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Friday, December 15, 2017

वर्तमान तय करता भावी

१५ दिसम्बर २०१७ 
हमारे द्वारा किया गया हर कृत्य चाहे वह भावना के स्तर पर हो, विचार के स्तर पर हो या क्रिया के स्तर पर हो अपना फल दिए बिना नहीं रहता. शास्त्रों में इसीलिए भावशुद्धि पर बहुत जोर दिया गया है, अशुद्ध भाव का फल भविष्य में दुःख के रूप में  मिलने ही वाला है यदि कोई इस बात को याद रखे तो तो किसी के प्रति अपने भाव को नहीं बिगाड़ेगा. व्यक्ति, परिवार, समाज अथवा किसी राष्ट्र के प्रति हो रहे अन्याय व भेदभाव को देखकर हम कितना नकारात्मक सोचने लगते हैं, हर घटना के प्रति प्रतिक्रिया देते हैं पर यह भूल जाते हैं कि हर विचार प्रतिफल के रूप में भविष्य में और नकारात्मकता लाने का सामर्थ्य रखता है. साधक को सजग रहना है और व्यर्थ के चिंतन से बचना है. प्रारब्धवश जो भी सुख-दुःख उसे मिलने वाला है उसके लिए किसी को दोषी नहीं जानना है. यदि वह स्वयं को कर्ता न मानकर मात्र साक्षी जानता है, तब किसी भी कर्म का फल उसे छू ही नहीं सकता.

Monday, November 13, 2017

निज भाग्य के निर्माता हम

१३ नवम्बर २०१७ 
हमारा हर छोटा-बड़ा कृत्य मन अथवा इन्द्रियों में स्थित किसी न किसी कामना का ही फल होता है, तथा हर कृत्य एक बीज की भांति भविष्य में स्वयं भी अनेक फल प्रदान करने वाला है. मन, इन्द्रियों द्वारा प्रेरित होता है और आत्मा को मन द्वारा इसका ज्ञान होता है. मन व सूक्ष्म इन्द्रियां स्थूल देह के द्वारा सुख-दुःख का अनुभव करती हैं. इनमें से जो प्रबल है उसी की जीत होती है. यदि जिव्हा को मीठा खाने का राग है और मन उसकी इच्छा की पूर्ति करता है, तो इसका संस्कार मन पर पड़ जाता है. मिठाई खाने में जिस सुख का अनुभव किया उस सुख की स्मृति भी बार-बार खाने से गहरी होती जाती है. इसके द्वारा जो भी हानि शरीर को होगी उसका अनुभव मन को होगा, इन्द्रियों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा. अगली बार मन यदि सचेत रहा और इन्द्रियों द्वारा लालायित किये जाने पर भी स्वाद के वशीभूत नहीं हुआ तो भविष्य के दुःख से बच जायेगा अन्यथा पूर्व संस्कार के कारण पुनः उस सुख का अनुभव करने के लिए मिष्ठान ग्रहण करने के लिए तत्पर हो जायेगा. 

Wednesday, August 19, 2015

बढ़ती रहे ऊर्जा प्रतिपल


हमारे हर कृत्य का चाहे वह मनसा हो, वाचा या कर्मणा हो, हमारी आत्मा पर, ऊर्जा पर असर पड़ता है. यह असर दो तरह का हो सकता है पहला उसे भरपूर करने वाला दूसरा उसे रिक्त करने वाला. किसी भी तरह का नकारात्मक भाव ऊर्जा का हनन करता है, सात्विकता उसे समृद्ध करती है. इसका अर्थ हुआ कि व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति यदि हमारे विपरीत भी प्रतीत होती हो यदि हम उसे स्वीकार लेते हैं और मन को नकार से नहीं भरते, ऊर्जा बढती है और यदि सब कुछ हमारे अनुकूल भी हो पर हमरा रवैया यदि हर जगह दोष देखने वाला हुआ तो ऊर्जा घटती है. ऊर्जा की कमी ही किसी भी तरह के रोग का कारण होती है.

Monday, April 20, 2015

जीवन पल में ही मिलता है

दिसम्बर २००८ 
यदि ध्यान से देखें तो पता चलेगा कि किसी क्षण में हम जहाँ होते हैं वहाँ नहीं होते, बल्कि हमारा कोई पता-ठिकाना ही नहीं ! हम जीवन को खोज रहे हैं और जीवन हमें खोज रहा है. जीवन हर तरफ से हमें घेरे हुए है. हम कहते हैं कि भविष्य सुंदर होगा, पर वह भविष्य कभी  आता ही नहीं. जो आता है, वह अभी है, वह आज है ! हम कभी वर्तमान में नहीं होते, इस क्षण में जो जागृत है, वही जागृत है. कृत्य का गुण भीतर से आता है, जो कृत्य मूर्छा में किया गया है वह बांधता है. जागृत कृत्य ही पुण्य है.

