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Wednesday, August 19, 2020

जब आवे सन्तोष धन

 जीवन एक रहस्य है. अरबों-खरबों नक्षत्र और सृष्टि का अनंत विस्तरित रूप इसे रहस्यमय बनाता है. प्रकृति का स्रोत क्या है, कैसे एक नन्हा सा बीज विशाल बरगद का वृक्ष बन जाता है, कैसे ऋतु आने पर अपने आप ही धरती में दबे हुए हजारों बीज अंकुरित हो जाते हैं. बुद्धि से इसे समझना बहुत कठिन है. मन में हजारों संकल्प उठते हैं, इनका क्या स्रोत है. विचार उठकर कहाँ खो जाते हैं. इस क्षण इस पृथ्वी पर अरबों मनों में विचार उठ रहे होंगे, इस अनन्त ऊर्जा का स्रोत भी एक रहस्य है. मन में इच्छा जगती है और हम उसके अनुसार कर्म करते हैं, यदि यह इच्छा स्वयं को जानने की इच्छा बन जाये तो सम्भवतः अपने स्रोत का अनुभव मन कर सकता है. ध्यान में यही होता है. यदि कोई जीवन भर जगत की ही इच्छा करता रहे तो उसे जगत ही मिलेगा, यदि परमात्मा की इच्छा जगे तो जीवन में उस रहस्यमय का पदार्पण होगा. सन्तुष्टि का इसलिए इतना महत्व है, जब मन बाहर से सन्तुष्ट हो जाये तभी तो वह भीतर की और मुड़ेगा. 


Tuesday, January 21, 2020

करुणा का जब जन्म हो भीतर



जीवन को गहराई से देखें तो एक सन्नाटा ही हाथ लगता है. किसी भी बात का जवाब नहीं मिलता, जैसे कोई पूछे भाषा का जन्म कैसे हुआ, स्वर व अक्षर किसने बनाये, कोई नहीं बता सकता. अनादि काल से यह चली आ रही है, चीजें हैं और हमें उनके स्रोत का कोई ज्ञान नहीं है. सन्त और शास्त्र कहते हैं, पहले स्वयं को जानो फिर जगत का रहस्य अपने-आप खुल जायेगा. स्वयं का होना और उसे जानना एक ही बात है, क्योंकि स्वयं ही तो स्वयं को जान रहा है, वहां कोई दूरी नहीं है. हमारा खुद का होना जब सत्य प्रतीत होता है, फिर उसी मौन से सामना होता है, किंतु यह मौन एक अनुपम शांति का अहसास कराता है. बुद्ध कहते हैं, इसी शांति से करुणा का जन्म होगा. मानव होने की पराकाष्ठा है करुणा. यह तभी जन्मती है जब भीतर कोई भय नहीं बचता, न ही घृणा या द्वेष. किसी भी बुद्ध के लिए जगत में कोई भी दूसरा नहीं है, उनका ही एक फैलाव है. उनके प्रेम की धारा सहज ही जगत की ओर बहती है. घ्यान की गहराई में ही स्वयं का बोध होता है, इसीलिए ध्यान का इतना महत्व है.

Wednesday, July 31, 2019

मन तू ज्योति स्वरूप



मानव मस्तिष्क में अद्भुत क्षमता है. आज वैज्ञानिक अंतरिक्ष के रहस्यों को जानने के लिए तत्पर हैं, संचार के साधनों में अत्यधिक वृद्धि हो चुकी है. भारत का पुरातन इतिहास उठाकर देखें तो ऐसे कई आश्चर्यजनक विवरण मिलते हैं उस काल में ऋषियों ने बिना अंतरिक्ष में गये धरती के गोल होने तथा सूर्य की परिक्रमा करने की बात ज्ञात कर ली थी. सौर मंडल के कितने ही रहस्य उन्हें पता थे. धरती तथा अन्य ग्रहों की सूर्य से दूरी का जो अनुमान उन्होंने लगाया था वह आधुनिक विज्ञान से मेल खाता है. इसी प्रकार जड़ी-बूटियों का ज्ञान उन्हें प्रयोगशाला में जाकर नहीं मन की शक्ति से ही हो जाता था. जब संसार का रचियता स्वयं मानव के इस मन में बैठा है तो भला यह सम्भव भी क्यों न होता. आज छोटी-छोटी बातों के कारण जो युवा आत्महत्या की बात सोचने लगते हैं, उन्हें अपने मन की इस अद्भुत क्षमता का कोई ज्ञान ही नहीं है. भारत में जन्म लेकर अध्यात्म का ज्ञान न होना आज के युवाओं के जीवन में सबसे बड़ी कमी है.

