन तीनों से दूर. जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त हम किसी अज्ञात ख़ुशी की आशा किये चले जाते हैं, जो एक न एक दिन मिलने वाली है. जीवन एक उत्सव कम संघर्ष अधिक ज्ञात होता है. सुख की आशा में हम तात्कालिक दुःख को भी हँसते-हँसते झेल जाने को तैयार रहते हैं, किंतु सच्चा धर्म सदा के लिए हर दुःख से मुक्ति का मार्ग सुझाता है. 

Monday, December 5, 2016

मन है छोटा सा

६ दिसम्बर २०१६ 
जैसे हम अपने घर में वस्तुओं का संग्रह करते रहते हैं, न केवल आवश्यक वस्तुओं का बल्कि कई बार तो ऐसी वस्तुओं का भी जिनकी आवश्यकता कभी नहीं पड़ती अथवा तो पुरानी वस्तुएं जिनकी उपयोगिता भी नहीं रही ; उसी तरह हम मन में विचारों का भी संग्रह करते चले जाते हैं, मन जो एक उपवन बन सकता था उसे अस्त-व्यस्त जंगल बना देते हैं जहाँ  यादों के जाल  हैं और मान्यताओं और विश्वासों के कैक्टस भी. जहाँ  फूल खिलने के लिए सूर्य की रौशनी को पहुँचने  के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती है. आस-पास का वातावरण खुला-खुला हो, जरूरतें कम हों तो मन भी हल्का रहता है और इसका सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि  इस दुनिया से रुखसत करते समय हमें अल्प पीड़ा होगी क्योंकि जो छूट रहा होगा वह थोड़ा सा ही होगा।

Thursday, June 18, 2015

मोह मिटे से हो जागरण

फरवरी २०१० 
मृत्यु के साथ यदि हमारी मित्रता हो तभी हम धर्म के पथ से विमुख रहकर भी प्रसन्न रहने की आशा रख सकते हैं. ऐसा हो नहीं सकता तो हमें मोह तथा आसक्ति को छोड़कर अनासक्ति का मार्ग चुनना ही पड़ेगा. मोह ही दुःख का सबसे बड़ा कारण है. मोह का अर्थ है विपरीत ज्ञान, विवेकहीनता तथा असजगता. विपरीत ज्ञान अर्थात स्वयं को केवल देह और मन तक ही सीमित मानना. मन उदास होता है तो शरीर अस्वस्थ होने ही वाला है. हमारी नकारात्मक भावनाएं शरीर पर प्रभाव डाले बिना नहीं रह सकतीं. बुद्धि यदि निर्मल न रही तो सही-गलत का भी बोध नहीं रहता. मन के पार जाकर ही उस आनंद का अनुभव होता है जो दिव्य है.   

Saturday, June 6, 2015

बनें साक्षी हम पल पल के

अगस्त २००९ 
हमारे जीवन में हजारों, लाखों, करोड़ों, अरबों या कहें कि अनंत पल खुशियों के आते हैं, बल्कि कहें कि हमारा जीवन सुख व आनंद की एक अनवरत श्रंखला है, अनगिनत जन्मों को जोड़कर देखें तो न जाने किस अतीत के काल से हम बने हुए हैं. परमात्मा की भांति हम भी अनादि हैं, उसकी भांति हम साक्षी हैं, कुछ न करते हुए भी सबका आनंद लेने वाले, हर श्वास एक आनंद की लहर का खबर देती है. जो स्वयं ही आनंद है उसे भी अपने आनंद का स्वाद लेने के लिए देह में आना पड़ता है. परमात्मा को मायाविशिष्ट चेतना में आकर लीला का आनंद लेना पड़ता है तो जीव को स्वप्न विशिष्ट चेतना में ! हम स्वप्न ही तो देख रहे हैं, एक लम्बा स्वप्न, जिसमें हमने एक नया पात्र धरा है, शरीर मन व बुद्धि का एक नया संयोग खड़ा किया है, स्वप्न से जागकर ही पता चलता है कि इसमें प्रतीत होने वाले सुख-दुःख मिथ्या थे, वैसे ही मृत्यु के वक्त पता चलता है, सब कुछ छूट रहा है, यह एक स्वप्न का अंत हो रहा है. हमारा ध्यान यदि मृत्यु से पूर्व इस ओर चला आये तो जीवन एक उत्सव ही प्रतीत होता है. 

