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Sunday, September 4, 2022

शिक्षक का सम्मान करे जो

नदी पर्वत से निकलती है तो पतली धार की तरह होती है, मार्ग में अन्य जल धाराएँ उसमें मिलती जाती हैं और धीरे-धीरे वह वृहद रूप धर लेती है. अनेकों बाधाओं को पार करके सागर से जब उसका मिलन होता है, वह अपना नाम और रूप दोनों खोकर सागर ही हो जाती है. जहाँ से वह पुनः वाष्पित होगी और पर्वत पर हिम बनकर प्रवाहित होगी. जीवन भी ऐसा ही है, शिशु का मन जन्म के समय कोरी स्लेट की तरह होता है।पहले माता-पिता उसके शिक्षक बनकर फिर विद्यालय में  शिक्षक और गुरूजन उसके मन को गढ़ने में अपना योगदान देते हैं. अच्छे मार्गदर्शन को पाकर एक व्यक्ति जीवन में अपार सफलता प्राप्त करने में सक्षम हो पाता है। एक शिक्षक का अंत:करण अनेक विचारों, मान्यताओं व धारणाओं को  अपने भीतर समेटे होता है. वह शिष्यों की योग्यता का अनुमान लगाकर उन्हने उनकी क्षमता के अनुसार आगे बढ़ने का अवसर देता है। वह स्वयं भी जीवन भर सीखता रहता है और सदा उत्साहित बना रहता है।  ऐसा तभी सम्भव है जब मन भी नदी की भांति निरंतर बहता रहे, किसी पोखरी की भांति उसका जल स्थिर न हो जाये. ऐसा मन जब ज्ञान के अपार सागर में खोकर  अहंकार को विलीन कर दे तभी महान शिष्यों का निर्माण कर सकता है।  


Monday, July 25, 2022

जैसे नदी मिले सागर से

मानव परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ कृति है क्योंकि उसके पास अनंत सम्भावनाओं के रूप में चेतना का बीज है। जब तक हम सामान्य जीवन से संतुष्ट रहते हैं, यह सुप्तावस्था में पड़ा रहता है, जब भीतर स्वयं को जानने की ललक उठती है तो यह बीज अंकुरित होने लगता है। पहली बार उस आनंद की झलक मिलती है जो इस जगत का नहीं है। अलौकिक प्रेम की धीमी-धीमी आँच भीतर सुलगने लगती है और मन देह की सीमा के पार विचरने लगता है। चेतना का बीज जिसे गहराई में छिपा मानते थे अब सारे ब्रह्मांड में उसके विस्तार  का अनुभव होता है। वह सूक्ष्म से सूक्ष्म है और असीम से भी असीम ! कर्मों के प्रति विशेष आग्रह टूटने लगते हैं, क्योंकि हर कर्म किसी न किसी इच्छा की पूर्ति के लिए ही किया जाता है। जीवन से अनावश्यक झर जाता है और अस्तित्त्व का जो आशय है वह हमारे होने में पूर्ण होने लगता है। जैसे कोई नदी सागर तक का मार्ग सहज ही खोजती है वैसे ही भीतर की चेतना उस परम चेतना की ओर अग्रसर हो जाती है। 


Monday, February 14, 2022

लहर मिले सागर से

संसार से सुख लेने की आदत ने मनुष्य को परमात्मा से दूर कर दिया है। यह सुख जुगनू के टिमटिमाने जैसा प्रकाश देता है और ईश्वरीय सुख सूर्य के प्रकाश जैसा है। दोनों  में कोई तुलना हो सकती है क्या ? ईश्वर को सच्चिदानंद कहा गया है। सत अर्थात् उसका अस्तित्त्व कण-कण में है, चित  अर्थात् वह चेतन है और वह शुद्ध आनंद स्वरूप है। जो सदा है, हर स्थान पर है, चेतन है तथा आनंद है वही ईश्वर है। इसका अर्थ हुआ वह सदा आनंद के रूप में हमारे भीतर भी है। मन उसी चेतन के कारण चेतना का अनुभव करता है। मन सागर की सतह पर उठने वाली लहरों की भाँति है और परमात्मा वह आधार है जिस पर सागर टिका है। लहर यदि गहराई में जाए तभी सागर के तल का स्पर्श कर सकती है। हम परमात्मा का सान्निध्य पाने के लिए ध्यान द्वारा मन की गहराई में जाएँ तभी उस आधार को जान सकते हैं। हरेक को यह अनुभव स्वयं ही करना होगा अन्यथा परमात्मा के विषय में भ्रम की स्थिति कभी भी दूर होने वाली नहीं है।   


