प्रेम वहां नहीं होता जहाँ कोई उसका प्रतिदान चाहता है, वहाँ तो व्यापार होता है और जब किसी का मन अपनी ख़ुशी के लिए किसी अन्य पर निर्भर करता है तो वह आजाद नहीं है, वह प्रेम नहीं कर सकता. यह खुबसूरत दुनिया और इसमें बसने वाली हर शै से हमें प्यार तो करना है पर उन पर निर्भर नहीं होना है. आत्मनिर्भरता ही निडरता को जन्म देती है, जब हम किसी पर निर्भर नहीं रहेंगे तो भयभीत होने की भी जरूरत नहीं, एक नाजुक, बेसहारा, कमजोर और आश्रित होकर जीने से कहीं बेहतर है मजबूत आत्मशक्ति के साथ जीना, क्योंकि वह शक्ति कहीं बाहर से मिलने वाली नहीं है, हमारे अंदर ही मौजूद है. जगत में सच का सामना करते हुए निर्भयता पूर्वक अपनी बात कह देने का आत्मविश्वास लिए जीना ही सही मायनों में आजाद होकर जीना कहा जायेगा.
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Tuesday, July 13, 2021
Thursday, May 11, 2017
जग जाये जब शक्ति भीतर
१२ मई २०१७
शास्त्रों में कहा गया है, मानव जन्म अत्यंत दुर्लभ है. यहाँ जिस मानव जन्म की बात कही गयी है वह केवल मनुष्य का शरीर धारण करने मात्र से नहीं मिल जाता.यदि कोई अपने समय और सामर्थ्य का उपयोग केवल देह को बनाये रखने के लिए ही करता है अथवा केवल इन्द्रियों के सुखों की प्राप्ति के लिए ही करता है तो उसका मानव योनि में जन्म लेना सार्थक नहीं कहा जा सकता. मानव के भीतर देवत्व को पाने की जो चाह छिपी है उसे जागृत करके उस मार्ग पर चलना ही सही अर्थों में उसे मानव बनाता है. एक बीज के रूप में सभी के भीतर जो आत्मशक्ति छिपी है, साधना और भक्ति के द्वारा उसे प्रकट कर सकना ही मानव जन्म को दुर्लभ बनाता है. मनुष्य होकर जो भय, क्रोध अथवा शोक पर विजय प्राप्त नहीं कर सका उसने अभी देवत्व की ओर यात्रा आरम्भ नहीं की अर्थात वह मानव होने के वास्तविक अर्थ से वंचित ही रह गया.
Tuesday, July 23, 2013
बन जायें मुरली कान्हा की
नवम्बर २००४
अध्यात्म के क्षेत्र में हम निरपेक्ष हैं, किन्तु समाज में
रहते हुए हमें कितनों की सहायता अपने जीवन में लेनी पडती है. वहीं हमारी साधना की
परीक्षा होती है.. जिसने ईश्वर का मार्ग अपनाया है, उसे अपनी ऊर्जा समाज के लिए
निस्वार्थ भाव से लगानी होगी, अन्यथा वह उसका करेगा भी क्या. हमारे सन्त जो स्वयं
पूर्णकाम हैं लोगों के जीवन में प्रकाश फ़ैलाने का कार्य करते हैं. साधक से यदि कोई
ऐसा काम न हो जिससे किसी को चोट पहुंचे तो उसके कर्म भी शुद्ध होते जायेंगे. ईश्वर
उसके माध्यम से स्वयं को प्रकट करेंगे. एक ही चेतना भिन्न-भिन्न रूपों में प्रकट
हो रही है, हमारे भीतर भी वह विद्यमान है, प्रकट होने की राह देख रही है. हमें उसे
मार्ग देना है, मिथ्या अभिमान तथा अज्ञान की पर्त को हटाकर उसे जगाना है. आत्मशक्ति
का जागरण ही आध्यात्मिकता है.
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