कोरोना के खिलाफ जो जंग भारत ने लगभग जीत ही ली थी, सकुचाते हुए जिसकी विजय का जश्न भी मनाया था. उसे फिर हार न जाएं ऐसा डर आज हम सभी के मनों में समाया है। ऐसा लग रहा है जैसे हम सोते ही रहे और दुश्मन घर तक आ गया, और देखते ही देखते हर शहर, हर गली मोहल्ले में छा गया. आज सब ओर भय का वातावरण है लेकिन हमें याद रखना होगा, जो भयभीत है वह मन है। जो उस भय को देखता है, वह हम हैं। जब हम कहते हैं मुझे भय लग रहा है, हम मन के साथ एकात्म हो जाते हैं. मन माया है. हम माया से बंध जाते हैं. जो जानता है, वह हम हैं जानने में एक दूरी है। इस दूरी का अनुभव करते हुए हम पुन: जीतेंगे इस दुगने विश्वास से लड़ना है. लॉक डाउन का पालन बड़ी सख्ती से करना है जीवनचर्या में प्राणायाम को शामिल कर प्राणों में नैसर्गिक वायु भरनी है. न कि अस्पतालों में आक्सीजन के लिए लंबी कतारें खड़ी करनी हैं. हम भूल गए कि वायरस अभी जिंदा है, हर मौत जो किसी की कहीं हुई, उसके लिए हर भारतीय शर्मिंदा है। किन्तु हमें इसे अपनी कमजोरी नहीं बनने देना है। हर नागरिक हर नियम का कड़ाई से पालन करे, इस मुश्किल घड़ी में हमें मिलकर सुरक्षित निकलना है। अगली लहर आए उससे पहले ही मुस्तैदी से तैयार रहना है। स्वच्छता का दामन थाम पौष्टिकता का ध्यान रखना है। वैक्सीन लगवा कर प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करना है। सब उपाय करके अब घर-घर से वायरस को विदा करना है।
Monday, April 26, 2021
Sunday, January 24, 2021
जहाँ विजय है लोकतंत्र की
कल देश का बहत्तरवाँ गणतंत्र दिवस है, कोरोना के कारण इस बार परेड में कुछ बदलाव हुए हैं, मुख्य अतिथि भी नहीं आ रहे हैं। राजधानी में किसानों के आंदोलन के कारण भी कुछ अनिश्चितता का वातावरण है। किन्तु कुछ भी हो, देश वासियों के दिलों में गणतंत्र दिवस मनाने का जोश उतना ही है। पिछले एक वर्ष में बहुत कुछ ऐसा हुआ जो पहले कभी नहीं हुआ था, लंबा लॉक डाउन, मजदूरों की घर वापसी, कोरोना के कारण अस्पतालों में मरीजों की बेतहाशा भर्ती, आर्थिक मंदी, स्कूलों का बंद होना और भी कितनी कठिनाइयों को झेलते हुए यह पिछला वर्ष पूरी दुनिया के लिए एक चिंता की वजह छोड़ गया है। इन सबके बावजूद मानव आगे की ओर देख रहा है, वैक्सीन का निर्माण हो चुका है, कोरोना पर काफी हद तक नियंत्रण हो चुका है। भारत विश्व के कई देशों को इसकी वैक्सीन भेजने में सक्षम है, यह बात भी हमारे लिए कितने गर्व की है। एक बार फिर राजपथ पर सुंदर झाँकियाँ, बच्चों के द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम तथा सैन्य बलों का प्रदर्शन एक बार फिर यह सिद्ध कर देगा कि आपदा चाहे कितनी भी भीषण क्यों न हो मानवता अपना मार्ग ढूंढ ही लेती है। अंधेरा कितना भी घना क्यों न हो उजाले को रोक नहीं सकता। बांग्ला देश की आजादी की स्वर्णजयंती के अवसर पर वहाँ का एक सैन्य बैंड भी गणतंत्र दिवस परेड में भाग लेगा।
Monday, September 28, 2020
प्रकृति का सम्मान करे जो
दुनिया में कोरोना से मरने वालों का आंकड़ा बढ़ता ही जा रहा है। मौत की खबर अब किसी को पहले की भांति नहीं कंपाती। मृत्यु एक संख्या बनकर रह गई है। मृत व्यक्तियों का अंतिम संस्कार भी कई बार अस्पताल द्वारा ही अजनबियों के हाथों कर दिया जाता है। सफेद बैगों में बंद वे तन अपनों के अंतिम स्पर्श व दर्शन से भी वंचित हो जाते हैं।कुछ दिन पहले उनके भीतर भी धड़कते दिल थे, उन्हें भी यकीन था कि कोरोना उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा। वे भी शक्ति के एक पुंज थे और उसी अनंत स्रोत से आए थे। मानव को अब जागकर देखना होगा कि जीवित रहना कितना सरल है यदि वह हवा को मैला न करे। मिट्टी से जुड़ा रहे. कीट नाशक दवाओं का अंधाधुंध प्रयोग न करे। दूध में रसायन न मिलाए। सब्जियों और फलों को इंजेक्शन न लगाए। समुद्री जीवन हो या बर्फीले स्थानों के प्राणी और वनस्पति, कहीं भी मानव की नीतियों का गलत असर न हो। जीवन का स्रोत तो एक ही है, यदि प्रकृति के साथ प्रेमपूर्ण व्यवहार होगा तो वह देख पाएगा जीवन कितना सुंदर है। झरनों का संगीत, वर्षा की रिमझिम, हवाओं का स्पर्श, नदियों के तट की सुषमा सभी को अनुभव करके दैवी गुणों का विकास हो तो प्रकृति का शांत रूप ही प्रकट होगा।