Tuesday, November 16, 2021

भीतर जब प्रकटेगी सहजता

बुद्धि रूपी मछली जब आत्मा रूपी सागर को छोडकर मन और इन्द्रियों रूपी संकरी नहरों में आ जाती है तो उसका संबंध सागर से छूट जाता है और वह व्याकुल हो उठती है. जब वह पुनः आत्मा के सागर में पहुँच जाती है तो सुखी हो जाती है.... ईश्वर से हमारा संबंध वैसा ही है जैसा बूंद या लहर का सागर से. प्रियजनों के स्नेह में जो आनंद झलकता है वह हमारी आत्मा का ही प्रकाश है. आत्मा का पूर्ण उद्घाटन ही मानव का साध्य है. राग-द्वेष अर्थात आसक्ति व विरक्ति मन के कार्य हैं, स्वास्थ्य-रोग आदि देह के, जो सुख-दुःख के रूप में हमें मिलते हैं. लेकिन वह हमारा वास्तविक परिचय नहीं है. सहजता के प्राकट्य में आनंद है और उसी में हमारी शक्तियों का पूर्ण विकास सम्भव है. 


Thursday, September 19, 2019

ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या



संत कहते हैं, जैसे सागर, लहरें, फेन, बुदबुदे सभी पानी से बने हैं, पानी ही हैं, वैसे ही प्रकृति, ईश्वर, जीव सभी ब्रह्म से बने हैं, ब्रह्म ही हैं. जीव प्रकृति के तीन गुणों के अधीन रहकर कर्म करता है. यदि वह चाहे तो गुणातीत होकर ईश्वर का सान्निध्य प्राप्त कर सकता है अथवा प्रकृति के साथ एक होकर सुख-दुःख के झूले में डोलता रह सकता है. जीव जब स्वयं को देह मानता है तो वह जरा-मरण के भय से मुक्त नहीं हो सकता, जैसे सागर यदि स्वयं को लहर माने तो वे पल-पल में मिटने वाली है. जीव यदि स्वयं को प्राण मानता है तो बुदबुदों की तरह उसका अस्तित्त्व आज है कल नहीं रहेगा. यदि मन मानता है तो सुख-दुःख से बच नहीं सकता, जैसे सागर यदि स्वयं को फेन माने तो नष्ट होगा ही. जीव यदि स्वयं को ब्रह्म मानता है तो उसका विनाश नहीं हो सकता, वह सदा एकरस, मुक्त, आनंदित रह सकता है, जैसे सागर यदि स्वयं को पानी ही माने तो उसका न कभी कुछ बना न ही बिगड़ा. जो सदा रहता है वह सत्य है, जो आज है कल नहीं रहेगा वह मिथ्या है, ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या का यही तात्पर्य है.