Friday, September 1, 2017

भाव युक्त हो अंतर अपना

१ सितम्बर २०१७ 
जीवन में होने वाले अनुभवों में अधिकतर भीतर का भाव ही लौट-लौट कर आता है. जब किसी हृदय में परम के प्रति प्रेम का जागरण होता है तो वह प्रेम अपनी सुवास स्वयं ही बहा देता है,  इसके लिए शब्द जुटाने नहीं पड़ते. पका फल जैसे अपनी मिठास से भर कर खुदबखुद टपक जाता है,  भाव भरा अंतर भी इसी तरह व्यक्त हो जाता है. जिसने उसे अनुभव किया है उसने ही गीत गाए हैं. वह खुद भी नहीं जानता कितना बड़ा रहस्य अपने भीतर छुपाये है. जीवन स्वयं में एक रहस्य है, इसका रचियता भी और उसके प्रति समर्पित अंतर भी. जीवन धारा अविरल गति से बही जा रही है, किन्तु इसका आधार भी तो है. समयचक्र घूम रहा है, इसका केंद्र भी तो है. जगत गतिशील है, किन्तु गति का अनुभव कराने वाला अचल तत्व भी तो है. जिसने उसे अपने मन का मीत बना लिया वही दिव्य प्रेम को अनुभव सकता है.  

Tuesday, August 22, 2017

जब जीवन से परिचय होगा

२२ अगस्त २०१७ 
जीवन की कितनी ही परिभाषाएं कितने ही व्यक्तियों ने गढ़ी हैं लेकिन जीवन इनसे कहीं अधिक विराट है, वह कभी भी पूरा-पूरा इनमें नहीं समाता. हमारे ऋषियों ने जिस जीवन को जानने व पाने की प्रार्थना की है, वह अनंत है, असीम है और आनंद से भरा हुआ है. उस विशालता को महसूस करने के लिए उतना ही बड़ा दिल भी चाहिए, एक नया दृष्टिकोण भी चाहिए और साथ ही एक गहन आत्मीयता की भावना भी. यदि कोई एक प्रेमी की दृष्टि से इस सृष्टि को निहारता है तो वह धीरे से अपना घूँघट सरका देती है, रहस्य की एक परत खुलती है. यह सही है कि हजार परतें अब भी शेष हैं किन्तु जीवन के साथ एक नया संबंध बनने लगता है, जिसमें कोई भय नहीं है, कोई कामना भी नहीं है, यह केवल साथ होने का संबंध है. इसमें हर क्षण एक नयेपन की अनुभूति होती है क्योंकि सृष्टि पल-पल बदल रही है.

Friday, February 24, 2017

विस्मयकारी है जीवन यह

२५ फरवरी २०१७ 
प्रकृति से हम जितना जुड़े होते हैं, विस्मय हमें निरंतर आह्लादित किये रहता है. प्रकृति से कटकर कंक्रीट की दुनिया में रहने वाले नन्हे बीज से अंकुरित  होते गेहूँ के पौधे को बालियों से भरते भी नहीं देख पाते और उनके लिए अन्न के लिए  सम्मान की भावना भी नहीं उपजती. सृष्टि एक रहस्य से भरी है, पर विज्ञान पढने वाले के लिए जैसे हर रहस्य का उत्तर मानो पुस्तकों में बंद है. नीले आकाश को यदि एक बार भर नजर कोई देखे तो मन खो जाता है, बुद्धि शांत हो जाती है. अनंत है जिसका विस्तार उसके बारे में कोई कहे भी तो क्या..संतों के पास जाकर भी मन ठहर जाता है, वे भी एक रहस्य ही जान पड़ते हैं. ध्यान उसी विस्मय में डूबने का ही तो नाम है. 

Friday, April 10, 2015

वह कौन चित्रकार है..

दिसम्बर २००८ 
अनादि काल से मानव इस सृष्टि के रहस्यों को जानने का प्रयत्न करता आया है, लेकिन कोई भी आज तक इसे जानने का दावा नहीं कर पाया है. यह रहस्य उतना गहरा होता जाता है जितना हम इसके निकट जाते हैं. हम कुछ भी नहीं जानते यह भाव दृढ़ होता जाता है. यह सृष्टि क्यों बनी, कैसे बनी आज तक कोई इनके उत्तर नहीं दे पाया. परमात्मा को जिसने भी पाया है अपने भीतर ही पाया है, वह मन की गहराई में छिपा है. जब शरीर स्थिर हो, मन अडोल हो, शांत हो, भीतर कोई द्वंद्व न हो तो जिस शांति व आनंद का अनुभव भीतर होता है वह परमात्मा से ही आयी है. 

