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Wednesday, August 6, 2014

मन जब बन जाता है दर्पण

जनवरी २००७ 
अध्यात्म का सबसे बड़ा चमत्कार, सबसे बड़ी सिद्धि यही है कि हम अपने बिगड़े हुए मन को सुधार लें. मानव होने का यही तो लक्षण है कि साधना के द्वारा मन को इतना शुद्ध कर लें कि मन से परे जो शुद्ध, बुद्ध आत्मा है वह उसमें प्रतिबिम्बित हो उठे. ज्ञान के द्वारा उसे जानना है, सद्कर्म के द्वारा उसे पाना है, भक्ति के द्वारा उस का आनंद सबमें बाँटना है. सेवा भी होती रहे तो मन शुद्ध बना रहेगा. जब तक अपने लिए कुछ पाने की, कुछ बनने की वासना बनी हुई है तब तक मन निर्मल नहीं हो सकता. व्यवहार जगत में लेन-देन चलता रहे पर भीतर हर पल यह जागृति रहे कि हम आत्मा हैं जो अपने आप में पूर्ण है !

Monday, May 12, 2014

मिल कर भी जो कभी न मिलता


संतजन कहते हैं, शिव तत्व सृष्टि के कण-कण में है, वह हमारे भीतर भी है, उसे जगाना ही वास्तविक पूजा है. जब मन में कामनाओं, वासनाओं तथा महत्वाकांक्षाओं का जाल न फैला हो, मन खाली हो तब वह शिव तत्व जो पहले से ही वहाँ है, प्रकट हो जाता है. हमारी शुद्ध चेतना उसी से बनी है. वह प्रेम है, सौन्दर्य है, कल्याणकारी है, अखंड है, निर्दोष है, शाश्वत है, निर्द्वन्द्व है, ज्ञान स्वरूप है. उस शिव तत्व को एक बार जान लेने के बाद उसका विस्मरण नहीं होता, उसके रहस्य धीरे-धीरे करके खुलते हैं लेकिन कभी पूरे नहीं होते. वह जान कर भी जाना नहीं जाता, वह अनुभव की वस्तु नहीं, शब्दों में नहीं आता, पर एक बार जिसे उसकी झलक भी मिल गयी वह स्वयं को तृप्त अनुभव करता है. पर यह तृप्ति उसकी प्यास को बढ़ाती है, जगत की प्यास को मिटा देती है. 

Saturday, September 14, 2013

मैं से भरा उससे खाली

फरवरी २००५ 
जब तक हम देहात्म बुद्धि से जगत में रहते हैं, मन पर एक बोझ पड़ा ही रहता है, यह बोझ ‘मैं’ का है, ‘मैं’ जो अपने को कल्पनाओं के अनुसार एक पहचान दे देता है. बाहर जो दीखता है वह जगत बंधन का कारण नहीं है, बल्कि हमारी कल्पनाओं द्वारा गढ़ा गया संसार ही बंधन का कारण है. जब मन सारी, उपाधियों, कल्पनाओं, वासनाओं से खाली हो जाता है, तभी देहातीत का अनुभव होता है, तब हम स्वालम्बी हो जाते हैं, अपनी ख़ुशी के लिए संसार के आश्रित नहीं रहते, जगत तो अपनी प्रकृति के अनुसार पल-पल बदल रहा है, पर हम ‘वह’ हैं जो कभी नहीं बदलता.