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Tuesday, July 28, 2026

गुरुतत्व जागे जब भीतर

 गुरु पूर्णिमा के अवसर पर 

गुरुतत्व उस बोध को कहते हैं, जो यह बताता है कि शुद्ध, बुद्ध, मुक्त चेतना ही एकमात्र सत्य है। यह जगत दर्पण में दिख रहे नगर की भाँति है;अथवा तो जगत वह स्वप्न है जिसे हम खुली आँखों से देखते हैं। न जाने कितनी देहें हमने ग्रहण कीं और कितनी बार मृत्यु ने इस स्वप्न को तोड़ दिया, किंतु पुनः जैसे नींद में ही हम नयी देह लेकर एक नया स्वप्न देखने लगते हैं। आत्मा एक है, वह भिन्न-भिन्न उपाधियाँ ग्रहण करती है, पर स्वयं सदा पूर्ण बनी रहती है। जैसे सागर में हज़ारों लहरें उठती हैं पर जल तत्व वैसा ही बना रहता है। अज्ञान दशा में जीव सुख-दुख, मान-अपमान आदि में अपना जीवन बिताता है पर जब गुरुतत्व भीतर प्रकट होता है तो वह आनंद के एक महासागर में निमग्न हो जाता है और जीवन मुक्त रहकर जगत में अपने कर्त्तव्य निभाता है। 

Thursday, December 14, 2023

मेरी डोरी तेरे हाथ

जब हमारी बागडोर परमात्मा के हाथों में आ जाती है तो हम निश्चिंत हो जाते हैं। वह हमें अनेक रास्तों से ले जाता हुआ लक्ष्य तक ले जायेगा, ऐसा विश्वास दृढ़ होने लगता है। यदि हमें  किसी के घर जाना है तो उसका पता उससे ही तो पूछेंगे। परमात्मा से मिलना हो तो उसे ही अपने घर का मार्ग बताने देना होगा। बस, पूर्ण भरोसा करना होगा, वह स्वयं ही मार्ग पर ले आएगा। जीवन में ऐसी परिस्थितियों का निर्माण होगा कि सब कुछ एक दिन स्पष्ट हो जाएगा। जब पहाड़ की चोटी पर चढ़ना हो तो मार्ग में उतार-चढ़ाव तो आते ही ही हैं। जो सर्वोच्च है, वहाँ जाने का मार्ग भी सीधा नहीं हो सकता। घुमावदार, उतराई-चढ़ाई वाला मार्ग ही होगा, पर उस पर कोई दृढ़ता से चलता चले तो एक दिन स्वयं को उसके निकट पाएगा। शास्त्र और गुरु के रूप में वह हमारे पास मार्गदर्शक भी भेजता है, जो पल-पल इस पथ पर साधक की सहायता करते हैं। 


Wednesday, September 20, 2023

गुरु बिन ज्ञान कहाँ से पाएँ

गुरु व ज्ञान पर्यायवाची शब्द  हैं, यदि ऐसा कहें अतिशयोक्ति नहीं होगी। गुरु का हर शब्द गहरे चिंतन-मनन के बाद हुए दर्शन से प्रकटता है। वह जीवन की गुत्थियों को पल में हल कर देता है। चीजें उनके आगे अपने गुहतम स्वरूप में प्रकट होती हैं। शास्त्र उनके ही वचनों से बने हैं। वे ईश्वर के प्रतिनिधि हैं। ईश्वर ने हमें सिरजा है, वह इस जगत का आधार है, वह नहीं चाहता कि आनंद स्वरूप बनाने के बाद मानसिक दुख की हल्की सी रेखा भी हमें छू जाये। वह भीतर से हमें प्रेरित करता है और गुरुज्ञान का अधिकारी बनाता है। मानव को जब अपने अंतर में प्रकाश का अनुभव होता है तो उसे जगत ढक न ले, इसकी व्यवस्था गुरु सिखाता है। नियमित साधना, श्रवण तथा मनन का अभ्यास ही समरसता को बनाये रखने में सहायक है। 


