यदि जीवन में संतुलन हो, तो हर बाधा को आसान से पार किया जा सकता है। वर्तमान जीवन में गति है, पर ठहराव नहीं है। ऐसे में ध्यान एक ऐसा उपाय है जो भीतर संतुलन लाता है। ध्यान का प्रभाव डीएनए स्तर तक होता है. यह शरीर में कोर्टिसोल के स्तर को कम करता है और सेरोटोनिन व ऑक्सीटोन का स्तर बढ़ाता है. ध्यान मन को शांत करने की या कुछ भी न करने की कला है। जिसमें मन सरलता से एक गहरे मौन में डूब जाता है।यह गति से स्थिरता की और शब्द से नि:शब्द की यात्रा है। ध्यान मन को नियंत्रित करना नहीं है, न ही किसी एक बिंदु पर मन को एकाग्र करना है बल्कि मन के विचारों का साक्षी भाव से अवलोकन करना है।जिससे साधक सहज ही विचारों के पार चला जाता है और एक गहरे विश्राम का अनुभव करता है। वह अपने भीतर स्थित चेतना से जुड़ जाता है और सहज ही आनंद का अनुभव करता है। जब मन शांत और सहज होता है तो बुद्धि अति श्रेष्ठ निर्णय लेने की स्थिति में होती है और भविष्य की योजना बना सकती है। ध्यान चित्त को अतीत में पश्चाताप और भविष्य की आशंका से मुक्त करता है।
Saturday, August 8, 2026
Thursday, November 17, 2022
मन के जो भी पार हुआ है
हमारे विचार शुभ हों, उनमें दिव्यता की झलक हो तो ईश्वरीय आनंद हमारे चारों तरफ़ अनुभव होने लगता है। यह जीवन एक अवसर के रूप में हमें मिला है, इसे सँवारना हमारे अपने हाथों में है। ईश्वर की हज़ार-हज़ार शक्तियाँ हमारी सहायता के लिए तत्पर हैं, उनकी कृपा अनवरत बरस रही है। हमें उसकी तरफ़ स्वयं को उन्मुख करना है। अभी हम मनमुख हैं, अपने मन के ग़ुलाम, मन की छोटी-छोटी इच्छाओं, कामनाओं और संवेगों के इशारे पर चलते हैं। मन आदतों का एक पुंज है इसलिए हम बार-बार उन्हीं कृत्यों को करते हैं। जीवन एक दोहराव बन जाता है। हम कहीं पहुँचते हुए नहीं पाए जाते; जब तक मन के इस दुश्चक्र से बाहर निकल कर यह निर्णय नहीं लेते हैं कि जीवन की वास्तविकता आख़िर है क्या ? क्या सुख-दुःख के झूले में झुलाने के लिये ही धरती पर इतना आयोजन हुआ है। जगत में जो इतना अत्याचार, अनाचार चल रहा है, वह स्वार्थी मनों का ही तो परिणाम है। हर कोई अपने स्वार्थ की पूर्ति में लगा है। पर इससे दुनिया सुंदर तो नहीं बन रही। हम इस दायरे से बाहर नकलते हैं तो स्वयं को एक विस्तृत आकाश में पाते हैं, जो शांति का घर है।
Sunday, December 26, 2021
सहनशील चेतना हो जिसकी
जीवन क्या है ? क्या निरंतर कुछ न कुछ अनुभव करते रहने की ललक का ही दूसरा नाम जीवन नहीं है। शिशु के जन्म लेते ही यह प्रक्रिया आरम्भ हो जाती है। जब तक देहाध्यास नहीं छूटता, इंद्रियों से अनुभव लेने की कामना का नाश नहीं होता। हर नए प्रातः में हमारा पदार्पण यदि सजगता पूर्ण हो तो इन अनुभवों को ग्रहण करते हुए भी जीवन के मूल्यों को हम किसी भी क्षण विस्मृत नहीं करेंगे। हमारा अंतर स्वप्नशील हो जिसमें एक शिव संकल्प जलता रहे जो सदा प्रेरित करे। राह में यदि कांटे हों, अनदेखा करके कोई खुद को बचा कर निकल जाता है, पर संवेदनशील कांटे बीनता है और राह को अन्यों के लिए कंटक विहीन बना देता है ! जो सहनशील होगा वही अपनी चेतना को विकसित कर सकता है, नित नया सृजन करता है. जैसे प्रकृति नित नई है, यदि मन हर दिन कोई नया विचार, कोई नया गीत रचे। यह अनादि सत्य है कि सनातन मूल्यों को पकड़ कर ही नया सृजन होता है, वैसे ही जैसे मूल को पकड़ कर ही नया फूल खिलता है.