Friday, May 8, 2015

समत्वं योग उच्यते

जनवरी २००९ 
दुनिया में इतनी विविधता है पर मृत्यु में कोई भेद नहीं, अमीर-गरीब, बच्चा-बूढ़ा, पापी-पुण्यात्मा सब वहाँ समान होते हैं. मरघट में ज्ञानी भी धूल में मिल जाते हैं और अज्ञानी भी. मौत सभी को एक स्तर पर ला देती है. जब किसी की मृत्यु हो तो यह मानना चाहिए कि मेरी ही मृत्यु हो रही है. जब कोई अपमानित हो यही मानना चाहिए कि हमारा ही मन अपमानित हुआ है. सादृश्य अहंकार की मृत्यु है और सादृश्य करुणा को जन्म देता है. सादृश्य का बोध हमें परमात्मा की ओर ले जाता है. यदि हमारे जीवन में समानता का भाव जग जाये तो सारे दुःख एक क्षण में समाप्त हो जायेंगे. 

Monday, April 27, 2015

एक स्रोत शांति का भीतर

जनवरी २०१५ 
‘ब्रह्म सत्यम जगत मिथ्या’ शंकराचार्य ने कहा है मिथ्या का अर्थ है जो दीखता तो है पर है नहीं, माया है, स्वप्न है, लेकिन जिस समय हम स्वप्न देखते हैं सत्य प्रतीत होता है. मिथ्या का एक अर्थ अनुपयोगी है. अनुपयोगी का अर्थ है विवेक से उपयोग करके उससे मुक्त हो जाना. यह जगत विवेक से जीने जैसा है, उपयोग करके उससे पृथक हो जाने जैसा है, इसी अर्थ में यह जगत मिथ्या है, हमारे भीतर जो चैतन्य है, वही ब्रह्म है, वही अनंत है, निरंतर उसका विस्तार हो रहा है. जगत में दूर से दूर की वस्तुएं तथा निकट से निकट का शरीर, मन बुद्धि, चित्त तथा अहंकार भी आ जाते हैं. श्वास यानि प्राण भी हमारे उपयोग में लाने जैसा है, जिसे देखते–देखते हम मन तक पहुंचते हैं, बुद्धि, चित्त तथा अहंकार को जानते-जानते स्वयं तक पहुंचते हैं. चैतन्य की अनुभूति होते ही हमें अपनी शाश्वतता का प्रमाण भी मिल जाता है, मृत्यु का भय नहीं रहता, सारे द्वन्द्वों से पार उस निर्भय, निर्वैर अवस्था का अनुभव होता है, जहाँ एक अखंड शांति का सोता बह रहा है, जहाँ कोई चाह नहीं, पूर्णता है, जहाँ कोई अभाव नहीं, उस अखंड आनंद की अवस्था में भी एक विस्तार है, रहस्य है. विस्मय की वह अनोखी अवस्था ही समाधि तक पहुंचती है. जिससे प्रज्ञा का जन्म होता है, वही जानने योग्य है !   

Monday, March 30, 2015

उससे मिलना होगा इक दिन

अगस्त २००८ 
जो बाहर है वही भीतर भी है. हमारे भीतर भी एक सृष्टि है, परमात्मा को प्रेम करना उस सृष्टि में प्रवेश करने का पवेश पत्र है, न जाने कितने जन्मों से वह परमात्मा हमारी बाट जोह रहा है. पुकार रहा है. आत्मा को जीने की इच्छा है, वह सुख-दुःख का संसार खड़ा कर लेती है, तब भी उस के भीतर परम प्रेम ज्यों का त्यों रहता है, अछूता और निर्मल, उस प्रेम को पाने की शर्त यही है कि आत्मा स्वयं ही वह प्रेम बन जाए, जैसे लोहा आग बन जाता है और बीज वृक्ष बन जाता है. वे पुनः अपने रूप को पाते हैं पर बदला हुआ रूप. उस क्षण तो उन्हें मिटना ही होता है. आत्मा यदि स्वयं को क्षण भर के लिए भी असीम सत्ता में लीन कर दे तो वह क्षण उसके जीवन को बदल सकता है. ऐसे भी वह पल-पल मिट रही है, बदल रही है. यह परिवर्तन उसके न चाहने पर भी होते हैं. यदि वह इस सत्य को स्वीकार ले कि जीवन क्षण भंगुर है, इसमें कोई सार नहीं है. जन्म भर की कमाई मृत्यु के एक झटके में समाप्त हो जाती है. जबकि आत्मा का विकास कभी पतन में नहीं बदलता, वह उन्नति की ओर ही अग्रसर होता है. कैसा विरोधाभास है यहाँ, लेकिन परमात्मा के क्षेत्र में संसार के सारे नियम टूट जाते हैं. यहाँ का गणित ही उल्टा है. प्रेम, शांति, सुख, आनंद, ज्ञान, शक्ति और पवित्रता से बना परमात्मा ही हमारी असली पहचान है. न जाने वह कौन सा पल रहा होगा जब उसे भूलकर हमने यह आवरण ओढ़ा होगा. धीरे-धीरे हम इसमें फंसते गये. उसकी स्मृति आते ही वह हमें अपनी ओर आकर्षित करता है.