Saturday, July 20, 2019

बार-बार खुद को पाना है



जीवन एक अनवरत बहती धारा की तरह एक चक्र में प्रवाहित हो रहा है. सागर में मिलने की लालसा लिए नदी दौड़ती जाती है पर वायु उसे आकाश को लौटा देता है, बादलों के रूप में बरसती है तो फिर नदी बनकर एक यात्रा पर निकल जाती है. सागर में खुद को खोकर बादलों के द्वारा पुनः खुद को पाना क्या यही नदी का लक्ष्य नहीं है. मन रूपी धारा भी आत्मा के सागर में लौटना चाहती  है, सुख-दुःख के दो किनारों के मध्य से बहती हुई स्वयं तक लौटने की उसकी यात्रा ही तो जीवन है. कोई स्वयं तक पहुँच भी जाता है तो किसी न किसी कामना की वायु उसे पुनः एक नयी यात्रा पर ले जाती है. इस तरह न जाने कितने ही जन्मों में मानव ने संतों के चरणों में बैठकर आत्मअनुभव किया होगा, किंतु इस धरती का आकर्षण उसे हर बार मुक्ति के द्वार से यहीं लौटा लाया होगा. आत्मा में स्वयं को खोकर जगत में खुद को पाने की यात्रा क्या यही तो जीवन का रहस्य नहीं है ?


Thursday, December 6, 2018

मन की नदी मिले सागर से


७ दिसम्बर २०१८ 
नदी पर्वत से निकलती है तो पतली धार की तरह होती है, मार्ग में अन्य जल धाराएँ उसमें मिलती जाती हैं और धीरे-धीरे वह वृहद रूप धर लेती है. अनेकों बाधाओं को पार करके सागर से जब उसका मिलन होता है, वह अपना नाम और रूप दोनों खोकर सागर ही हो जाती है. जहाँ से वह पुनः वाष्पित होगी और पर्वत पर हिम बनकर प्रवाहित होगी. जीवन भी ऐसा ही है, शिशु का मन जन्म के समय कोरी स्लेट की तरह होता है, माता-पिता, शिक्षक, समाज, राज्य, राष्ट्र और विश्व उसके मन को गढ़ने में अपना योगदान देते हैं. अनेक विचारों, मान्यताओं व धारणाओं को समेटे होता है उसके मन का जल. यदि उचित समय पर मार्गदर्शन मिले और मृत्यु से पूर्व वह पुनः मन को खाली कर पाए, नाम-रूप का त्याग कर समष्टि मन से एक हो जाये तो वह भी सागर बन सकता है. ऐसा तभी सम्भव है जब मन भी नदी की भांति निरंतर बहता रहे, किसी पोखरी की भांति उसका जल स्थिर न हो जाये.  

Monday, August 13, 2018

भक्ति करे कोई सूरमा


१३ अगस्त २०१८ 
बूंद जैसे हम हैं और सागर जैसा भगवान, उससे मिलने जायेंगे तो हमें स्वयं को खोना ही पड़ेगा. बीज जैसे हम हैं और विशाल वटवृक्ष जैसा परमात्मा है, हम मिटेंगे तभी वह प्रकटेगा. मल, विक्षेप, आवरण से ढके हैं हम और वह अनंत खुले आकाश जैसा सब और व्याप्त है. हम पंचकोश में छिपे हैं. इच्छाओं और कामनाओं के दुर्ग में कैद हैं, मन है कि पीपल के पत्ते सा पल-पल डोला करता है, बात त्यागने लायक हो फिर भी उसे मन से लगाये रहते हैं. अहंकार ही दुःख का आवरण डाले रहता है पर उसे भी नहीं छोड़ते, जानते हुए भी उस मार्ग का त्याग नहीं कर पाते जिस पर चल कर सदा ही दुःख पाया है. जिसकी मंजिल अनंत आकाश है वह स्वयं को पिंजरे में कैद मानता है, यही तो माया है. सद्गुरू कहते हैं, जिस घड़ी भीतर मिटने से कोई भय नहीं रहेगा, अहंकार को विसर्जित करन सहज हो जायेगा, उसी पल सत्य में जागरण होगा.

