Thursday, August 1, 2013

नजर बदली तो नजारे बदले

दिसम्बर २००४ 
वस्तुओं को देखने का हमारा नजरिया यदि संकुचित होगा तो हमें दोष ही दोष दिखाई देंगे, हमें अपने दृष्टिकोण को व्यापक बनाना होगा, लोगों की मानसिकता को समझना होगा, यदि समाज में विषमता है, भ्रष्टाचार है तो उसके लिए हम भी जिम्मेदार हैं. हमें स्वयं को सुधारने का प्रयत्न करना है. यदि एक अंगुली हम समाज की ओर उठाते हैं तो चार अपनी ओर भी उठती हैं. समाज में रहकर हम उसके गुण-दोषों से बच नहीं सकते साथ ही हमें इस बात का भी निरंतर ध्यान रखना होगा कि सृष्टिकर्ता की नजर से कुछ बचा नहीं है, प्रकृति के कानून से कोई बच नहीं सकता. कुछ वस्तुएं हमें कितनी भी भयावह दिखाई देती हों पर उनकी भी उपयोगिता है, इसका अर्थ यह नहीं कि हम हाथ पर हाथ धर कर बैठ जाएँ, बल्कि यह कि हम बिना प्रभावित हुए अपनी क्षमता के अनुसार कार्य हाथ में लें. हम यदि अपने इर्द-गिर्द परिवर्तन लाना चाहते हैं तो हमें अपने भीतर परिवर्तन लाना होगा, हम सभी को स्वीकार कर चलें तो मन से विरोध का भाव चला जाता है. ईश्वर की जो अनुभूति हमें अपने भीतर होती है, वह कण-कण में होने लगेगी. हर मन की गहराई में वही परमात्मा है. हमें हर एक के भीतर छिपी उस शक्ति तक पहुंचना है. आत्मा में स्थित रहकर हम जगत को एक खेल की भांति ही देखते हैं, यहाँ सब कुछ प्रतिपल बदल रहा है. यहाँ कुछ लोग जगे हैं, कुछ सोये हैं, कुछ बेहोश हैं. जगे हुए लोगों का साथ हमें भी सजग रखता है. सद्गुरु के अनुसार मन हम नहीं हैं, मन कल्पनाओं का एक समूह है जो हमें भ्रमित करता है, हमारा उद्गम अनंत है और अनंत ही हमारा स्वरूप है. यदि हमारे भीतर कोई वासना शेष न रहे तो हम उस ब्रह्म के निकट आ जाते हैं, वही हमारा लक्ष्य है.


7 comments:

  1. इस तरह का कुछ पढना नज़र और नज़ारे बदल सकारात्मक उर्जा प्रदान करता है!
    आपकी डायरी के पन्ने शीतलता और ज्ञान का सागर हैं!

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    1. आभार अनुपमा जी !

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  2. हमें अपने दृष्टिकोण को व्यापक बनाना होगा,

    सत्य कथन

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  3. हाँ व्यष्टि से ही समष्टि है व्यक्ति ही समाज की प्रथम और आखिरी इकाई है व्यक्ति सुधरे तो समाज सुधरे। सबको अपनाओ आत्मा समझ निरभिमानी बन। ॐ शान्ति।

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  4. सहमत व्यापक द्रष्टिकोण जरूरी है ...

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  5. सदा जी, रमाकांत जी, वीरू भाई व दिगम्बर जी आप सभी का स्वागत व आभार !

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