Thursday, August 8, 2013

विस्मय से भर जाये मन यह

दिसम्बर २००४ 
विचित्र है यह जगत, अद्भुत है इसका सौन्दर्य, ऊपर नीला विस्तीर्ण गगन, नीचे यह पावन माँ जैसी धरा, उस पर सूर्य रश्मियों से बिखरे हजारों रंग, अनोखी ध्वनियाँ, और इन सबसे बढ़कर साधक के भीतर होने वाली अनुभूतियाँ...जिसकी झलक जिसे मिलती है वह कृतज्ञता से भर जाता है. सारे कर्मों, सारे ज्ञान का जहाँ अंत हो जाता है वहाँ उस प्रेम का उदय होता है, जहाँ उपास्य स्वयं अनंत है, वह जो चराचर में व्याप्त है, उसे भाव से पाया जा सकता है. सारे कर्म जब उसी के लिए होने लगें, हमारा होना ही जब उसके होने का साक्षी बन जाये, जब वही है यह ज्ञान भीतर जागृत हो जाये. जब यह सम्पूर्ण जगत उसकी लीला प्रतीत होने लगे तो ही यह प्रेम भीतर उपजता है. गुरु की शरण में गये बिना यह चमत्कार नहीं घटता, गुरु के पास भी वही हमें भेजता है और उसके पास गुरु. यह उन दोनों के मध्य कैसी प्रीत है यह तो वही जानें, वे दोनों तो एक हो चुके हैं, हमें दो नजर आते हैं. वे दोनों ही हमसे असीम प्रेम करते हैं. उनके प्रेम को महसूस करना जिन्हें आता है, वे तृप्त हो जाते हैं, आनंद में रहते हैं, बाहर कुछ भी हो, अछूते रहते हैं. उन्हें जगत से फिर क्या चाहिए ? जगत उन्हें आश्चर्य चकित तो कर सकता है पर लुभा नहीं सकता. वे विस्मित होते हैं, भ्रमित नहीं. कोई उनके भीतर से पल-पल सचेत करता रहता है. वे जगत के आश्रय बन जाते हैं, उसका आश्रय लेते नहीं !


7 comments:

  1. बहुत सुंदर ....ज्योतिर्मय ...आलोकित आलेख .....!!

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  2. जिन्हें प्रेम को महसूस करना आता है, वे तृप्त हो जाते हैं,

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  3. अनुपमा जी, देवेन्द्र जी व धीरेन्द्र जी आप सभी का स्वागत व आभार !

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