Tuesday, July 10, 2018

जब आवे संतोष धन


११ जुलाई २०१८ 
संत कहते हैं, जैसे सागर में मछलियाँ और हवा में पंछी सहज ही निवास करते हैं, हमारी चेतना परम चैतन्य के महासागर में सदा ही स्थित है. हम मन के द्वारा विचार करते हैं, इन्द्रियों के द्वारा इस जगत का अनुभव करते हैं. अनुभव और जिसका अनुभव किया अर्थात यह जगत हमें इतना प्रभावित करता है कि हम इस बात पर कभी ध्यान ही नहीं देते कि अनुभव करने वाला कौन है. अनुभव करने वाली चेतना सदा ही परम में स्थित है. पहले ध्यान के द्वारा मन से सारे अनुभवों से मुक्त करना है, उस क्षण में अनुभव कर्ता स्वयं का अनुभव करेगा, और जब दीर्घ काल तक चेतना स्वयं में ठहरना सीख जाएगी, शुद्ध चैतन्य का अनुभव भी होगा. संत और शास्त्र कहते हैं, इस अनुभव के बाद जो सहज शांति और संतुष्टि मन को मिलती है, वह किसी कारण से विलुप्त नहीं होती, क्योंकि वह परम से उपजी है जो अजर और अमर है.

Thursday, July 5, 2018

जिन खोजा तिन पाइयाँ


५ जुलाई २०१८ 
हमारे जीवन में बाहर की परिस्थतियाँ कैसी भी हों, हरेक के भीतर परमात्मा एक सा समाया है. जैसे आकाश सबको एक सा दीखता है, सूर्य रश्मियाँ, हवा और जल किसी के प्रति भेदभाव नहीं करते वैसे ही सबके भीतर चेतना का स्रोत एक ही है. जैसे सागर देखने सब जाते हैं, पर कोई लहरों से भयभीत होकर उसके निकट तक नहीं जाता, कोई गोता लगाकर मोती खोज लाता है, उसी तरह हम अपने विचारों और भावनाओं की लहरों को देखकर ही खुद को जान लिया समझ लेते हैं, और कोई संत गहरे जाकर सत्य का मोती खोज लेता है. जैसे सागर सब नदियों का स्वागत करता है और खारे  जल को मुक्त करके मीठा बनाकर पुनः उन्हें लौटा देता है, परमात्मा हमारे विचारों और भावों को समा लेता है और परिवर्तित कर नये रूप में लौटा देता है.

Tuesday, April 10, 2018

थम जाता जब मन हो विस्मित

सागर के भीतर अनेकों सुंदर जीव हैं, जिन्हें न वनस्पति कहा जा सकता है न ही जन्तु, जिन्हें देखकर लगता है इस सुंदर सृष्टि को बनाने के पीछे परमात्मा जैसे कोई क्रीड़ा कर रहा है. एक शक्ति है जो विभिन्न नाम-रूप धारण करके स्वयं को व्यक्त कर रही है . जीवजगत विचित्र है तो मानव जगत अद्भुत है. मानवीय बुद्धि की कोई सीमा नहीं, वही शक्ति मानव के मस्तिष्क द्वारा विचार की महानतम ऊँचाई पर पहुँच रही है. यदि कोई इस दृष्टिकोण से जगत में विचरता है तो उस शक्ति का तीसरा तत्व आनन्द सहज ही प्रकट होने लगता है. जैसे नींद में जाते ही जगत का लोप हो जाता है और मन सुख-दुःख के पार चला जाता है, वैसे ही जागृत अवस्था में भी प्रज्ञा के स्थित होने से अर्थात एक समाधान को पा लेने से साधक कृत-कृत्यता का अनुभव कर सकता है . 

Thursday, March 29, 2018

बन जाएगा मन विशाल जब


२९ मार्च २०१८ 
हमारा छोटा सा मन खुद को नहीं जानता और एक सीमित दायरे में सिकुड़ा रहता है. जैसे एक छोटी सी तलैया स्वयं को विशाल समुन्दर से कितना छोटा मानती है पर दोनों में ही जल है, अर्थात गुणवत्ता की दृष्टि से दोनों समान हैं. मन जिस स्रोत से आया है वह अनंत सम्भावनाओं का केंद्र है, किंतु स्वयं को अपनी धारणाओं और मान्यताओं की कैद में सीमित मानता है. यदि वह एक बार इन्हें तोड़कर अपने भीतर झाँके तो शक्ति का एक सागर उसे नजर आता है. हम अपनी क्षमताओं को ही नहीं पहचानते और उत्तरदायित्वों से बचने का बहाना ढूँढ़ते हैं. समाज के लिए हम कुछ कर सकते हैं, ऐसी भावना ही तभी जन्मती है जब मन अपनी छोटी-छोटी जरूरतों के पार निकल जाता है. ध्यान ही वह साधना है जो हमें अपनी छिपी हुई शक्तियों से परिचित कराती है. जीवन में सत्य का जागरण हो उसके लिए नियमित साधना और स्वाध्याय ही प्रथम और अंतिम आवश्यकता है.