Tuesday, July 4, 2023

मर्म गुरु का जाना जिसने

जब किसी के जीवन में गुरु का पदार्पण होने वाला होता है, उसके पूर्व उसके मन में ईश्वर के प्रति प्रेम जागृत होता है। वह ईश्वर से प्रार्थना करता है कि उसे कोई पथ प्रदर्शक भेज दे। वह मार्ग ढूँढ रहा होता है पर उसे मार्ग दर्शक नहीं मिलता। तब अस्तित्त्व या परमेश्वर ही गुरु को भेजते हैं। गुरु, आत्मा और ईश्वर एक ही हैं। जब पुकार आत्मा की गहराई से उठती है, अंतर्यामी परमात्मा उसे सुन लेता है और उससे एक हुए गुरु तक वह पहुँच जाती है। दिल की गहराई से की गई कोई प्रार्थना व्यर्थ नहीं जाती, वह अवश्य फलीभूत होती है। हमारी प्यास यदि सच्ची है तो जल वहीं छलक जाता है।जीवन में जैसे उजाला हो जाता है, गुरु का अर्थ ही है जो अंधकार को दूर करे और प्रकाश फैलाए। कोई एक सदगुरु  करोड़ों लोगों के जीवन में ज्ञान का प्रकाश फैला सकते हैं । वह आत्मा की गहराई में वैसे ही जुड़े हैं जैसे परमात्मा सर्वव्याप्त है। वह भी अंतर्यामी हैं, उनके मन व बुद्धि गंगाजल की तरह पवित्र और कैलास स्थित मानसरोवर के हंस के समान नीर-क्षीर विवेकी हैं। वह शुद्धता की कसौटी पर सच्चे मोती की तरह हैं, वह निसंग, निर्द्वंद, निरंजन हैं। वह निरन्तर समाधि का अनुभव करते हैं। वह उस तत्व से जुड़े हैं जो अविनाशी, अजर, अमर है, वह उस ज्ञान की पराकाष्ठा हैं जो हृदय को आनंद व प्रेम से भर देता है। 


Thursday, April 20, 2023

सच की राह चले जो धीर

श्वास एक भी व्यर्थ न जाये, काम किसी के आये, 

गुरु की वाणी है अनमोल, पग-पग राह दिखाए ! 

समय तब व्यर्थ जाता है जब हम दुनियादारी में फँसकर अपने सच्चे  स्वरूप की स्मृति को भुला देते हैं।सही-ग़लत में भेद करना छोड़ देते हैं। समाज में चल रहे ग़लत रीति-रिवाजों को सही न मानते हुए भी उनमें अपना मूक समर्थन देते रहते हैं। किसी न किसी को खुश करने के लिए ऐसी बातें भी मान लेते हैं, जिनके प्रति हमारा ह्रदय गवाही नहीं देता। हम अन्याय का प्रतिकार नहीं करते, ताकि ऊपरी सुख-शांति बनी रहे, चाहे गहराई में असंतुष्टि बनी रहे। जीवन चाहता है हम प्रामाणिक बनें। सत्यवान हों, चाहे उसके लिए कितने ही विरोधों का सामना क्यों न करना पड़े।


