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Saturday, August 8, 2026

जीवन में जब ध्यान सधेगा

यदि जीवन में संतुलन हो, तो हर बाधा को आसान से पार किया जा सकता है। वर्तमान जीवन में गति है, पर ठहराव नहीं है। ऐसे में ध्यान एक ऐसा उपाय है जो भीतर संतुलन लाता है। ध्यान का प्रभाव डीएनए स्तर तक होता है. यह शरीर में कोर्टिसोल के स्तर को कम करता है और सेरोटोनिन व ऑक्सीटोन का स्तर बढ़ाता है. ध्यान मन को शांत करने की या कुछ भी न करने की कला है। जिसमें मन सरलता से एक गहरे मौन में डूब जाता है।यह गति से स्थिरता की और शब्द से नि:शब्द की यात्रा है। ध्यान मन को नियंत्रित करना नहीं है, न ही किसी एक बिंदु पर मन को एकाग्र करना है बल्कि मन के विचारों का साक्षी भाव से अवलोकन करना है।जिससे साधक सहज ही विचारों के पार चला जाता है और एक गहरे विश्राम का अनुभव करता है। वह अपने भीतर स्थित चेतना से जुड़ जाता है और सहज ही आनंद का अनुभव करता है। जब मन शांत और सहज होता है तो बुद्धि अति श्रेष्ठ निर्णय लेने की स्थिति में होती है और भविष्य की योजना बना सकती है। ध्यान चित्त को अतीत में पश्चाताप और भविष्य की आशंका से मुक्त करता है।







Thursday, November 17, 2022

मन के जो भी पार हुआ है

हमारे विचार शुभ हों, उनमें दिव्यता की झलक हो तो ईश्वरीय आनंद हमारे चारों तरफ़ अनुभव होने लगता है। यह जीवन एक अवसर के रूप में हमें मिला है, इसे सँवारना हमारे अपने हाथों में है। ईश्वर की  हज़ार-हज़ार शक्तियाँ हमारी सहायता के लिए तत्पर हैं, उनकी कृपा अनवरत बरस रही है। हमें उसकी तरफ़ स्वयं को उन्मुख करना है। अभी हम मनमुख हैं, अपने मन के ग़ुलाम, मन की छोटी-छोटी इच्छाओं, कामनाओं और संवेगों के इशारे पर चलते हैं। मन आदतों का एक पुंज है इसलिए हम बार-बार उन्हीं कृत्यों को करते हैं। जीवन एक दोहराव बन जाता है। हम कहीं पहुँचते हुए नहीं पाए जाते; जब तक मन के इस दुश्चक्र से बाहर निकल कर यह निर्णय नहीं लेते हैं कि जीवन की वास्तविकता आख़िर है क्या ? क्या सुख-दुःख के झूले में झुलाने के लिये ही धरती पर इतना आयोजन हुआ है। जगत में जो इतना अत्याचार, अनाचार चल रहा है, वह स्वार्थी मनों का ही तो परिणाम है। हर कोई अपने स्वार्थ की पूर्ति में लगा है। पर इससे दुनिया सुंदर तो नहीं बन रही। हम इस दायरे से बाहर नकलते हैं तो स्वयं को एक विस्तृत आकाश में पाते हैं, जो शांति का घर है। 


Sunday, December 26, 2021

सहनशील चेतना हो जिसकी

जीवन क्या है ? क्या निरंतर कुछ न कुछ अनुभव करते रहने की ललक का ही दूसरा नाम जीवन नहीं है। शिशु के जन्म लेते ही यह प्रक्रिया आरम्भ हो जाती है। जब तक देहाध्यास  नहीं छूटता, इंद्रियों से अनुभव लेने की कामना का नाश नहीं होता। हर नए प्रातः में हमारा पदार्पण यदि सजगता पूर्ण हो तो इन अनुभवों को ग्रहण करते हुए भी जीवन के मूल्यों को हम किसी भी क्षण विस्मृत नहीं करेंगे। हमारा अंतर स्वप्नशील हो जिसमें एक शिव संकल्प जलता रहे जो सदा प्रेरित करे। राह में यदि कांटे हों, अनदेखा करके कोई खुद को बचा कर निकल जाता है, पर संवेदनशील कांटे बीनता है और राह को अन्यों के लिए कंटक विहीन बना देता है ! जो सहनशील होगा वही अपनी चेतना को विकसित कर सकता है, नित नया सृजन करता है. जैसे प्रकृति नित नई है, यदि मन हर दिन कोई नया विचार, कोई नया गीत रचे। यह अनादि सत्य है कि सनातन मूल्यों को पकड़ कर ही नया सृजन होता है, वैसे ही जैसे मूल को पकड़ कर ही नया फूल खिलता है.


