नदी पर्वत से निकलती है तो पतली धार की तरह होती है, मार्ग में अन्य जल धाराएँ उसमें मिलती जाती हैं और धीरे-धीरे वह वृहद रूप धर लेती है. अनेकों बाधाओं को पार करके सागर से जब उसका मिलन होता है, वह अपना नाम और रूप दोनों खोकर सागर ही हो जाती है. जहाँ से वह पुनः वाष्पित होगी और पर्वत पर हिम बनकर प्रवाहित होगी. जीवन भी ऐसा ही है, शिशु का मन जन्म के समय कोरी स्लेट की तरह होता है।पहले माता-पिता उसके शिक्षक बनकर फिर विद्यालय में शिक्षक और गुरूजन उसके मन को गढ़ने में अपना योगदान देते हैं. अच्छे मार्गदर्शन को पाकर एक व्यक्ति जीवन में अपार सफलता प्राप्त करने में सक्षम हो पाता है। एक शिक्षक का अंत:करण अनेक विचारों, मान्यताओं व धारणाओं को अपने भीतर समेटे होता है. वह शिष्यों की योग्यता का अनुमान लगाकर उन्हने उनकी क्षमता के अनुसार आगे बढ़ने का अवसर देता है। वह स्वयं भी जीवन भर सीखता रहता है और सदा उत्साहित बना रहता है। ऐसा तभी सम्भव है जब मन भी नदी की भांति निरंतर बहता रहे, किसी पोखरी की भांति उसका जल स्थिर न हो जाये. ऐसा मन जब ज्ञान के अपार सागर में खोकर अहंकार को विलीन कर दे तभी महान शिष्यों का निर्माण कर सकता है।
Sunday, September 4, 2022
Monday, July 25, 2022
जैसे नदी मिले सागर से
मानव परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ कृति है क्योंकि उसके पास अनंत सम्भावनाओं के रूप में चेतना का बीज है। जब तक हम सामान्य जीवन से संतुष्ट रहते हैं, यह सुप्तावस्था में पड़ा रहता है, जब भीतर स्वयं को जानने की ललक उठती है तो यह बीज अंकुरित होने लगता है। पहली बार उस आनंद की झलक मिलती है जो इस जगत का नहीं है। अलौकिक प्रेम की धीमी-धीमी आँच भीतर सुलगने लगती है और मन देह की सीमा के पार विचरने लगता है। चेतना का बीज जिसे गहराई में छिपा मानते थे अब सारे ब्रह्मांड में उसके विस्तार का अनुभव होता है। वह सूक्ष्म से सूक्ष्म है और असीम से भी असीम ! कर्मों के प्रति विशेष आग्रह टूटने लगते हैं, क्योंकि हर कर्म किसी न किसी इच्छा की पूर्ति के लिए ही किया जाता है। जीवन से अनावश्यक झर जाता है और अस्तित्त्व का जो आशय है वह हमारे होने में पूर्ण होने लगता है। जैसे कोई नदी सागर तक का मार्ग सहज ही खोजती है वैसे ही भीतर की चेतना उस परम चेतना की ओर अग्रसर हो जाती है।
Monday, February 14, 2022
लहर मिले सागर से
संसार से सुख लेने की आदत ने मनुष्य को परमात्मा से दूर कर दिया है। यह सुख जुगनू के टिमटिमाने जैसा प्रकाश देता है और ईश्वरीय सुख सूर्य के प्रकाश जैसा है। दोनों में कोई तुलना हो सकती है क्या ? ईश्वर को सच्चिदानंद कहा गया है। सत अर्थात् उसका अस्तित्त्व कण-कण में है, चित अर्थात् वह चेतन है और वह शुद्ध आनंद स्वरूप है। जो सदा है, हर स्थान पर है, चेतन है तथा आनंद है वही ईश्वर है। इसका अर्थ हुआ वह सदा आनंद के रूप में हमारे भीतर भी है। मन उसी चेतन के कारण चेतना का अनुभव करता है। मन सागर की सतह पर उठने वाली लहरों की भाँति है और परमात्मा वह आधार है जिस पर सागर टिका है। लहर यदि गहराई में जाए तभी सागर के तल का स्पर्श कर सकती है। हम परमात्मा का सान्निध्य पाने के लिए ध्यान द्वारा मन की गहराई में जाएँ तभी उस आधार को जान सकते हैं। हरेक को यह अनुभव स्वयं ही करना होगा अन्यथा परमात्मा के विषय में भ्रम की स्थिति कभी भी दूर होने वाली नहीं है।
Tuesday, November 16, 2021
भीतर जब प्रकटेगी सहजता
बुद्धि रूपी मछली जब आत्मा रूपी सागर को छोडकर मन और इन्द्रियों रूपी संकरी नहरों में आ जाती है तो उसका संबंध सागर से छूट जाता है और वह व्याकुल हो उठती है. जब वह पुनः आत्मा के सागर में पहुँच जाती है तो सुखी हो जाती है.... ईश्वर से हमारा संबंध वैसा ही है जैसा बूंद या लहर का सागर से. प्रियजनों के स्नेह में जो आनंद झलकता है वह हमारी आत्मा का ही प्रकाश है. आत्मा का पूर्ण उद्घाटन ही मानव का साध्य है. राग-द्वेष अर्थात आसक्ति व विरक्ति मन के कार्य हैं, स्वास्थ्य-रोग आदि देह के, जो सुख-दुःख के रूप में हमें मिलते हैं. लेकिन वह हमारा वास्तविक परिचय नहीं है. सहजता के प्राकट्य में आनंद है और उसी में हमारी शक्तियों का पूर्ण विकास सम्भव है.