Tuesday, August 27, 2013

ज्ञान वही जो आये अनुभव में

जनवरी २००५ 
देह में प्रतिक्षण संवेदनाएं हो रही हैं, जैसे अहंकार जगते ही मन स्थिर नहीं रहता, अहंकार को चोट लगने पर तो और भी अस्थिर हो जाता है, तो देह में भी इसका भास होता है. मन में कोई भी उत्तेजना जगे तो तन संवेदनाएं जगाने लगता है. मन सुखद संवेदनाओं को तो चाहता है, जो आकर कुछ देर बाद अपने आप चली जाती हैं, पर दुखद को नहीं, उनका विरोध करता है, विरोध करते ही और दुखद संवेदनाएं आ जाती हैं. एक श्रंखला ही बनने लगती है, यदि हम इन्हें सजग होकर देखें तो धीरे-धीरे खत्म होने लगती हैं. वास्तव में प्रतिक्रिया जगाने वला मन ही सुख-दुख का भागी होता है. यदि भीतर केवल साक्षी रहे तो बड़ी से बड़ी बात भी कोई दुःख नहीं दे सकती. यह अनुभव की बात है. धीरे धीरे हमें इसे अनुभव में उतारना होगा और फिर यह स्वभाव का अंग बन जायेगा. 

5 comments:

  1. बहुत सुन्दर है।

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा कल - बुधवार- 28/08/2013 को
    हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः7 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया आप भी पधारें, सादर .... Darshan jangra

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  3. सत्य कहा है ... धीरे धीरे प्रयास से ये संभव हो जाता है ...

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  4. इमरान, वीरू भाई, दर्शन जी, व दिगम्बर जी आप सभी का स्वागत व आभार !

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