Thursday, February 8, 2018

जिन डूबा तिन पाइयाँ

९ फरवरी २०१८ 
संत कहते हैं, चिन्मय होते हुए मनुष्य स्वयं को मृण्मय मान बैठा है. असीम होते हुए सीमा में बंध गया है, सुख स्वरूप होते हुए सुख की कामना में दौड़ रहा है. यदि कोई संतों की इस बात पर विचार करे और उसका अनुभव भी कर ले तो उसका जीवन कितना सुंदर हो जायेगा. आत्मा यदि सागर है तो मन की उपमा लहरों से दी जाती है, किन्तु सागर हो या लहरें, वास्तव में तो दोनों जल ही हैं. इसी प्रकार आत्मा हो या मन वास्तव में दोनों परमात्मा ही हैं. जैसे लहरों ने सागर को ढक लिया है, हम लहरों को देखकर ही सागर को देख लिया मान लेते हैं, सागर की अतल गहराई का उसके विशाल विस्तार का हमें ज्ञान ही नहीं होता, नाम और रूप हमें इस तरह प्रभावित कर लेते हैं कि जल को तो हम देखते ही नहीं. ऐसे ही मन को देखकर ही हम व्यक्ति को देख लिया मान लेते हैं. आत्मा की अतल गहराई का हमें ज्ञान ही नहीं होता. जिस चेतन तत्व से वे बने हैं, उस परमात्मा को तो हम देखते ही नहीं. यदि दृष्टि जल पर हो तो सागर, लहरों, बुदबुदों और फेन में एक ही सत्ता दिखेगी. यदि परमात्मा पर दृष्टि हो तो आत्मा, मन, बुद्धि, अहंकार सबके पीछे एक ही सत्ता दिखेगी. सबके भीतर एक ही तत्व को देखते ही सारा भेद मिट जाता है और वसुधैव कुटुम्बकम का भाव सहज ही जग जाता है.  

Tuesday, February 6, 2018

नाम-रूप से पार जो देखे

६ फरवरी २०१८ 
प्रतिपल इस जगत में कितना कुछ घट रहा है, सृष्टि के इस अनंत पटल पर न जाने कब से असंख्य खेल खेले जा चुके हैं, जा रहे हैं और खेले जायेंगे. आश्चर्य की बात यह है कि उस पटल पर उनका चिह्न भी शेष नहीं रहता. जैसे स्वप्न में हम किले बनाते हैं, विशाल पर्वत रच लेते हैं और जगने पर उनका नामोनिशान नहीं मिलता, वैसे ही यह जगत प्रतिपल ‘हाँ’ से ‘नहीं’ हुआ जा रहा है. जो इसे ही वास्तविक मान लेते हैं वह इस नाम-रूप के जगत के पीछे छिपे अव्यक्त कारण की खोज नहीं करते. जैसे सागर में उठी लहरें नाशवान हैं, वे सागर का ही एक रूप हैं और लहर नाम से जानी जाती हैं. लहरों के नाश होने पर सागर का नाश नहीं होता. सागर भी जल का एक रूप है और सागर नाम से जाना जाता है, यदि कभी सागर भी सूख जाये तो जल का नाश नहीं होता. इसी तरह मन भी आत्मा के सागर में उठी लहर ही है, और देह मन के सागर में उठी लहर. देह व मन के नाश हो जाने पर आत्मा का नाश नहीं होता.     

