आज विश्व एक विचित्र दौर से गुजर रहा है. कोरोना के खिलाफ सभी देश आपसी भेदभाव को भुला कर एक हो गये हैं. चीन से दिसंबर में हुई इसकी शुरुआत के बाद इटली, स्पेन और ईरान में कहर बरसाता हुआ यह वायरस भारत में भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुका है. सरकार की तरफ से दिशा-निर्देश दिए जा रहे हैं. भीड़भाड़ वाले इलाकों से बचना है, रेल, बस या हवाई यात्रा करना सुरक्षित नहीं है. बंगलुरू में तो सभी शिक्षा संस्थान, मॉल, दफ्तर, सिनेमाघर आदि बंद कर दिए गए हैं. लोग घर से काम कर रहे हैं, बच्चे अभी से ग्रीष्मकालीन छुट्टियों का लुत्फ़ उठा रहे हैं. जीवन जैसे एकाएक बदल गया है. प्रधानमंत्री ने पड़ोसी देशों को इस अदृश्य शत्रु से लड़ने में हर तरह की सहायता देने का आश्वासन दिया है. इस महामारी के कारण कुछ फायदे भी हो सकते हैं. सड़कें खाली रहेंगी तो ट्रैफिक की समस्या नहीं होगी, प्रदूषण कम होगा. बच्चों को परीक्षाओं का भय नहीं सताएगा. लोग घरों में रहेंगे तो आपसी मेलजोल बढ़ेगा. घर पर भोजन बनाने की प्रथा पुनः जागृत होगी. साफ-सफाई का ध्यान रखा जायेगा, जीवन में शुचिता का सम्मान होगा. व्यायाम के प्रति भी लोग सचेत होंगे, जड़ी-बूटी से रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के नुस्खे पुनः काम में लाये जायेंगे. यदि हर कोई अपनी सुरक्षा का ध्यान रखे तो इस रोग से न केवल बचा जा सकता है, इसे फैलने से रोका जा सकता है.
Showing posts with label शत्रु. Show all posts
Showing posts with label शत्रु. Show all posts
Sunday, March 15, 2020
Thursday, September 20, 2018
भक्ति करे कोई सूरमा
२२ सितम्बर २०१८
भारत का सर्वपूज्य
ग्रन्थ भगवद् गीता कृष्ण और अर्जुन के संवाद पर आधारित है, जो युदद्ध क्षेत्र में
घटा था. इसके पीछे एक रहस्य है. वास्तव में एक साधक का जीवन योद्धा की भांति होता
है. एक योद्धा अनुशासित, वीर, निर्भय और स्वालम्बी होता है, युद्ध करते समय उसे तत्काल
निर्णय लेने होते हैं. उसे प्रतिपल सजग रहना होता है, वह अपने शत्रुओं को पहचानता
है और उसे अपनी क्षमता का भी भान होता है. युद्ध क्षेत्र में उसकी छोटी सी
असावधानी भारी पड़ सकती है. एक साधक को भी जीवन के कर्मक्षेत्र में सजग रहकर आलस्य,
प्रमाद, पंच विकार अदि शत्रुओं से युद्ध लड़ना होता है. जो वस्तुएं उसके मार्ग में
बाधक हैं, उनका प्रबल विरोध करके ही वह अपनी मंजिल तक पहुंच सकता है. हम सभी किसी
न किसी रूप में ईश्वर की भक्ति, आराधना, योग, ध्यान आदि करते हैं, किन्तु अंतिम
लक्ष्य हमसे दूर ही बना रहता है. इसका सबसे बड़ा कारण है हम अपने शत्रुओं को अपना
निजी संबंधी मानकर उन्हें नष्ट करने से मना कर देते हैं. जैसे अर्जुन अपने
गुरुजनों, पितामह आदि को मारना नहीं चाहता था, जबकि वह भली-भांति जानता था कि वे
उसके शत्रुओं से मिले हुए हैं. जब तक हम शुभ को पूर्ण स्वीकार कर अशुभ को अपने
जीवन से पूर्ण तिलांजलि नहीं दे देते, हमारा जीवन पूर्ववत् ही बना रहता है, चाहे
हम कितने ही जप-तप कर लें.
Thursday, April 25, 2013
साईं नाथ तेरे हजारों हाथ
मन की व्यग्रता इस बात की
द्योतक है कि हमें अभी जगत में रहना नहीं आया, जगत में रहना जब किसी को आ जाता है
तो वह परमात्मा के द्वार पर रहने लायक भी हो जाता है. मान-अपमान, सुख-दुःख आदि
द्वन्द्वों रूपी चक्की के पाटों में वही पिसने से बच जाता है. व्यर्थ की बातों में
फंसकर जब हम स्वयं को उलझा लेते हैं, कल्पनाओं के जाल में फंसकर स्वयं को सुखी-दुखी
करते हैं, तब हम यह भूल जाते हैं कि कल्पना का यह महल कब तक रहेगा, इसे तो गिरना
ही होगा. प्रामाणिकता यदि हमारे आचरण में नही है तो सुख भी प्रामाणिक नहीं हो
सकता. हमें तो उस शांति को पाना है जो हमारी निज की सम्पत्ति है, उस प्रेम को, जो
हमारा स्वरूप है. जगत में जो कुछ भी घट रहा है वह अनंत करवा रहा है, वही हमारा शत्रु बन कर आता है,
वही मित्र बनकर, वही हमारे भीतर है, हमें अपने मूल स्रोत तक पहुँचाने के लिए वह
निरंतर हम पर दृष्टि रखे है. हम सुरक्षित हाथों में हैं.
Tuesday, March 13, 2012
नन्हा सा ? यह मन बेचारा
जनवरी २००३
सत्य के साधक को आपने मन पर नजर रखनी होती है, हमारे मन में एक पल में न जाने कितने विचार आकर चले जाते हैं, जिनके बारे में हम कभी ध्यान ही नहीं देते. ध्यान करते-करते मन जब दर्पण जैसा बन जाये तो भीतर का सारा खेल उसमें झलकने लगता है, तब सूक्ष्म से सूक्ष्म बात भी छिप नहीं सकती. मन ही हमारा शत्रु है और मन ही हमारा मित्र है, सारी साधना इसी मन को केन्द्र में रखकर होती है. हर पल का हमारा साथी है मन, पर इसकी गहराइयों में क्या छिपा है हम नहीं जानते. विचित्र हैं इसकी गतिविधियां. आत्मा की शक्ति ही है मन, हमें आत्मा का संचय करना है अर्थात मन का संचय करना है. व्यर्थ के चिंतन में न लगाकर अपने लक्ष्य पर केंद्रित करना है. ध्यान से ऊर्जा का संचय होता है जो हममें कर्म करने का सामर्थ्य बढ़ाती है. मन की सीमा नहीं और इसीलिए इसको असीम प्रेम, ज्ञान व शांति से ही संतुष्ट किया जा सकता है ससीम वस्तुओं से नहीं.
Subscribe to:
Posts (Atom)