ध्यान हमें सिखाता है कि मन व्यर्थ के संकल्प-विकल्प करके अपनी ऊर्जा न गंवाए. नकारात्मक विचारों का दुष्प्रभाव शरीर और मन दोनों पर ही होता है जो बाद में रोग का रूप ले सकता है. ध्यान में हम मन के साथ अपने तादात्म्य को तोड़ते हैं और उसे निर्देशित करने में संभव होते हैं. इससे हम अपने विचारों के प्रति सजग हो जाते हैं और मन में स्पष्टता का अनुभव होता है. ध्यान के बाद एकाग्रता बढ़ जाती है जिसका अच्छा प्रभाव हमारे सभी कार्यों पर पड़ता है. ध्यान हमारे शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, भावनात्मक व आध्यात्मिक स्वास्थ्य को बढ़ाता है. देह को स्वस्थ रखने के लिए जैसे व्यायाम आवश्यक है वैसे ही मन को स्वस्थ रखने के लिए मन का पूर्ण विश्राम आवश्यक है, जो ध्यान में ही मिल सकता है.
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Thursday, August 20, 2020
Thursday, June 15, 2017
अति सर्वत्र वर्जयेत्
मन को नकारात्मकता से मुक्त करने लिए पहला कदम है उचित श्रम और दूसरा एकाग्रता. यदि
समय अधिक है और करने के लिए काम कम है तो जाहिर है मन व्यर्थ की चहलकदमी करेगा ही.
जितनी समय मन किसी काम में एकाग्र रहता है, कोई अनचाहा भाव या विचार उसमें नहीं
आता. यदि काम सीमा से अधिक है तो मन थका रहेगा और सकारात्मक विचारों को ग्रहण नहीं
कर पायेगा. जीवन में एक अनुशासन साधना के पथ पर चलने के लिए पहली सीढ़ी है. एकाग्र
मन अपनी ऊर्जा को बचाता है और यही ऊर्जा ध्यान में प्रवेश करने के लिए उपयोगी होती
है. ध्यान हमें अपने भीतर की गहराई में ले जाता है जहाँ जाकर हम सहज ही प्रसन्नता
व शांति का अनुभव कर सकते हैं.
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Monday, February 18, 2013
मुक्त गगन आवाज दे रहा
अप्रैल २००४
हमारे भीतर चेतना के विभिन्न
स्तर हैं, जब हम चेतना के उच्चतम स्तर पर होते हैं तभी हम मुक्त हो सकते हैं.
धीरे-धीरे हम सोपान चढ़ते हैं. जब हमारा शिवत्व दब जाता है तो हम पुनः नीचे आ जाते
हैं, और शिवत्व तब दबता है जब हम कपट आरम्भ करते हैं, साधारण लाभ के लिए जब हम
असत्य आचरण करते हैं. भक्ति में जब दंभ न रहे, ज्ञान का अभिमान न रहे श्रद्धा अटूट
हो तभी मन एकाग्र होगा और एकाग्र मन ही इतर लाभ की चिंता नहीं करता. उसके भीतर कोई
द्वार खुल जाता है, जहां से कोई उसे आवाज देता है. तब निपट निरालों की तरह उसकी
अपनी एक दुनिया होती है. जहां प्रेम, शांति, आनंद का साम्राज्य है. संसार उसे
बार-बार नीचे बुलाता है पर जिसने उसका हाथ पकड़ लिय वह कब तक बंधा रहेगा, वह तो
मुक्त गगन का वासी बन ही जाता है.
Monday, January 2, 2012
तन्मयता (एकाग्रता)
अगस्त २००२
जीवन के एक पक्ष में जब तन्मयता आती है तो उसका प्रभाव अन्य पक्षों पर पड़ना स्वभाविक है. लिखना तभी संभव है जब मन किसी एक विचार पर टिके. जब कोई उद्देश्य लेकर हम काम करते हैं तो मन को एक आधार मिल जाता है, तन को नियम. आत्मा को उसकी पहचान मिलने का सिलसिला शुरू हो जाता है. हम पहले से कहीं ज्यादा खुश रहते हैं, ज्यादा स्पष्ट सोच सकते हैं. वस्तुओं को उनके वास्तविक रूप में देखने लगते हैं. अन्यों के प्रति हमारा व्यवहार अधिक स्नेहपूर्ण हो जाता है. क्रोध अजनबी हो जाता है. ज्ञान भीतर टिकने लगता है. इस सब के पीछे परम की अहैतुकी कृपा ही एक मात्र कारण है ऐसा कृतज्ञता का भाव भी जन्म लेता है. धर्म के सिद्धांत जो पहले मात्र पढ़ने की वस्तु थे, जीवन में उतरने लगते हैं. धर्म वही तो है जो धारण किया जाये. प्रेम का अविरल स्रोत हमारे भीतर है, वह सूखने न पाए इसके लिये भी तन्मयता जरूरी है.
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