Thursday, November 25, 2021

स्वयं में जो भी टिकना जाने

जैसे जब जरूरत पड़ती है, हम तन का उपयोग करते हैं और जब जरूरत नहीं होती तब शांत होकर बैठ जाते हैं वैसे ही विचार करने की जरूरत हो तभी मन का उपयोग करें तो मनसा कर्म नहीं होंगे. जब तक हम द्रष्टा में सहज रूप से नहीं रहते, तब तक मन की ग्रन्थि बनी रहती है और व्यर्थ ही मन विचार करता है. आत्मा में रहना ही सुख से रहना है, निर्भय और निर्वैर रहना है, निर्विकल्प होकर रहना है ! पर आत्मा में रहना पल भर को ही होता है, जाने कहाँ से मन हावी हो जाता है, मन में जैसे कोई गहरा कुआँ हो जिसमें से विचार निकलते ही आते हैं, कभी इधर के कभी उधर के, कभी काम के कभी व्यर्थ के विचार, जो कभी तन को भी पीड़ित करते हैं मन को भी। आखिर मन चाहता क्या है ?  वह स्वयं को आहत कर कैसे सुखी हो सकता है. वह स्वयं ही नकारात्मक भाव जगाता है फिर बिंधता है, उसे क्यों नहीं समझ में आता ? पर वह तो जड़ है, आत्मा ही चेतन है, यदि आत्मा असजग रहे तो मन इसी तरह करता रहेगा. सजग हमें स्वयं को होना है, हम जो मन से परे हैं. हम नादान बच्चे को घातक हथियार हाथ में लिए देखें तो क्या उसे रोकते नहीं, हम क्यों सो जाते हैं जब मन मनमानी करता है. हमें अपने आप पर भरोसा नहीं, तभी तो ईश्वर को पुकारते हैं. ईश्वर हँसते होंगे, उन्होंने तो हमें निज स्वरूप में ही रचा है. वह कहते होंगे पुकारने से पहले एक नजर खुद पर भी डाल ली होती !


Wednesday, January 20, 2021

खाली क्यों है मन की गागर

 मन की गागर को जितना भी भरा जाये, वह खाली ही रहती है. वास्तव में मन की पेंदी ही नहीं है और हम एक असाध्य कार्य में लगे हैं. कोई संगीत से इसे भरना चाहता है तो कोई सुस्वादु भोजन से, कोई विभिन्न स्थानों की सैर करके तो कोई बड़ा सा घर बनाकर, कोई किताबों में उस रिक्तता का हल खोजता है तो कोई दिन रात काम में व्यस्त रहकर भीतर के खालीपन को भुलाना चाहता है. सन्त और शास्त्र कहते हैं मन का स्वभाव ही अपूर्णता है. यदि कोई जीवन की पूर्णता का अनुभव वास्तव में करना चाहता है तो उसे मन के इस स्वभाव को जानना होगा, मन नाम ही उसी का है जो सदा डोलता रहता है, कभी वर्तमान में ठहरता ही नहीं. हमने स्वयं को मन के साथ इस तरह एक कर लिया है कि उसकी अपूर्णता को हम स्वयं की अपूर्णता मान बैठे हैं. ध्यान में ही हमें मन से स्वयं का अलगाव महसूस होता है और विचारों को देखना हम सीखते हैं. ध्यान का अभ्यास बढ़ते-बढ़ते एक अवस्था ऐसी आती है जब विचारों का हम पर कोई प्रभाव नहीं रहता, वे आकाश में आने जाने वाले बादलों की तरह आते और जाते हैं. आगे जाकर हम देखते हैं कि विचारों को हम किस तरह क्षण भर में परिवर्तित कर सकते हैं. चिंता, तनाव आदि शब्द तब बेमानी हो जाते हैं. एक ही विचार को बार-बार मन में लाना ही तो चिंता है, जब हम नकारात्मक विचार आते ही उसे बदल दें तो मन हमारे नियंत्रण में आ गया. अब उसे भरने की फ़िक्र नहीं करनी है क्योंकि हम सदा ही पूर्ण हैं.  


