संतजन कहते हैं, परमात्मा का मिलना कठिन नहीं है, जो वस्तु हमारे निकट है उसको देखने के लिए कहीं जाना नहीं है, बल्कि उसके प्रति सजग होने की आवश्यकता है. हम अनुष्ठान, जप, तप आदि के द्वारा उसे पाना चाहते हैं, जो हमें मिला ही हुआ है।इनके द्वारा सद्गुरु हमें अहंकार तजने की कला सिखाते हैं, शरणागत होना सिखाते हैं और भीतर ही वह प्रकट हो जाता है जो सदा से ही वहाँ था. वह आत्मा के प्रदेश में हमारा प्रवेश करा देते हैं. आत्मा के रूप में परमात्मा सदा मन को सम्भाले रहता है, उसे रोकता है, टोकता है और परमात्मा के आनंद को पाने योग्य बनाता है, उसको पाने के बाद कुछ पाना शेष नहीं रहता. वह सुह्रद है, हितैषी है, वह नितांत गोपनीय है उसे गूंगे का गुड़ इसीलिए कहा गया है. वह आनंद जो साधक को मिलता है सभी को मिले ऐसे प्रेरणा भी तब भीतर वही जगाता है.भक्ति का आरम्भ वहाँ है जहाँ हमें ईश्वर में जगत दिखता है और चरम वह है जहाँ जगत में ईश्वर दिखता है. पहले पहल ईश्वर के दर्शन हमें अपने भीतर होते हैं, फिर सबके भीतर उसी के दर्शन होते हैं. ईश्वर कण-कण में है पर प्रेम से उसका प्राकट्य होता है. सद्गुरु हमें वह दृष्टि प्रदान करते हैं जिससे हम परम सत्ता में विश्वास करने लगते हैं. ईश्वर का हम पर कितना उपकार है यह तो कोई सद्गुरु ही जानता है और बखान करता है. शब्दों की फिर भी कमी पड़ जाये ऐसा वह परमात्मा आनंद का सागर है.
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Wednesday, February 8, 2023
Friday, September 21, 2018
तू प्यार का सागर है
२२ सितम्बर २०१८
कृष्ण अर्जुन से कहते
हैं, तुम मेरे प्रिय हो, तुम निष्पाप हो, इसलिए मैं तुमसे यह ज्ञान कहूँगा. हर
साधक अर्जुन है और परमात्मा की नजरों में प्रिय भी. कैसी अद्भुत है उसकी शक्ति, वह
एक होकर हजारों आत्माओं को अपना निस्वार्थ प्रेम दे सकता है. हम अपने निकटस्थ
दो-चार को भी सहज प्रेम देने में कृपणता का अनुभव करते हैं. परमात्मा की दृष्टि
में हम सभी आत्माएं हैं, जिन्हें वह अपने समान ही देखना चाहता है, शुद्ध और मुक्त...वह
उन सभी को जो उससे प्रेम करते हैं और मार्गदर्शन चाहते हैं, सदा सन्मार्ग दिखाता
है. अंतर्प्रेरणा के रूप में वह साधक को सचेत करता है. प्रेम करना उसका स्वभाव है,
बल्कि वह प्रेम स्वरूप ही है, उसकी ओर एक कदम रखते ही शांति की लहरों का मधुर कलकल
सुनाई देने लगता है. इस जगत में कुछ भी स्थिर नहीं है, और उसकी सत्ता में कुछ भी
अस्थिर नहीं है, वह अचल, अडोल और अच्युत है. उसे हम आज पुकारें, कल पुकारें, एक
वर्ष बाद पुकारें या एक युग बाद, वह सदा उसी तरह स्वागत करता हुआ मिलेगा. इसीलिए
वह मीरा का भी उतना है जितना राधा का.