Friday, June 5, 2020

श्रद्धा जिसकी सदा अटल है

आज गुरूजी ने बताया भक्ति मन में जगे इसके लिए शरणागति एक साधन है. यदि कोई भूल हमसे होती है और उसे हम स्वीकार लेते हैं, तो उससे बाहर आ जाते हैं. जो झुकना नहीं जानता वह आनंद के सागर में डुबकी नहीं लगा सकता. असहाय के लिए ही भगवान सहायक बन कर   आते हैं, दीन के लिए ही दीनानाथ है, जो स्वयं को सदा सही मानता है, अपनी भूल स्वीकार करने में जिसका अहंकार आड़े आता है, वह अपने भीतर विश्राम नहीं कर सकता. गुरु के बिना यह ज्ञान नहीं मिलता और ईश्वर की कृपा के बिना गुरु का सान्निध्य नहीं मिलता. गुरु के सान्निध्य का अर्थ है उनके ज्ञान को स्वीकारना, अपनी बुद्धि को किनारे रखकर श्रद्धा भाव से स्वयं के जीवन में परिवर्तन के लिए सदा तैयार रहना. मन को मारकर बैठना ही गुरु की संगति में बैठना है. जो भी हम अपने प्रयत्न से प्राप्त करते हैं वह हमसे छोटा ही होता है, पर जो गुरु अथवा ईश्वर की कृपा से मिलता है वह असीम है. उस असीम को भीतर समाने के लिए हमारा छोटा सा मन पर्याप्त नहीं है. एक लोटे में भला सागर समा सकता है क्या ?  साधक को गुरु के रक्षा कवच में रहना है. अपने हर आग्रह को छोड़ना है. जीवन में कितने ही कठोर अनुभव करवा के परमात्मा हमारी श्रद्धा को हिलाते हैं, पर जो हर संशय को पार करके भी अटल रहती है ऐसी दृढ श्रद्धा ही वास्तविक है. ऐसी श्रद्धा जगते ही हृदय द्रवीभूत हो जाता है, अहंकार पिघल जाता है और हमारे व्यक्त्तिव में एक लोचपन आता है जो किसी भी परिस्थिति में हमें स्थिर बनाये रखता है.  

Thursday, July 7, 2016

भक्ति करे कोई सूरमा

७ जुलाई २०१६  
तेरी बज्म तक तो आऊँ, जो यह आना रास आए
यह सुना है जो भी लौटे, वे उदास आए !


गुरु की दृष्टि, उसकी वाणी, उसका स्पर्श और उसका चिन्तन भी साधक के भीतर जागृति ले आता है. तब एक भिन्न तरह की उदासी उसे घेर लेती है, जो अब इस दुनिया में उसे चैन नहीं लेने देती. वह भी प्रेम के पंख लगाकर अनंत गगन में उड़ान भरना चाहता है. भक्ति मार्ग सहज भी है और कठिन भी. ‘प्यार सभी का काम नहीं, आंसू सबका आम नहीं’ ! सद्गुरु की उदारता ही परमात्मा की कृपा करवाती है, साधक की पात्रता नहीं. 

Sunday, December 8, 2013

शरण में आये हैं हम तुम्हारी

अप्रैल २००५
गुरु हमारी संवेदनाओं और भावनाओं को परिष्कृत करते है. वे हमें प्रकाश, सत्य और अमरता की ओर ले जाना चाहते हैं. मन को देह से ऊपर उठाना सिखाते हैं. मन के पार जाते ही भीतर अपने आप परिवर्तन होने लगता है. हमारे भीतर सत्य को जानने के लिए जो कुछ भी होता है अपने आप ही होता है, वह कृपा के कारण ही है, हम केवल साक्षी मात्र बनते हैं. हमारा कार्य केवल शरण में जाना है, हमारे इर्द-गिर्द न जाने कितने बंधन घेरा डाले खड़े हैं, इन बन्धनों को तोड़ना हम नहीं जानते. अपने मन के हाथों हम बार-बार दुःख पाते हैं. अपनों से लड़ाई करना कितना कठिन है. सद्गुरु हमारे मन को मजबूत करते हैं, उसे सही मार्ग देते हैं, ध्यान, प्राणायाम की विधियाँ बताते हैं. मन तब सजग होता है, नित्य-अनित्य को पहचानने लगता है, भीतर प्रज्ञा जगती है, हम आत्मा को जानने के अधिकारी बनते हैं.