Sunday, January 17, 2021

जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि

 

जिस सृष्टि का निर्माण हमने ही किया है, हम उसे ही न जानें और उससे ही प्रभावित हो जाएं, यह आश्चर्य की बात नहीं तो और क्या है ! बाहर की तरह अपने भीतर हर पल हम एक वातावरण का निर्माण करते हैं जो विचारों और भावनाओं से बना है। हम ही उसका संवर्धन भी करते हैं और कुछ समय बाद उसका संहार भी कर देते हैं। हमारी सृष्टि हमारी आशाओं और आकांक्षाओं को ही तो प्रदर्शित करती है। यदि यह सुखद नहीं है तो भी हम ही इसके लिए उत्तरदायी हैं। जिसे भाग्य कहा जाता है वह एक दिन हमारे ही द्वारा किए गए पुरुषार्थ से जन्मा है।

Thursday, June 25, 2020

सद्विचार जब सोचेगा मन

विचारों से कर्म, कर्म से आदत, आदत से चरित्र और चरित्र से भाग्य का निर्माण होता है. इसका अर्थ हुआ हमारे भाग्य के निर्माता हमारे विचार हैं. जैसा विचार मन में होगा वैसा ही भाग्य निर्मित होगा. अब देखने वाली बात यह है कि कोई सकारात्मक विचारों को प्रमुखता देता है और कोई नकारात्मक बातों को, ऐसा क्यों होता है. यह भी तो विचार का ही फल है, जो अच्छी पुस्तके पढ़ेगा, शास्त्रों का अध्ययन करेगा, सन्तों, महापुरुषों की वाणी पढ़े, सुनेगा उसके भीतर वैसे ही विचार आएंगे. जो केवल अपने ही मन की सुनेगा वह नकारात्मकता का शिकार हो सकता है, क्योंकि मन का यह स्वभाव है वह नकार को जल्दी पकड़ लेता है, मन पानी की तरह है नीचे बहना  उसके लिए सरल है, यदि उसे ऊपर ले जाना है तो भाप बनाना पड़ेगा, जो तप से ही होगा. इसीलिए शास्त्रों में तप की महत्ता गायी गयी है. जीवन में अनुशासन हो तो वही तप है. वाणी पर संयम हो तो वह वाणी का तप है. तप से ही मन स्वभाव को बदल कर ऊँचा उठने लगता है, उसे अग्नि का साथ मिल जाता है, अग्नि सदा ऊपर ही उठती है. 

Sunday, April 5, 2020

आओ मिलकर दीप जलाएं


दीप जलाकर हम पूजा करते हैं, अतिथियों का स्वागत करते हैं, दीपावली मनाते हैं पर आज रात्रि जो दीपक हम जलाने जा रहे हैं उसके पीछे कितने ही कारण छुपे हैं. सबसे पहला कारण है भारत के नागरिकों की एकता और अखंडता की शक्ति का जागरण. संगठन में कितनी शक्ति है यह सर्वविदित है, जब हम सभी एक ही संकल्प लेकर दीपदान करेंगे तो उस संकल्प की शक्ति कितने गुणा बढ़ जाएगी, इसका अंदाजा अभी हम नहीं लगा सकते. मन एक ऊर्जा है, इसे सकारात्मक भी बनाया जा सकता है और नकारात्मक भी, जैसे एक ही विद्युत शक्ति से हम हीटर भी चलाते हैं कूलर भी, इसी तरह हमारे मन की शक्ति का उपयोग दोनों प्रकार से किया जा सकता है. सकारात्मकता और उत्साह आज हम सबकी सबसे बड़ी आवश्यकता है. जिस आपदा का सामना हम कर रहे हैं, उसे देख नहीं सकते, कब तक और कैसे उस पर विजय मिलेगी यह किसी को भी ज्ञात नहीं, ऐसे अनिश्चय के वातावरण में यदि हमारे मन सकारात्मक विचारों और शुभ भावनाओं से संयुक्त रहेंगे तभी हम अपना और अपने परिवार, समाज और राष्ट्र का तथा अंततः इस विश्व का कुछ भला कर सकते हैं. हर नकारात्मक विचार हमारी ऊर्जा को व्यर्थ ही नहीं करता उसे काटता भी है. अतः आज रात्रि नौ बजे हम सभी एक शुभ संकल्प हृदय में लेकर परमात्मा से प्रार्थना करेंगे और स्वयं की शक्ति को जगायेंगे. इसका सुखद परिणाम हमें निकट भविष्य में शीघ्र ही देखने को मिलेगा. 