Wednesday, November 1, 2017

पार लगें इस भव सागर से

१ नवम्बर २०१७ 
संत कहते हैं, नाम-रूप का यह जगत मिथ्या है, सत्य है इसके पीछे का आधार, जिससे इसकी उत्पत्ति होती है. जैसे मिट्टी से बने बर्तन मिटटी ही हैं, व्यवहार करने के लिए उनमें नाम रूप की कल्पना की जाती है. सागर में जल रूप होने पर भी तरंग, फेन, बूंद आदि नाम व रूप के कारण पृथक कहे जाते हैं. मन में उठने वाले विचार, संकल्प-विकल्प, स्मृति, भावनाएं, कामनाएं, विकार सब मन ही हैं. मन से ही उत्पन्न हुए वे मन में ही समा जाते हैं और हम उन्हें सत्य मानकर सुखी-दुखी होते रहते हैं. मन में ही जन्मों के संस्कार पड़े हैं, जिनके कारण सुखद या दुखद संवेदना उठती है, उन्हें समता भाव से देखकर चले देने जाने के बजाय हम सत्य मानकर उनके अनुसार अच्छे या बुरे कर्म करने लगते हैं, जिनका फल फिर भविष्य में भोगना पड़ता है और जिनके संस्कार फिर गहरे होते जाते हैं. इसी का नाम संसार है जिससे साधक को मुक्त होना है. उपाय है कि ध्यान के द्वारा हम मन को साक्षी भाव से देखना सीख लें और बादलों की तरह आते-जाते विचारों के द्रष्टा भर बन जाएँ.   

Thursday, April 6, 2017

निज हाथों में मन की डोर

६ अप्रैल २०१७ 
आत्मा सागर है और मन उसमें उठने वाली तरंगें, आत्मा आकाश है, मन उसमें तिरने वाले बादल. आत्मा कच्चा माल है और मन उसका उत्पादन..हम किसी भी तरह से सोचें अस्तित्त्व और हमारे मध्य कोई न कोई संबंध देख ही सकते हैं. ऐसा संबंध जो हमने नहीं बनाया है जो सदा से है. हम इस बात के लिए पूर्ण स्वतंत्र हैं कि मन को कैसा मानें, तरंगों की भांति जिस पर हमारा कोई नियन्त्रण नहीं, बादलों की भांति जो आते हैं और चले जाते हैं, अथवा तो स्वयं के पूर्ण नियन्त्रण में बनने वाले उत्पाद के रूप में. स्वयं को आत्मा जानकर जब  हम अपने विचारों को गढ़ते हैं, उन्हें सजाना-संवारना हमारे हाथ में होता है. हर विचार एक बीज है और हर बीज  कर्म रूप में वृक्ष  बनेगा जिस पर फल भी लगेंगे और नये बीज भी बनेंगे, जो बिलकुल वैसे ही होंगे जैसा बीज था. इसका अर्थ हुआ हमारा भाग्य हमारे विचारों का ही प्रतिफल है. 

Thursday, March 9, 2017

ममेवांशो जीवलोका:

१० मार्च २०१७ 
कबीर ने कहा है, कोई सागर को स्याही बना ले और सारे वनों की कलम बना ले तब भी उस परमात्मा का बखान नहीं कर सकता. कृष्ण कहते हैं, मैं अपने एक अंश में इस सम्पूर्ण सृष्टि को धारण करता हूँ. आज के वैज्ञानिक भी कहते हैं जो दिखाई देता है वह उस न दिखाई देने वाले की तुलना में अति सूक्ष्म है. हमारी बुद्धि चकरा जाती है यह सोचकर कि अरबों, खरबों  गैलेक्सी भी उस अनंत के सामने कुछ नहीं. इस विशाल सृष्टि में मानव का स्थान कितना छोटा है पर उसके भीतर जो चैतन्य है वह उसी परमात्मा का अंश है, राजा कितना भी बड़ा हो, उसके पुत्र के लिए वह सदा सुलभ है, ऐसे ही परमात्मा कितना भी महान हो मानव के लिए वह हर क्षण उपलब्ध है. मानव जन्म का इसीलिए इतना गौरव गाया गया है. हमारा मूल बना है उसी तत्व से जिससे वह बना है. प्रेम, शांति, पवित्रता, ज्ञान, शक्ति, सुख और आनंद हमारा मूल स्वभाव है, तभी तो इससे विपरीत होते ही हम व्याकुल हो जाते हैं. जितना-जितना हम अपने मूल से दूर चले जाते हैं, दुःख को प्राप्त होते हैं. 

