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Sunday, October 10, 2021

उसको अपना माना जिसने


संत कहते हैं, जिसे अपने पता नहीं है उसे ही अभिमान, ममता, लोभ सताते हैं. मन का यह नाटक तब तक चलता रहता है जब तक हम अपने शुद्ध स्वरूप को नहीं जानते. खुद को जानना ही जीवन जीने की कला है. हम  स्वयं के कण-कण से परिचित हों, मन और तन में होने वाले सूक्ष्म परिवर्तनों के प्रति सजग रहें. कब कौन सा विकार मन में उठ रहा है इसके प्रति तो विशेष सजग रहें. आधि, व्याधि और उपाधि के रोग से हम सभी ग्रसित हैं, जो क्रमशः मन, तन और धन के रोग हैं, इनका इलाज समाधि है. समाधि में मन यदि समाहित रहे तो कोई दुःख नहीं बचता. क्रोधित होते हुए भी भीतर कुछ ऐसा बचा रहता है, जिसे क्रोध छू भी नहीं पाता, भीतर एक ठोस आधार मिल जाता है, चट्टान की तरह दृढ़. तब कोई भयभीत नहीं कर सकता न किसी को हमसे भयभीत होने की आवश्यकता रहती है. वास्तविक जीवन तभी शुरू होता है. अपने भीतर उस परमात्मा की उपस्थिति को महसूस करते ही सारे अज्ञान और अविद्या से पर्दा हट जाता है. तब देह की उपयोगिता इस आत्मा को धारण करने हेतु ही नजर आती है, सुख पाने हेतु नहीं ! मन सात्विक भावों को प्रश्रय देने का स्थल बन जाता है,  विकारों की आश्रय स्थली नहीं. तन के रोग हों या मन की पीड़ा सभी का अंत उसका आश्रय लेने पर हो जाता है. सद्गुरु के बिना यह ज्ञान नहीं मिलता, वे उनके सच्चे स्वरूप के दर्शन कराते हैं, उसके बाद तो वह सांवला सलोना स्वयं ही आकर हाथ थाम लेता है, उसको एक बार अपने मान लें तो फिर वह स्वयं से अलग होने नहीं देता !


Tuesday, July 3, 2018

जीवन चलने का नाम


३ जुलाई २०१८ 
जीवन एक यात्रा है, यह वाक्य हमने न जाने कितनी बार सुना है. संत कहते हैं, हम इस जगत में कहीं और से आये हुए यात्री हैं, दो-चार दिन यहाँ गुजार कर हमें वापस जाना है. इन बातों में एक गहरी सच्चाई है, इसका अनुभव किसी को तब होता है जब वह कोई यात्रा कर रहा होता है. घर से दूर किसी नये शहर में जाकर हम कितनी सजगता से वहाँ के दर्शनीय स्थलों को देखते हैं, आने वाली तकलीफों को भी मुस्कुराते हुए झेल लेते हैं. मित्रों के यहाँ जाने पर कितना प्रेम जताते हैं. मन सदा ही एक ‘मगन भयो’ की भाव मुद्रा में रहता है. हम यहाँ घूमने आये हैं, रहने नहीं, यह भाव जगा रहता है तो न कोई राग सताता है न ही द्वेष, कोई असुविधा भी हो तो यह याद आ जाता है, कौन सा हमें यहाँ सदा रहना है, एक यात्री का मन सदा उत्सुकता से भरा होता है, जंगल घूमने गया हो तो एक चिड़िया या एक हिरन की झलक भी उसे ख़ुशी से भर जाती है. इन सबके पीछे कारण होता है कि मन में मोह व ममता नहीं होती. यह जगत भी ऐसे ही हमारे विहरने का स्थान मात्र है, यह हमारा कोई स्थायी पता नहीं है. मोह-ममता के बिना मन कितना हल्का रहेगा, इसकी कल्पना ही कितनी सुखद जान पडती है.   

Sunday, January 5, 2014

तेरा तुझको अर्पण

जून २००५ 
ईश्वर प्राप्ति के लिए हमारे मन में जब दृढ़ता नहीं रहती, तभी नियम में हम स्थिर नहीं हो पाते. मन में तड़प हो, छटपटाहट हो तभी उसका स्मरण सदा रहेगा. मोह-ममता मिटाने के लिए ईश्वर हमारे जीवन में कई परिस्थितयों का निर्माण करते हैं. हमें अपने मन की समता बनाये रखनी है, हर सुख-दुःख को समर्पित करना है. तीनों तापों से बचने का यही उपाय है. जो अपने भीतर संतुष्ट रहता है, उसकी समस्त कामनाओं का स्वतः ही परिमार्जन हो जाता है अर्थात अनावश्यक जीवन से झर जाता है. वह इस जीवन में फिर सहज हुआ प्रारब्ध के अनुसार अपना समय बिताता है. उसकी दौड़ समाप्त हो जाती है, कुछ करने व पाने की आशा उसे अब नचाती नहीं. वह जीते जी मुक्त हो जाता है. उसका न कोई शत्रु है न कोई मित्र, सारे द्वन्द्वों से पार हुआ वह अपने आप में अर्थात आत्मा में ही तुष्ट रहता है. जगत उसके लिए स्वप्न वत् अथवा क्रीडांगन हो जाता है. वह जीवभाव से मुक्त होकर आत्मभाव में निमग्न रहता है. 