Sunday, September 29, 2019

अमन हुआ जो मुक्त वही है



जब तक मन संकुचित है वह डोलेगा ही, ऐसा मन अशांति का ही दूसरा नाम है. जो मन दिखावा करता है, तुलना करता है, वह उद्ग्विन हुए बिना नहीं रहेगा. स्वार्थ से भरा हुआ मन भी अकुलाहट से भर जाता है. विशाल मन का अर्थ है अमनी भाव में आ जाना. संत कहते हैं अमन हुए बिना समाधान नहीं मिलता. क्योंकि मन होने का अर्थ ही है अहंता का होना, जो है वह अपने अस्तित्त्व की रक्षा के लिए अन्य का विरोध करेगा ही, इसीलिए सिर काटने और घर जलाने की बात कबीर कह गये हैं. मन के मिटे बिना आत्मिक शांति का अनुभव नहीं किया जा सकता. चेतना जब पूर्ण विश्राम में होती है, अर्थात समाधि में होती है, तब मन खो जाता है. जब हम विचारधारा में बह जाते हैं मन के प्रभाव में होते हैं, जब हम विचार के साक्षी होते हैं, अप्रभावित बने रह सकते हैं. किंतु समाधि का अनुभव शून्यता में ही किया जा सकता है.

Tuesday, June 11, 2019

सृष्टि स्वयं से निर्मित होती



हम सबने सुना है, 'जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि' इसका एक अर्थ तो यह है कि जगत को हम जिस नजरिये से देखते हैं, जगत हमें वैसा ही नजर आता है. यदि एक डाक्टर की नजर से देखें तो लोग  रोगी या निरोगी दिखेंगे. अध्यापक की नजर से बुद्धू या होशियार. संत की नजर से देखें तो उसे सभी परमात्मा स्वरूप ही दिखेंगे. धन की दृष्टि से देखें तो अमीर या गरीब. कवि या गायक की दृष्टि से देखें तो उसे हर कहीं श्रोता ही नजर आयेंगे. लेकिन इस बात का एक और अर्थ भी है, हम स्वयं को और जगत को जैसा देखना चाहते हैं, अपने इर्द-गिर्द का वातावरण जैसा देखना चाहते हैं, वैसा ही दृष्टिकोण हमें अपनाना होगा. अपने विचारों और भावों का सृजन उसके अनुकूल ही करना होगा. यह सूक्ति हमें पूर्णरूप से आत्मनिर्भर होना सिखाती है. इसके अनुसार हर कोई जहाँ विचरता है, उस सृष्टि का निर्माण स्वयं ही करता है. एक ही बगीचे में भिन्न-भिन्न लोग भिन्न उद्देश्यों के लिए आते हैं. वहाँ के सौन्दर्य का दर्शन भी वे अपनी क्षमता के अनुसार ही करते हैं. परमात्मा की कैसी अद्भुत महिमा है, वह किसी के लिए बाल-गोपाल बन जाता है, तो किसी का पिता, माता भी वही है और मित्र भी. एक तरह से यह जगत उस परमात्मा की निरंतर चलती हुई कथा ही तो है. इसीलिए तो कवि कहते हैं, हरि अनंत, हरि कथा अनंता..  