Thursday, October 29, 2015

सुख का सागर लहराता है

ऐसे तो हर कोई सुख की खोज में लगा है पर जो सचेतन होकर सुख की तलाश में निकलता है वह एक दिन स्वयं को सुख के सागर में पाता है. सुख की तलाश जब सजग होकर की जाती है तो उसका पता पूछना होगा, जो भी ऐसे कारण हैं जो सुख को दूर करते हैं उन्हें मिटाना होगा. सजगता ही वह सूत्र है जो किसी को भी मंजिल तक पहुंचा सकती है. इसका सबसे बड़ा कारण है कि सुख को बनाना नहीं है वह तो मौजूद है, अनंत मात्रा में मौजूद है, जरूरत है उसका पता पूछकर उस दिशा में कदम बढ़ाने की.  

Thursday, February 5, 2015

कोरा कागज है यह मन मेरा


यह सृष्टि कितनी अद्भुत है, सागर की लहरें, गगन के सितारे, पंछियों के गान, चाँद की चाँदनी सभी जैसे उत्सव मना रहे हैं ! परमात्मा रसरूप है, उसकी बनाई सृष्टि रस का सागर है ! संसार तो दर्पण है, हम जैसे हैं वैसा ही हमें उसमें दिखाई पड़ेगा. संसार तो कोरा कागज है हम जैसा चित्र उस पर बनाएं वैसा ही दिखता है. हम यदि चाहें तो इस पर कुछ न बनाएं कोरा ही रहने दें तो मोक्ष का द्वार खुल जाता है ! मोक्ष का अर्थ है परम स्वंत्रता ! परम स्वीकार ही परम आजादी है, अमनी भाव है, मन है ही नहीं ! वहीं अखंड आनंद है, परम दशा है, सुख-दुःख वहाँ है ही नहीं ! जहाँ हम परम ऊर्जा के साथ एक हो जाते हैं !  

Sunday, November 30, 2014

लहरों सा मन गिरता उठता

जून २०१४ 
‘मैं कुछ हूँ’ से ‘मैं हूँ’ तथा ‘मैं हूँ’ से ‘है’ तक की यात्रा ही अध्यात्म की यात्रा है. जब ‘है’ की अनुभूति होती है तो कोई भेद नहीं रहता. समाधि की अवस्था तभी मिलती है. मन जब अपने मूल स्वरूप में टिक जाये तत्क्षण समाधि घटती है. आत्मा शुद्ध चिन्मात्र सत्ता है, वह आकाशवत है. मन उसमें उठने वाला एक आभास ही तो है. मन को जब हम अलग सत्ता दे देते हैं तभी बंधते हैं. जहाँ द्वैत है वहाँ दुःख है. विचार भी उसी आत्मा की लहरें हैं जो आनन्दमयी है. भीतर उठने वाले सारे संशय, डर तथा भ्रम उसी आत्मा से ही तो उपजे हैं, वे दूसरे नहीं हैं, उनसे कैसा डर. विचार तो शून्य से उपजा है और शून्य में ही विलीन हो जाने वाला है. सागर क्या अपनी लहरों से डरेगा चाहे लहर कितनी भी बलशाली  क्यों न हो, आकाश क्या बादलों की गर्जन से डरेगा ?  आत्मा सागर की तरह गहरी और आकाश की तरह अनंत है, वह निर्मल है, वह जहाँ है वहाँ न कोई गुण है न दुर्गुण, वहाँ कुछ भी नहीं है, निर्दोष, अनछुई वह शुद्ध प्रकाश है. प्रकाश का कोई आकार नहीं, वह उससे भी सूक्ष्म है.