Thursday, August 8, 2013

विस्मय से भर जाये मन यह

दिसम्बर २००४ 
विचित्र है यह जगत, अद्भुत है इसका सौन्दर्य, ऊपर नीला विस्तीर्ण गगन, नीचे यह पावन माँ जैसी धरा, उस पर सूर्य रश्मियों से बिखरे हजारों रंग, अनोखी ध्वनियाँ, और इन सबसे बढ़कर साधक के भीतर होने वाली अनुभूतियाँ...जिसकी झलक जिसे मिलती है वह कृतज्ञता से भर जाता है. सारे कर्मों, सारे ज्ञान का जहाँ अंत हो जाता है वहाँ उस प्रेम का उदय होता है, जहाँ उपास्य स्वयं अनंत है, वह जो चराचर में व्याप्त है, उसे भाव से पाया जा सकता है. सारे कर्म जब उसी के लिए होने लगें, हमारा होना ही जब उसके होने का साक्षी बन जाये, जब वही है यह ज्ञान भीतर जागृत हो जाये. जब यह सम्पूर्ण जगत उसकी लीला प्रतीत होने लगे तो ही यह प्रेम भीतर उपजता है. गुरु की शरण में गये बिना यह चमत्कार नहीं घटता, गुरु के पास भी वही हमें भेजता है और उसके पास गुरु. यह उन दोनों के मध्य कैसी प्रीत है यह तो वही जानें, वे दोनों तो एक हो चुके हैं, हमें दो नजर आते हैं. वे दोनों ही हमसे असीम प्रेम करते हैं. उनके प्रेम को महसूस करना जिन्हें आता है, वे तृप्त हो जाते हैं, आनंद में रहते हैं, बाहर कुछ भी हो, अछूते रहते हैं. उन्हें जगत से फिर क्या चाहिए ? जगत उन्हें आश्चर्य चकित तो कर सकता है पर लुभा नहीं सकता. वे विस्मित होते हैं, भ्रमित नहीं. कोई उनके भीतर से पल-पल सचेत करता रहता है. वे जगत के आश्रय बन जाते हैं, उसका आश्रय लेते नहीं !


Sunday, January 20, 2013

बलिहारी गुरु आपने

फरवरी २००४ 
अंतररूपी गहन तिमिर को हटाने सदगुरु रूप सूर्य जीवन में आता है. इस सूर्य को अंतर के प्रेमाश्रुओं का अर्क चढ़ाना है. भावना का तिलक लगाना है, अपने विचार पुष्पों को उन्हें समर्पित करना है. उनका जीवन जो शुद्ध मणि के समान चमचम चमक रहा है हमें सहज ही उनकी और आकर्षित करता है, उन आँखों की मस्ती हम पर असर डालती है. वह हमें हमारा परिचय कराने आते हैं, मनों पर छाये कल्पनाओं के जाल को तोड़ने आते हैं, वह सत्यस्वरूप हैं, उनमें हम अपने अंतर की कमजोरियों को स्पष्ट रूप से देख पाते हैं, भय, हिंसा और लोभ को जान पाते हैं. यह जानकारी ही भीतर एक परिवर्तन लाती है. सहज रूप से हमरे स्व का विस्तार होने लगता है और भीतर का आनंद प्रकट होने लगता है.

Wednesday, November 21, 2012

ज्योति जल रही उसकी भीतर


अक्टूबर २००३ 
परमात्मा सद्गुरु के रूप में बार-बार धरा पर अवतरित होते हैं. कृपा की फुहार बरसाते हैं. कुम्भ के रूप में हम जिस ब्रह्माण्डीय शक्ति की उपासना करते हैं वह उसी का रूप है. यदि हम उसे अपने जीवन रूपी रथ को हांकने के लिए कहें तो वह तत्क्षण तैयार हो जाते हैं. वह हमारी चेतना की मूर्छा को दूर करते हैं. जीवात्मा रूपी अर्जुन जब परमात्मा रूपी कृष्ण को अपना गुरु बनाता है तो वह उसे प्रेरित करते हैं, ज्ञान प्रदान करते हैं, ध्यान की विधि बताते हैं. अनेकों उपायों से वह अर्जुन की सुप्त चेतना को जागृत करते हैं. अहंकार का आवरण दूर करते हैं. जीवन अमूल्य है, उसी का उपहार है, वही इसका आधार है, हमें उसे ही जानना है जो इस देह और मन के भीतर ज्योति जलाकर बैठा है. जगत तो एक साधन है शरीर को चलाने के लिए, ज्ञान पाने के लिए. कृपा होते ही यह जीवन एक उत्सव बन जाता है. गूंगे की मिठाई की तरह जो भीतर को रस से भर देता है. तब भीतर उजाला ही उजाला भर जाता है, जिसमें सभी कुछ स्पष्ट है, कहीं कोई संशय नहीं रहता.