Thursday, December 6, 2018

मन की नदी मिले सागर से


७ दिसम्बर २०१८ 
नदी पर्वत से निकलती है तो पतली धार की तरह होती है, मार्ग में अन्य जल धाराएँ उसमें मिलती जाती हैं और धीरे-धीरे वह वृहद रूप धर लेती है. अनेकों बाधाओं को पार करके सागर से जब उसका मिलन होता है, वह अपना नाम और रूप दोनों खोकर सागर ही हो जाती है. जहाँ से वह पुनः वाष्पित होगी और पर्वत पर हिम बनकर प्रवाहित होगी. जीवन भी ऐसा ही है, शिशु का मन जन्म के समय कोरी स्लेट की तरह होता है, माता-पिता, शिक्षक, समाज, राज्य, राष्ट्र और विश्व उसके मन को गढ़ने में अपना योगदान देते हैं. अनेक विचारों, मान्यताओं व धारणाओं को समेटे होता है उसके मन का जल. यदि उचित समय पर मार्गदर्शन मिले और मृत्यु से पूर्व वह पुनः मन को खाली कर पाए, नाम-रूप का त्याग कर समष्टि मन से एक हो जाये तो वह भी सागर बन सकता है. ऐसा तभी सम्भव है जब मन भी नदी की भांति निरंतर बहता रहे, किसी पोखरी की भांति उसका जल स्थिर न हो जाये.  

Tuesday, August 28, 2018

जब जैसा तब वैसा रे


२८ अगस्त २०१८ 
जीवन जब हमारे निकट मुस्कुराता हुआ गुनगुना रहा होता है, हम किन्हीं व्यर्थ की बातों में खोये उससे नजरें नहीं मिलाते. संत कहते हैं, परमात्मा चारों ओर उसी तरह मौजूद है जैसे हवा और धूप. खिड़कियाँ बंद हों तो धूप भला अंदर आये कैसे और हवा थोड़ी बहुत आ भी गयी तो उसे ताज़ी रखने के लिए भी तो खिड़कियाँ खोलनी होंगी. हवा को कैद नहीं कर सकते न ही धूप को...उन्हें तो वे जैसे हैं, जब हैं, उसी वक्त महसूस करना है, इसी तरह परमात्मा को हर क्षण को जैसा वह है वैसा ही स्वीकार कर ही महसूस किया जा सकता है. मन पर विचारों और विकारों के पर्दे लगे हों तो उसका प्रवेश सम्भव नहीं है.

Monday, July 9, 2018

सृजनशील जब मन हो जाये


९ जुलाई २०१८ 
जीवन ऊर्जा हर क्षण बंट रही है. कहीं नक्षत्रों का निर्माण हो रहा है तो कहीं पुष्पों का सृजन. इस धरती पर हर क्षण कितना कुछ नया बन रह है और पुराना विनष्ट हो रहा है. मानव मन में भी असंख्य विचारों का सृजन होता है, विशाल पुस्तकालय उन विचारों की ही देन हैं. जाने-अनजाने हम सभी सृष्टिकर्ता के इस कार्य में उसके सहायक बन जाते हैं. उसने मानव को ही नित नूतन सृजन की क्षमता दी है. मन की गहराई में न जाने कहाँ से किसी कवि और लेखक के भीतर भावनाओं और विचारों का जखीरा चला आता है, जिसे वह रचना के रूप में बाहर उलीच देता है. भाषा और व्याकरण का सीमित ज्ञान ही इसका कारण है ऐसा नहीं लगता, अवश्य ही उसका मन किसी अनंत स्रोत से जुड़ा है, जो ताजे कूप की तरह सदा भरा रहता है. कभी ऐसा भी देखा गया है जिस भाषा का इस जन्म में अध्ययन ही नहीं किया, किन्हीं पलों में उसके शब्द भी भीतर से फूटने लगते हैं. तब विश्वास हो जाता है, यह यात्रा सिर्फ इसी जन्म की तो नहीं है.

