Monday, July 13, 2026

करत-करत अभ्यास ते जड़मति होत सुजान

 जब सत्य की अभीप्सा भीतर जगती है, जीवन को एक दिशा मिल जाती है। इसके पूर्व मानव का लक्ष्य भौतिक जीवन को सुंदर, सुविधापूर्ण और सुखी बनाने तक ही सीमित रहता है। किंतु भौतिक जीवन को कितना भी बेहतर बनाओ, इधर-उधर कोई न कोई कमी सालती ही रहती है। कभी आपसी मेलज़ोल ठीक बना नहीं रह पाता। संबंधों में अहंकार आड़े  आ जाता है तो कभी रूप, धन या यश की कमी खलती है। कहते हैं न कि, किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता,  कभी जमीं तो कभी आसमां नहीं मिलता! इसके विपरीत जब जीवन में एक उच्च लक्ष्य मिल जाता है, तब छोटी-मोटी बातें प्रभावित ही नहीं करतीं। संतों की वाणी जैसे एक नयी दुनिया के दरवाज़े खोल देती है। दृष्टि बाहर से मुड़कर भीतर की तरफ़ जाती है। पहले-पहल तो भीतर कुछ भी नज़र नहीं आता। बल्कि अनगढ़ और अस्त-व्यस्त विचारों की एक दुनिया ही सामना करती है। किंतु सतत अभ्यास से एक दिन मन स्थिर होने लगता है और स्वयं के प्रति कुछ भरोसा जगता है। योग के प्रति रुचि भी जागती है और अपनी दिनचर्या में उसे समुचित स्थान मिल जाता है। 

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