Thursday, October 25, 2012

यहाँ दम दम पे होती है पूजा...


सितम्बर २००३ 
प्रतिपदा है नवरात्रि का शुभारम्भ, दुर्गापूजा का महोत्सव आरम्भ होता है इसी दिन से. अमावस्या को पितरों को जल अर्पण करने का दिन. हमारी संस्कृति में मृतकों के प्रति सम्मान दिखाने के लिए भी कितना आयोजन है, हम ही हैं जो अपनी शुभ संस्कृति को भूलते जा रहे हैं. हमारे जीवन का जो परम लक्ष्य है, सभी शुभकर्म उस तक पहुँचाने में सहायक सिद्ध होते हैं. किन्तु पूजा भी यदि सामान्य कर्म बन जाये तो उतना लाभ नहीं होगा जितना तब यदि हमारे सारे कर्म ही पूजा बन जाएँ. हम भी कह सकें कि यहाँ दम दम पे होती है पूजा सर उठाने की फुर्सत नहीं है....संतजन यही तो कहते हैं, हमें उनके ज्ञान के उजाले से अपने भीतर उजाला भरना है, उनके वचन अनमोल मोतियों की तरह उनके भीतर के अकूत खजाने से झरते हैं, यदि हम उसका शतांश भी ग्रहण कर सकें तो अपने लक्ष्य को पा सकते हैं. हमारे जीवन को शुभतर तथा शुभतम बनाने के लिए जितने उपाय वह बताते हैं, वह अनंत ज्ञान सहज ही उनके मुख से झरता है, उनकी आँखों से प्रेम झरता है तथा पोर-पोर से कृपा झरती है यदि कोई भाग्यशाली उसे पा ले तो धन्य हो जाये. लेकिन गुरु का सान्निध्य विरलों को ही मिलता है क्योकि वे ही उसकी आकांक्षा करते हैं, भौतिक दूरी अध्यात्म में कोई मायने नहीं रखती यह भाव लोक है, जिसमें वे सदा हमारे साथ हैं, उनका प्रेम हमारे साथ ही है, उसी से हमें अपने भीतर के ढके  छिपे ज्ञान को उभारना है, जोत जलानी है, अंतर के तिमिर को हरना है. माँ दुर्गा हमारे विकार रूपी असुरों का दमन करें, जिससे शरद की शुभ्र चांदनी रूपी ज्ञान की ज्योति जगमगा उठे.

Monday, December 12, 2011

गुरुद्वार


अगस्त २००२ 
सदगुरु वास्तव में उसे ही मिलते हैं, जिसका हृदय उनकी कद्र जानता है. वास्तव में वह क्या हैं?, कौन हैं? कोई नहीं जानता. उनकी कृपा का एक अंश ही मिल जाये तो साधक का मार्ग प्रशस्त हो जाता है. लेकिन उसे पाने के लिये अहं को पूरी तरह नष्ट करना होगा. गुरु द्वार पर अकिंचन बन कर ही जाना होगा. उन्हें अहं तोड़ना आता है और जब वह ऐसा करें तो वहाँ से भाग आने के सिवा कुछ और भी करना सीखना होगा. अहं और ममता के दो ताले हैं जिन्हें खोले बिना हम ईश्वर तक नहीं पहुँच सकते. पर जहाँ प्रेम होता है वह तत्क्षण जवाब देते हैं. हृदय के सच्चे प्रेम को वह अस्वीकार नहीं कर पाते और धीरे-धीरे साधक के हृदय से अहंकार व ममता नष्ट होने लगते हैं.