Thursday, July 5, 2018

जिन खोजा तिन पाइयाँ


५ जुलाई २०१८ 
हमारे जीवन में बाहर की परिस्थतियाँ कैसी भी हों, हरेक के भीतर परमात्मा एक सा समाया है. जैसे आकाश सबको एक सा दीखता है, सूर्य रश्मियाँ, हवा और जल किसी के प्रति भेदभाव नहीं करते वैसे ही सबके भीतर चेतना का स्रोत एक ही है. जैसे सागर देखने सब जाते हैं, पर कोई लहरों से भयभीत होकर उसके निकट तक नहीं जाता, कोई गोता लगाकर मोती खोज लाता है, उसी तरह हम अपने विचारों और भावनाओं की लहरों को देखकर ही खुद को जान लिया समझ लेते हैं, और कोई संत गहरे जाकर सत्य का मोती खोज लेता है. जैसे सागर सब नदियों का स्वागत करता है और खारे  जल को मुक्त करके मीठा बनाकर पुनः उन्हें लौटा देता है, परमात्मा हमारे विचारों और भावों को समा लेता है और परिवर्तित कर नये रूप में लौटा देता है.

Friday, December 15, 2017

वर्तमान तय करता भावी

१५ दिसम्बर २०१७ 
हमारे द्वारा किया गया हर कृत्य चाहे वह भावना के स्तर पर हो, विचार के स्तर पर हो या क्रिया के स्तर पर हो अपना फल दिए बिना नहीं रहता. शास्त्रों में इसीलिए भावशुद्धि पर बहुत जोर दिया गया है, अशुद्ध भाव का फल भविष्य में दुःख के रूप में  मिलने ही वाला है यदि कोई इस बात को याद रखे तो तो किसी के प्रति अपने भाव को नहीं बिगाड़ेगा. व्यक्ति, परिवार, समाज अथवा किसी राष्ट्र के प्रति हो रहे अन्याय व भेदभाव को देखकर हम कितना नकारात्मक सोचने लगते हैं, हर घटना के प्रति प्रतिक्रिया देते हैं पर यह भूल जाते हैं कि हर विचार प्रतिफल के रूप में भविष्य में और नकारात्मकता लाने का सामर्थ्य रखता है. साधक को सजग रहना है और व्यर्थ के चिंतन से बचना है. प्रारब्धवश जो भी सुख-दुःख उसे मिलने वाला है उसके लिए किसी को दोषी नहीं जानना है. यदि वह स्वयं को कर्ता न मानकर मात्र साक्षी जानता है, तब किसी भी कर्म का फल उसे छू ही नहीं सकता.

Sunday, July 16, 2017

नित नूतन जब जग लगता है

१७ जुलाई २०१७ 
हम जो भी करते हैं, सोचते हैं या कहते हैं, वह निन्यानवे प्रतिशत बासी होता है. हम पुराने को ही दोहराते रहते हैं. सुबह अलार्म सुनकर बिस्तर छोड़ते ही यह प्रक्रिया आरम्भ हो जाती है. अभ्यास वश ही पैर चप्पल तलाशते हैं, फिर अभ्यास वश ही ब्रश आदि, देह को जिन कामों का अभ्यास हो गया है, वह मशीन की तरह करता जाती है. फिर कोई विचार उड़ता हुआ सा मन में आ जाता है, उसके प्रति प्रतिक्रिया भी पूर्व के अनुसार ही होती है. हमारे इर्द-गिर्द जो कुछ भी होता है वह भी तो दोहराता है स्वयं को. एक चक्र की भांति हम उसमें ऊपर-नीचे होते रहते हैं, कहीं पहुँचते नहीं. कुछ नया हो तभी मानव बुद्धि की सार्थकता है. प्रतिदिन या फिर प्रतिपल नया होने के लिए प्रकृति को क्या कुछ विशेष करना पड़ता है, इतना ही तो कि परिवर्तन का वह प्रतिरोध नहीं करती. जीवन को जिस रूप में वह आता है सहज स्वीकारने से नयापन बना ही रहता है. जब कोई पूर्वाग्रह, पूर्व मान्यता न हो, अपनी या दूसरों की विशेष इमेज के प्रति कोई राग न हो तब हर पल कुछ नया भी होगा तो वह सहज स्वीकार्य होगा.   

