Wednesday, July 15, 2026

मुक्ति की यदि चाह है भीतर

सत्य के साधक को हर तरह से आत्मनिर्भर होना है। अपने जीवन में आने वाले हर सुख-दुख का उत्तरदायित्व स्वयं पर लेना है। इस जगत में कोई किसी को आराम तो पहुँचा सकता है, पर सुखी तो भगवान भी नहीं कर सकता। इसलिए अपने सुख के लिए किसी पर निर्भर होना या किसी अन्य को अपने दुख के लिए ज़िम्मेदार मानना ऐसा ही है, जैसे पानी को तलवार से काटना। किसी के पास सारे ऐशो-आराम हों किन्तु यदि उसे अपने सुख के लिए किसी का मुँह देखना पड़ता है तो वह उसका ग़ुलाम है। सबसे बड़ी आज़ादी है, अपने सुख के लिए स्वयं पर निर्भर होना। दुनिया की किसी भी वस्तु का मोहताज न होना पड़े, किसी भी व्यक्ति और किसी भी परिस्थिति को अपने दुख के लिए ज़िम्मेदार मानने की भूल न करे तभी  इस पथ में वह आगे बढ़ सकता है। इस जगत में आज तक न कोई किसी को उसकी मर्ज़ी के बिना सुखी या दुखी कर सका है, न ही कर पाएगा। इसीलिए कृष्ण ने भगवद् गीता में जगत से मिलने वाले सुख-दुख, हानि-लाभ व जय-पराजय में व्यक्ति को समता में टिके रहने को कहा है। जो समता में स्थित होना सीख जाता है, वह मुक्ति की ओर कदम बढ़ा ही चुका है। 

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