Thursday, February 5, 2015

कोरा कागज है यह मन मेरा


यह सृष्टि कितनी अद्भुत है, सागर की लहरें, गगन के सितारे, पंछियों के गान, चाँद की चाँदनी सभी जैसे उत्सव मना रहे हैं ! परमात्मा रसरूप है, उसकी बनाई सृष्टि रस का सागर है ! संसार तो दर्पण है, हम जैसे हैं वैसा ही हमें उसमें दिखाई पड़ेगा. संसार तो कोरा कागज है हम जैसा चित्र उस पर बनाएं वैसा ही दिखता है. हम यदि चाहें तो इस पर कुछ न बनाएं कोरा ही रहने दें तो मोक्ष का द्वार खुल जाता है ! मोक्ष का अर्थ है परम स्वंत्रता ! परम स्वीकार ही परम आजादी है, अमनी भाव है, मन है ही नहीं ! वहीं अखंड आनंद है, परम दशा है, सुख-दुःख वहाँ है ही नहीं ! जहाँ हम परम ऊर्जा के साथ एक हो जाते हैं !  

8 comments:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (06.02.2015) को "चुनावी बिगुल" (चर्चा अंक-1881)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।

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    1. बहुत बहुत आभार राजेन्द्र जी !

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  2. रसो वै सः ।
    प्रशंसनीय - प्रस्तुति ।

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  3. परम स्वीकार ही परम आजादी है, अमनी भाव है, मन है ही नहीं !.....................

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  4. स्वागत व आभार शकुंतला जी व राहुल जी !

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