Thursday, June 15, 2017

अति सर्वत्र वर्जयेत्


मन को नकारात्मकता से मुक्त करने लिए पहला कदम है उचित श्रम और दूसरा एकाग्रता. यदि समय अधिक है और करने के लिए काम कम है तो जाहिर है मन व्यर्थ की चहलकदमी करेगा ही. जितनी समय मन किसी काम में एकाग्र रहता है, कोई अनचाहा भाव या विचार उसमें नहीं आता. यदि काम सीमा से अधिक है तो मन थका रहेगा और सकारात्मक विचारों को ग्रहण नहीं कर पायेगा. जीवन में एक अनुशासन साधना के पथ पर चलने के लिए पहली सीढ़ी है. एकाग्र मन अपनी ऊर्जा को बचाता है और यही ऊर्जा ध्यान में प्रवेश करने के लिए उपयोगी होती है. ध्यान हमें अपने भीतर की गहराई में ले जाता है जहाँ जाकर हम सहज ही प्रसन्नता व शांति का अनुभव कर सकते हैं.

Monday, May 15, 2017

भाव भरा जब अंतर होगा

१५ मई २०१७ 
ऋषि कहते आये हैं भाव यदि शुद्ध होंगे तो विचार रूपी वृक्ष भी शुद्ध होंगे और कर्मों के फल भी उन्हीं वृक्षों पर लगेंगे. भविष्य में उन कर्मों के फल रूप सौभाग्य हमारी ही थाती होगा. आज की पीढ़ी के मस्तिष्क को हम सूचनाओं से भरते जाते हैं पर उनके भाव पक्ष की तरफ ध्यान ही नहीं देते. भाव गहराई से आते हैं और शब्द ऊपर-ऊपर से, वे एक सजावट से ज्यादा काम नहीं करते, वे प्रामाणिक भी नहीं होते. बचपन से ही हम उन्हें प्रतिद्वंद्वी होना सिखाते हैं, जिससे हृदय पीछे छूट जाता है. ऐसा प्रतीत होता है मानो सदा ही वे एक दौड़ में रत हों. इसीलिए आज समाज सम्पन्न तो हो रहा है पर तनाव ग्रस्त भी. 

Monday, May 8, 2017

मन जो लौट गया निज घर में

८ मई २०१७ 
मन जब भीतर जाकर अपने आप में ठहर जाता है तो विचारों के स्रोत से परिचय होता है. ऐसा अनुभव अतुलनीय है, भीतर से कुछ उमड़ कर बाहर उलीचने का मन होता है. पहली बार एक तृप्ति का अहसास होता है जो किसी भी भौतिक वस्तु पर आधारित नहीं है. सभी इन्द्रियां बाहर ही देखती हैं, मन ही ऐसा अनुपम साधन है जो बाहर और भीतर दोनों ओर जा सकता है. जिस क्षण जगत से सुख लेने की चाह न रहे मन स्वयं में लौट ही आयेगा. मन तब स्वनिर्भर होना सीखेगा, जितना-जितना स्व की महिमा का उसे भान होगा उतना-उतना वह भीतर से पूर्ण होता जायेगा. फकीर भी स्वयं को बादशाह मानते हैं क्योंकि उन्हें अपने सुख के  लिए जगत से कुछ नहीं चाहिए. 

Saturday, December 17, 2016

वही ऊर्जा पल-पल बहती

 १८ दिसंबर २०१६ 
हमारा मन एक अनंत स्रोत की तरह है जिसमें से अनवरत विचारों की गंध फैलती रहती है. मनमें सहज ही संकल्प उठते हैं, उनमें से अधिकतर दिशाविहीन होते हैं जिससे वे कर्मों में नहीं बदल पाते। यदि हम मन की इस ऊर्जा को एक सार्थक मोड़ दे सकें तो जीवन उस वृक्ष की तरह पल्लवित होता है जो हर रूप में जगत के काम आता है. मन की इस ऊर्जा का दोहन करने से ही कोई आंतरिक सन्तोष का अनुभव भी सहज ही करने लगता है.