३० मई २०१७
जीवन की संपदा अपने आप में इतनी अनमोल है कि उस पर सब कुछ लुटाया जा सकता है, किन्तु मानव न जाने किस सुख की तलाश में जीवन को ही लुटा देने पर तुला रहता है. हम वस्तुओं को इकठ्ठा करते हैं, फिर वे एक बोझ बनकर अपनी सुरक्षा के लिए हमारे सामने उपस्थित हो जाती हैं. संबंध बनाते हैं पर दोनों तरफ की अपेक्षाएं उसे एक संघर्ष बना देती हैं. हम चाहते हैं सारी परिस्थितियाँ हमारे अनुकूल बनी रहें पर जीवन का स्वभाव ऐसा नहीं है, यहाँ पल-पल संयोग बनते-बिगड़ते रहते हैं. इस आपाधापी में हम असली बात को भुला ही देते हैं, परमात्मा का साथ जो हमें सहज ही मिल सकता है, आत्मा का स्पर्श जो सदा ही हमारे साथ रहती है, हमारा मन जो स्वयं में डूबना चाहता है, कभी प्रकृति के सौन्दर्य में, कभी संगीत में, कभी बस चुपचाप प्रियजनों के साथ चांदनी रात में बैठकर, लेकिन आज के मानव के पास अपने निकट आने के लिए समय ही नहीं है. जीवन तब एक दुविधा बन जाता है.