Monday, March 3, 2014

छुपा है योग वियोग में

अगस्त २००५ 
परमात्मा अनादि है, अजन्मा है फिर भी वह जन्म लेता है, हम मानवों को ईश्वर का ज्ञान देने के लिए, जो अपने ही हाथों कभी सुखी कभी दुखी होते रहते हैं और एक दिन यह जगत छोड़कर चले जाते हैं फिर किसी नये रूप में आकर वही कहानी दोहराते हैं. कृष्ण अर्जुन के बहाने हम सभी को अपनी शरण में जाने का उपदेश देते हैं, जहाँ प्रेम है, शांति और आनन्द है, विश्वास है, सत्य है. जहाँ मन समाहित हो जाता है तब तन भी स्वस्थ होगा, हम अधिक कार्य कर सकेंगे, प्रभु के बनाये इस सुंदर संसार में उसके निमित्त बन सकेंगे. यह जीवन एक रहस्य है, हमें उसे जीना है, कृष्ण हमें अपनी ओर खींचते हैं ताकि हम इस खेल में शामिल हों. अपने भीतर ही हमें उसकी झलक मिलती है, ताकि हमें भरोसा हो जाये कि वह हैं. फिर हम उन्हें और शिद्दत से खोजते हैं पर वह छिपे ही रहते हैं. हमारे अश्रु भी उन्हें पिघला नहीं पाते, लेकिन इस विरह की अग्नि में हमारे भीतर का पाप-ताप जल जाता है. मन समता में रहने लगता है, हम उसे न पाकर भी उस से एक पल के लिए भी दूर नहीं होते.

Tuesday, October 16, 2012

एक राज है जीवन सारा


सितम्बर २००३ 
मुक्ति को पाना कितना सहज है. मन खाली हो तो मुक्त है. कोई चाह नहीं, कोई संकल्प-विकल्प नहीं उठते तो मन रहता ही नहीं. मन जो व्यर्थ ही हम पर शासन करता है. हम गुलाम बन के रह जाते हैं, और झूठा जीवन जीते हैं जबकि सच्चाई हर वक्त हमारे साथ होती है. वह परम सत्य, परमेश्वर हमारी आत्मा का नित्य संगी है. पर मन हमारे व उसके बीच एक पर्दा डाले रहता है. हम व्यर्थ ही स्वयं को खपाते, रुलाते और सताते, तपाते हैं. हम जीवन के मर्म को जाने बिना ही जीवन जीते हैं. तत्व को जाने बिना मुक्ति नहीं, विकारों से मुक्ति, कुविचारों से मुक्ति, सुविचारों से भी अन्ततः मुक्ति, कोई द्वंद्व नहीं, केवल सहज भाव से अपने होने का अनुभव, कितना विचित्र है यह अनुभव, कितना प्रेम भरा, नित्यता की खोज हमें प्रेम तक पहुंचाती है. हमारी साधना का लक्ष्य प्रेम ही तो है, ईश्वरीय प्रेम, जो हमें उसकी हर वस्तु से प्रेम करना सिखाता है. पुलक फिर रग-रग में भर जाती है और जीवन का रहस्य हथेली पर रखे आंवले सा समझ में आने लगता है.

Friday, October 12, 2012

वह छुप न सकेगा परमात्मा


सितम्बर २००३ 
अनंत-अनंत ब्रह्मांडो का रचियता वह परब्रह्म रसमय है. जिसकी सत्ता से सृष्टि अनंत काल से चली आ रही है, न जाने कितनी बार कितने रूपों में हम इसके अनोखे खेल देखते आये हैं, हम प्रथम बार कब इस धरा पर आये थे, कौन जानता है ? शायद जब से यह सृष्टि है तभी से हम भी यहाँ हैं, और शरीर के न रहने पर भी हमारी सत्ता ऊर्जा के रूप में तो यहाँ रहेगी ही, तो जैसे वह परम सत्य अनादि है, अनंत है, वैसे ही उसने हमें भी बनाया है. उसका हमारा सम्बन्ध बहुत पुराना है, वह जानता है पर हम भूले रहते हैं. माया का आवरण डालकर वह जादूगर हमें भुलावे में डाल देता है. पर कभी-कभी किसी जन्म में संत कृपा से माया का पर्दा हटता है, और हमें अपने वास्तविक स्वरूप की झलक मिलती है, तब लगता है जिन वस्तुओं को हम इतना महत्व दे रहे हैं, वे तो बिना नींव की हैं, उनका कोई आधार ही नहीं है, वे हर पल बदल रही हैं. हमारा शरीर भी निरंतर अनित्य की ओर जा रहा है, ऐसा हो सकता है कि किसी एक दिन यह जगत हमारी आँखों से लुप्त हो जाये, हम पुनः एक नए शरीर में डाल दिए जाएँ, उससे पूर्व ही इन रहस्यों को जीना होगा. संत बताते हैं कि जैसे बादल, चाँद, तारे आदि आकाश में स्थित है पर आकाश उनसे अलिप्त है, वैसे भी वह परमात्मा हमारे भीतर है और मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार से परे है.