Thursday, November 25, 2021
स्वयं में जो भी टिकना जाने
जैसे जब जरूरत पड़ती है, हम तन का उपयोग करते हैं और जब जरूरत नहीं होती तब शांत होकर बैठ जाते हैं वैसे ही विचार करने की जरूरत हो तभी मन का उपयोग करें तो मनसा कर्म नहीं होंगे. जब तक हम द्रष्टा में सहज रूप से नहीं रहते, तब तक मन की ग्रन्थि बनी रहती है और व्यर्थ ही मन विचार करता है. आत्मा में रहना ही सुख से रहना है, निर्भय और निर्वैर रहना है, निर्विकल्प होकर रहना है ! पर आत्मा में रहना पल भर को ही होता है, जाने कहाँ से मन हावी हो जाता है, मन में जैसे कोई गहरा कुआँ हो जिसमें से विचार निकलते ही आते हैं, कभी इधर के कभी उधर के, कभी काम के कभी व्यर्थ के विचार, जो कभी तन को भी पीड़ित करते हैं मन को भी। आखिर मन चाहता क्या है ? वह स्वयं को आहत कर कैसे सुखी हो सकता है. वह स्वयं ही नकारात्मक भाव जगाता है फिर बिंधता है, उसे क्यों नहीं समझ में आता ? पर वह तो जड़ है, आत्मा ही चेतन है, यदि आत्मा असजग रहे तो मन इसी तरह करता रहेगा. सजग हमें स्वयं को होना है, हम जो मन से परे हैं. हम नादान बच्चे को घातक हथियार हाथ में लिए देखें तो क्या उसे रोकते नहीं, हम क्यों सो जाते हैं जब मन मनमानी करता है. हमें अपने आप पर भरोसा नहीं, तभी तो ईश्वर को पुकारते हैं. ईश्वर हँसते होंगे, उन्होंने तो हमें निज स्वरूप में ही रचा है. वह कहते होंगे पुकारने से पहले एक नजर खुद पर भी डाल ली होती !
Wednesday, January 20, 2021
खाली क्यों है मन की गागर
मन की गागर को जितना भी भरा जाये, वह खाली ही रहती है. वास्तव में मन की पेंदी ही नहीं है और हम एक असाध्य कार्य में लगे हैं. कोई संगीत से इसे भरना चाहता है तो कोई सुस्वादु भोजन से, कोई विभिन्न स्थानों की सैर करके तो कोई बड़ा सा घर बनाकर, कोई किताबों में उस रिक्तता का हल खोजता है तो कोई दिन रात काम में व्यस्त रहकर भीतर के खालीपन को भुलाना चाहता है. सन्त और शास्त्र कहते हैं मन का स्वभाव ही अपूर्णता है. यदि कोई जीवन की पूर्णता का अनुभव वास्तव में करना चाहता है तो उसे मन के इस स्वभाव को जानना होगा, मन नाम ही उसी का है जो सदा डोलता रहता है, कभी वर्तमान में ठहरता ही नहीं. हमने स्वयं को मन के साथ इस तरह एक कर लिया है कि उसकी अपूर्णता को हम स्वयं की अपूर्णता मान बैठे हैं. ध्यान में ही हमें मन से स्वयं का अलगाव महसूस होता है और विचारों को देखना हम सीखते हैं. ध्यान का अभ्यास बढ़ते-बढ़ते एक अवस्था ऐसी आती है जब विचारों का हम पर कोई प्रभाव नहीं रहता, वे आकाश में आने जाने वाले बादलों की तरह आते और जाते हैं. आगे जाकर हम देखते हैं कि विचारों को हम किस तरह क्षण भर में परिवर्तित कर सकते हैं. चिंता, तनाव आदि शब्द तब बेमानी हो जाते हैं. एक ही विचार को बार-बार मन में लाना ही तो चिंता है, जब हम नकारात्मक विचार आते ही उसे बदल दें तो मन हमारे नियंत्रण में आ गया. अब उसे भरने की फ़िक्र नहीं करनी है क्योंकि हम सदा ही पूर्ण हैं.
Sunday, January 17, 2021
जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि
जिस सृष्टि का
निर्माण हमने ही किया है, हम उसे ही न जानें और उससे ही प्रभावित हो जाएं, यह आश्चर्य
की बात नहीं तो और क्या है ! बाहर की तरह अपने भीतर हर पल हम एक वातावरण का निर्माण
करते हैं जो विचारों और भावनाओं से बना है। हम ही उसका संवर्धन भी करते हैं और कुछ
समय बाद उसका संहार भी कर देते हैं। हमारी सृष्टि हमारी आशाओं और आकांक्षाओं को ही
तो प्रदर्शित करती है। यदि यह सुखद नहीं है तो भी हम ही इसके लिए उत्तरदायी हैं। जिसे
भाग्य कहा जाता है वह एक दिन हमारे ही द्वारा किए गए पुरुषार्थ से जन्मा है।