Wednesday, April 10, 2013

कहत कबीर सुनो भई साधो


जुलाई २००४ 
कबीर कहते हैं, गहरी नदिया, नाव पुरानी, खेवटिया से मिले रहना.....कुछ लेना न देना मगन रहना...
संसार की नदी गहरी है..तन की नाव जर्जर हो रही है..भीतर वाले से मिलकर जो नहीं रहेगा वह तो डूबेगा ही. नित्य से मिले रहना है, अनित्य तो वैसे भी छूटने ही वाला है. असत्य टिकने वाला नहीं  है, सत्य का आश्रय लेने में ही हमारी जीत है, तब हमें किसी के अधीन नहीं रहना होगा, हर क्षण एक स्वतंत्रता का भास होगा. हम तब तक सम्पूर्ण रूप से आनन्दित नहीं रह सकते, जब तक हमारे भीतर तृष्णा की छोटी सी भी चिंगारी जलती रहेगी. जब अहंता, ममता नहीं रहती तब भीतर अखंड शांति आ विराजती है. 

Tuesday, April 9, 2013

एक ही सत्ता रूप बदलती


जुलाई २००४ 
हमारे भीतर जो चेतना है, वह परम है, पवित्रतम है, जो हमारे माध्यम से काम कर रही है. यह देह, मन, बुद्धि सब उसी के उपकरण हैं, वह इनके माध्यम से स्वयं को प्रकट कर रही है. जब “मैं हूँ” यह भाव नष्ट हो कर ‘वह है’, ‘तुम हो’ यह भाव प्रमुख होता है तब धीरे-धीरे सब कुछ एक समष्टि में बदल जाता है. सभी कुछ उस एक का ही प्रतिबिम्ब है यह भाव दृढ़ हो जाता है. जब ऐसा हो जाये तब अपना कुछ नहीं रह जाता और अपना सभी कुछ है. तब कुछ भी नहीं करना और सभी कुछ करना है, सारे कृत्य अपने ही लगते हैं और फिर भी कर्ता भाव नहीं रहता, सभी अपने हैं पर ममता भाव नहीं, मैं ही वह हूँ पर अहंता भाव नहीं....और ऐसा तभी होता है जब अनवरत बरसती कृपा के प्रति कोई सचेत होता है. 

Sunday, August 19, 2012

तुलसी ममता राम से


जुलाई २००३ 
तुलसी ममता राम से समता सब संसार ! इस जगत में सम भाव से रहना आ जाये तो राग, द्वेष आदि दुखद विकार मन से नष्ट हो जाते हैं. संसार का चिंतन अंतः करण की मलिनता है और भगवद् चिंतन अंत करण की शुद्धि है, पहले का परिणाम भय, दुःख ही होने वाला है और दूसरे का परिणाम मंगलकारी ही. हमारे भीतर वह परमात्मा मित्र रूप में है, जैसे दो पक्षी एक डाल पर बैठे हों. यह विचार ही हमें आनंद देता है कि वह हमारे निकटस्थ है, एक बार उसे सच्चे दिल से पुकारें तो वह झट अपनी उपस्थिति जताता है, ऐसा रस बरसता है कि हमें उसके अमृत स्वाद का अनुभव होने लगता है. बल्कि वह तो यह भी जानता है कि हम उसे पुकारने वाले हैं, हमारे विचारों को वह हमसे पहले ही जान जाता है. ऐसे रस का पान करने के लिये ही साधना का पथ सदगुरु बताते हैं, ध्यान में हम उसको अपने सम्मुख पाते हैं, उसने हमें गुणात्मक रूप से अपने समान बनाया है. 

Monday, December 12, 2011

गुरुद्वार


अगस्त २००२ 
सदगुरु वास्तव में उसे ही मिलते हैं, जिसका हृदय उनकी कद्र जानता है. वास्तव में वह क्या हैं?, कौन हैं? कोई नहीं जानता. उनकी कृपा का एक अंश ही मिल जाये तो साधक का मार्ग प्रशस्त हो जाता है. लेकिन उसे पाने के लिये अहं को पूरी तरह नष्ट करना होगा. गुरु द्वार पर अकिंचन बन कर ही जाना होगा. उन्हें अहं तोड़ना आता है और जब वह ऐसा करें तो वहाँ से भाग आने के सिवा कुछ और भी करना सीखना होगा. अहं और ममता के दो ताले हैं जिन्हें खोले बिना हम ईश्वर तक नहीं पहुँच सकते. पर जहाँ प्रेम होता है वह तत्क्षण जवाब देते हैं. हृदय के सच्चे प्रेम को वह अस्वीकार नहीं कर पाते और धीरे-धीरे साधक के हृदय से अहंकार व ममता नष्ट होने लगते हैं.   

Friday, November 18, 2011

प्रेम ही पूजा है


july 2002 
हृदय में श्रद्धा और विश्वास की पूंजी हो तो जीवन का पथ सरल हो जाता है, मात्र सरल ही नहीं  सरस भी हो जाता है. सामर्थ्य बढ़ जाता है, समर्थ वही है जो किसी भी देश, काल में अपनी आत्मा पर ही निर्भर रहे, अहंता व ममता छोड़कर श्रेय के पथ पर चले. एक बार ईश्वरीय प्रेम का अनुभव हो जाने के बाद वह कभी हमारा हाथ नहीं छोड़ता. बल्कि पग-पग पर ध्यान रखता है, इतने स्नेह से वह हमारी खोजखबर लेता है जैसे पुराना परिचित हो. इस जग में जितना प्रेम हमें मिलता है या हमारे हृदयों में अन्यों के लिये रहता है वह उसी के प्रेम का का प्रतिबिम्ब है. मनसा, वाचा, कर्मणा वह हमारे सभी कर्मों का साक्षी है. उसे अर्पित करने के लिये इस जग के सभी पदार्थ तुच्छ हैं, एक मात्र प्रेमपूर्ण हृदय ही उसे समर्पित करने योग्य है, उसकी बनायी इस सृष्टि में हर कहीं उसे ही देखने की कला ही पूजा है.