Thursday, June 18, 2015

मोह मिटे से हो जागरण

फरवरी २०१० 
मृत्यु के साथ यदि हमारी मित्रता हो तभी हम धर्म के पथ से विमुख रहकर भी प्रसन्न रहने की आशा रख सकते हैं. ऐसा हो नहीं सकता तो हमें मोह तथा आसक्ति को छोड़कर अनासक्ति का मार्ग चुनना ही पड़ेगा. मोह ही दुःख का सबसे बड़ा कारण है. मोह का अर्थ है विपरीत ज्ञान, विवेकहीनता तथा असजगता. विपरीत ज्ञान अर्थात स्वयं को केवल देह और मन तक ही सीमित मानना. मन उदास होता है तो शरीर अस्वस्थ होने ही वाला है. हमारी नकारात्मक भावनाएं शरीर पर प्रभाव डाले बिना नहीं रह सकतीं. बुद्धि यदि निर्मल न रही तो सही-गलत का भी बोध नहीं रहता. मन के पार जाकर ही उस आनंद का अनुभव होता है जो दिव्य है.   

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