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Tuesday, November 3, 2020

उस अज्ञेय से प्रेम करे जो

 

जीवन बहुआयामी है। यहाँ हर किसी को अपनी रुचि और क्षमता के अनुसार आगे बढ़ने का सुअवसर है। ज्ञान की कोई सीमा नहीं है। एक छोटे से कण का पूरा ज्ञान भी आजतक कोई नहीं जान पाया। अंतरिक्ष की कौन कहे अभी भी धरती पर ऐसे कई स्थान हैं जहाँ मानव नहीं पहुंचा है। कुछ ऐसा है जो हमने जान लिया है, कुछ ऐसा है जो आज नहीं कल हम जान लेंगे पर कुछ ऐसा तब भी बच जाएगा जिसे हम कभी भी जान नहीं पाएंगे। वह अज्ञेय ही सारे रहस्यों का कारण है और उस आनंद का स्रोत भी वही  है जिसके कारण हर सुबह पंछी चहचहाते हैं, खरगोश दौड़ते-भागते हैं, फूल खिलते हैं, बच्चे मुसकुराते हैं और जिन्हें देखकर माँ के हृदय में वात्सल्य भरे प्रेम का अनुभव होता है। जहाँ से सारा शुभ जन्मता है और यदि अशुभ न हो तो शुभ का महत्व ही क्या रह जाएगा, अशुभ भी वहीं से उपजता है, जैसे माँ की फटकार में भी प्रेम छुपा है; पर वह दोनों से परे स्वयं में स्थित है। सारी ऊर्जा का स्रोत भी वही है।

Thursday, September 20, 2018

भक्ति करे कोई सूरमा


 २२ सितम्बर २०१८ 
भारत का सर्वपूज्य ग्रन्थ भगवद् गीता कृष्ण और अर्जुन के संवाद पर आधारित है, जो युदद्ध क्षेत्र में घटा था. इसके पीछे एक रहस्य है. वास्तव में एक साधक का जीवन योद्धा की भांति होता है. एक योद्धा अनुशासित, वीर, निर्भय और स्वालम्बी होता है, युद्ध करते समय उसे तत्काल निर्णय लेने होते हैं. उसे प्रतिपल सजग रहना होता है, वह अपने शत्रुओं को पहचानता है और उसे अपनी क्षमता का भी भान होता है. युद्ध क्षेत्र में उसकी छोटी सी असावधानी भारी पड़ सकती है. एक साधक को भी जीवन के कर्मक्षेत्र में सजग रहकर आलस्य, प्रमाद, पंच विकार अदि शत्रुओं से युद्ध लड़ना होता है. जो वस्तुएं उसके मार्ग में बाधक हैं, उनका प्रबल विरोध करके ही वह अपनी मंजिल तक पहुंच सकता है. हम सभी किसी न किसी रूप में ईश्वर की भक्ति, आराधना, योग, ध्यान आदि करते हैं, किन्तु अंतिम लक्ष्य हमसे दूर ही बना रहता है. इसका सबसे बड़ा कारण है हम अपने शत्रुओं को अपना निजी संबंधी मानकर उन्हें नष्ट करने से मना कर देते हैं. जैसे अर्जुन अपने गुरुजनों, पितामह आदि को मारना नहीं चाहता था, जबकि वह भली-भांति जानता था कि वे उसके शत्रुओं से मिले हुए हैं. जब तक हम शुभ को पूर्ण स्वीकार कर अशुभ को अपने जीवन से पूर्ण तिलांजलि नहीं दे देते, हमारा जीवन पूर्ववत् ही बना रहता है, चाहे हम कितने ही जप-तप कर लें.

Sunday, May 20, 2018

सुख-दुःख के जो पार हो गया


२१ मई २०१८ 
संत कहते हैं, जीवन में शुभ और अशुभ दोनों हैं, रात और दिन की तरह सुख और दुःख की तरह विपरीत सदा साथ-साथ चलते हैं. सच्चा साधक वही है जो दोनों को देखता है, और दोनों से ही प्रभावित नहीं होता. उसे तो वहाँ पहुंचना है जहाँ दो नहीं हैं, अद्वैत ही उसकी मंजिल है. पोखर में जल भी है और कीचड़ भी, कमल दोनों से ऊपर है, अछूता ! यदि सुख की तृष्णा बनी रही तो दुःख की राह सामने ही खड़ी है. यदि अच्छा ही अच्छा चाहा तो बुरा कोई न कोई रूप धरकर डराएगा ही. जीवन जैसा भी दिखाए साक्षी भाव से देखने की कला ही अध्यात्म है. देह जब तक है जरा और मृत्यु का भय बना ही है, प्राण जब तक हैं, भूख-प्यास लगते ही रहेंगे. मन जब तक है, शोक-मोह से छुटकारा नहीं. स्वयं आत्मा में स्थित होकर इन तीनों को देखना है, जहाँ एकरस शांति के अलावा कुछ भी नहीं. देह, प्राण, मन तभी तो हैं जब आत्मा स्वयं है, वही उनका आधार है. जिसने इस रहस्य को समझ लिया वह सदा के लिए मुक्त है.  

Tuesday, July 10, 2012

पल पल जागा रहता साधक


मई २००३ 
साधक का लक्ष्य है पल-पल सचेत रहना, क्योंकि सचेत मन स्वयं को स्पष्ट देखता है, हमें हमारी बड़ी कमियां भी जब छोटी सी भूल मालूम होती हैं तो मन सोया हुआ है. वह पीड़ा जो कठोर वाणी के बाद स्वयं को ही दंश देती है परमेश्वर की कृपा ही है, यह असंतोष की भावना जो साधक को कचोटती है परम सत्य को पाने के लिए तत्पर होने का संदेश ही देती है. साधना का पथ कभी-कभी सांप-सीढी के खेल की तरह प्रतीत होता है, मंजिल तक पहुंचने का आनंद मिलने ही वाला होता है कि हम गहरे गड्ढ में धकेल दिए जाते हैं. किसी संत से सुना कि जब शुभकर्मों का उदय होता है तो ईश्वर का अनुग्रह होता है और उसकी निकटता मिलती है जब अशुभ कर्मों का उदय होता है तो उसकी कृपा होती है अर्थात उसका वियोग होता है. जैसे रात और दिन का क्रम चलता है वैसे ही साधना में जब तक पूर्व जन्मों के बंधन नहीं कटते सुख-दुःख लगे ही रहेंगे. पर नए कर्मों के बंधन न बनें, नयी गांठ न पड़े इसके लिये तो सजग रहना होगा. पूरी तरह शरणागत हो जाएँ तो पुराने कर्मों के बंधन भी धीरे-धीरे कटने लगते हैं.