Saturday, August 30, 2014

पल भर भी न स्वयं को भूलें

फरवरी २००७ 
साक्षी होकर रहना ही ध्यान है, आत्मा द्रष्टा है, अज्ञान के कारण वह स्वयं को कभी देह, कभी मन, कभी बुद्धि तथा कभी अहंकार मानता है और व्यर्थ ही सुख-दुःख का भागी बनता है. यहाँ जो कुछ भी दिखाई देता है वह नष्ट होने वाला है. यहाँ दो ही कृत्य हो रहे हैं - जो भी उत्पन्न होता है वह नष्ट हो जाता है. अध्यात्म हमें वास्तविकता की ओर ले जाता है, वह हमें पाप-पुण्य दोनों से मुक्त करता है. तब हम कर्ता नहीं रहते. जब हम कर्ता नहीं हैं तो कोई दूसरा भी कर्ता कैसे हो सकता है. अतः किसी को दोषी देखना भूल ही है. व्यर्थ ही ऐसा करके हम अपने मन में विचारों का बवंडर खड़ा कर लेते हैं, जबकि साधक का लक्ष्य तो स्वयं को इन विचारों से मुक्त करना है. इस मार्ग पर चलना तलवार की धार पर चलने जैसा ही है, थोड़ी सी असावधानी से हम अपने स्वरूप से हट जाते हैं, थोड़ी देर के लिए अपने शुद्ध स्वरूप को भूल जाते हैं.


Wednesday, May 28, 2014

तेरे हाथों सौंप दिया सब

मार्च २००६ 
जितना-जितना हम उस परम सत्ता के करीब होते जाते हैं, उससे घनिष्ठ नाता जोड़ते जाते हैं, जो सत्ता कण-कण में व्याप्त है. हम देह की सीमाओं से पार होते जाते हैं. कृत्य का अभिमान नहीं रहता. ज्यादा करने की चाह भी समाप्त हो जाती है. हमारे कर्म तब अपने आप होते प्रतीत होते हैं, वह परमात्मा जैसे हमें अपने हाथों में नचा रहा हो. हम निर्भार होकर जीने लगते हैं. पदार्थों के प्रति भाव भी बदल जाता है, पदार्थ हमारे उपयोग में आयें बस वहीं तक उनका महत्व है, वे हमारे अहंकार को बढ़ाएं तो उनका त्यागना ही उचित है. भीतर एक सहजता का जन्म होता है. यह कितना अद्भुत अनुभव है. एक अनोखी शांति और स्थिरता भीतर बनी रहती है. हम उस स्रोत से जुड़ जाते हैं जहाँ से आए हैं.

Tuesday, March 26, 2013

मुक्त करे आनंद



अस्तित्त्व हमें बोलने, सुनने, देखने, सूँघने, व छूने की शक्ति प्रदान करता है ताकि हम उसके आनंद में भागीदार हो सकें. वह जब अपने आनंद को बांटना चाहता है तो इस सुंदर जगत का निर्माण करता है, अपने से ही वह इसे गढ़ता है, फिर जैसे माँ बच्चे को जन्म देती है, फिर उसे स्नेह देती है और स्नेह पाती है, वैसे ही वह भी आनंद का आदान-प्रदान करता है. मोह वश जैसे कभी सन्तान ही दुःख भी पाती व देती है, वैसे ही हम भी अपने कृत्यों के कारण दुःख पाते हैं, व उसे दुःख देते हैं, क्योंकि उसकी सबसे बड़ी पूजा प्रसन्न चित्त रहना है. चित्त जब निर्मल हो, प्रसन्न हो, समता में हो तब हम उसके निकट हैं और लेन-देन चल रहा है.

Sunday, January 27, 2013

जगा रहे जो मन अपना


फरवरी २००४ 
हमारा जो कृत्य हमारे लिए या दूसरों के लिए किसी दुःख का कारण बने वह पाप है और जो सुख दे वह पुण्य है. दुखों से मुक्ति ही अध्यात्म का लक्ष्य है, इसके लिए पाप से बचना होगा अर्थात चित्त का शोधन करना होगा, चित्त कब विक्षुब्ध होता है, क्यों होता है, हमारे कारण अन्यों का चित्त तो विक्षुब्ध नहीं हो रहा इसका ध्यान रखना है. मन ही पुण्य शील है और मन ही पाप करवाता है. जब हम असजग होते हैं तभी दुःख पैदा करते हैं. मन को गहराई से देखें तो यह अमनी भाव में चला जाता है वहाँ न पुण्य है न पाप. तब मन संवेदनशील होता है, जागरूक होता है, इस जगत की सच्चाइयों को भीतर से जान लेता है, अनुभव के द्वारा पाया ज्ञान ही स्थायी होता है. तब सारे संशय छिन्न-भिन्न हो जाते हैं. अपने ही मन के द्वारा बनाये गए कल्पना के जाल से मुक्ति का अनुभव होता है.