Tuesday, March 27, 2018
एकै साधे सब सधे
२७ मार्च २०१८
हमारा जीवन जब तक हमारे शब्दों की गवाही न देने लगे तब तक सारे
शब्द एक प्रलाप ही तो हैं. मन, वचन और कर्म जब एक हो जाते हैं तो जीवन में एक मोहक
अनवरत बिखरने वाली सुगंध भर जाती है. जीवन का मर्म समझना हो तो दो-चार वाक्यों में
ही समझा जा सकता है, वे वाक्य चाहे भगवद गीता के हों या महात्मा बुद्ध के, शंकर के
हों या लाओत्से के. स्वंय के पार जाकर ही स्वयं को पाया जा सकता है और वहाँ जाकर
पता चलता है, यहाँ दो नहीं हैं, एक ही सत्ता है. जब तक सभी के साथ एकत्व का अनुभव
न हो, दूसरा दूसरा ही रहे, उहापोह बना ही रहता है. किसी ने सत्य कहा है, एकै साधे
सब सधे..पतंजलि ने भी कहा है, एक तत्व का ध्यान करने से मन की समता प्राप्त होती
है. वही एक हमारा ध्येय बने, आदर्श बने और प्राप्य बने, हर साधक की यही अभीप्सा
होती है.
Wednesday, February 14, 2018
देहभाव से मुक्त हुआ जो
१५ फरवरी २०१८
एक ही सत्ता से यह सारा जगत बना है. एक ही चैतन्य विभिन्न जीवों
के रूप में प्रकट हो रहा है, किन्तु वह सदा उनसे पृथक है. परमात्मा हर क्षण स्वयं
को ही भिन्न-भिन्न रूपों में प्रकट करके आनंदित हो रहा है. आत्मा को उसने अपने
जैसा बनाया है, अर्थात आत्मा के रूप में हम प्रतिक्षण अपने भीतर एक सृष्टि का
निर्माण कर रहे हैं. सुख-दुःख आदि आते हैं, आते रहेंगे, किन्तु उनसे प्रभावित होना
या न होना हमारे ऊपर निर्भर करता है. जब हम स्वयं को एकरस शुद्ध चेतना के रूप में
स्वीकार कर लेते हैं, तो जगत में कुछ भी हमें विचलित नहीं कर सकता. जगत से व्यवहार
चलेगा पर उसका प्रभाव मन पर नहीं होगा. अनुभव होगा पर कोई अनुभव कर्ता नहीं होगा,
क्योंकि सारे अनुभव प्रकृति में हो रहे हैं, आत्मा उनसे अलिप्त है. वह मात्र द्रष्टा
और ज्ञाता है. देह भाव से मुक्ति ही सच्ची मुक्ति है.
Sunday, May 21, 2017
भेद अभेद का राज जो जाने
२२ मई २०१७
उपनिषद कहते हैं, ईश्वर, जीव और प्रकृति ये तीन शाश्वत तत्व हैं. ईश्वर ने जीव और
प्रकृति दोनों को आच्छादित किया हुआ है. प्रकृति जीव के हित के लिए है. जीव दोनों
पर आश्रित है, अपने भौतिक अस्तित्त्व के लिए वह प्रकृति पर आश्रित है तो आत्मिक
उन्नति के लिए ईश्वर पर. कभी वह प्रकृति के आकर्षण में डूब जाता है और कभी दुःख
पाने पर परमात्मा की ओर झुक जाता है. साधना के द्वारा जब वह अपनी प्रकृति से भिन्न
अपनी स्वतंत्र सत्ता का अनुभव कर लेता है, और परमात्मा के साथ अपनी अभिन्नता का
अनुभव कर लेता है तो उसके सारे संशय समाप्त हो जाते हैं.
Wednesday, May 28, 2014
तेरे हाथों सौंप दिया सब
मार्च २००६
जितना-जितना
हम उस परम सत्ता के करीब होते जाते हैं, उससे घनिष्ठ नाता जोड़ते जाते हैं, जो
सत्ता कण-कण में व्याप्त है. हम देह की सीमाओं से पार होते जाते हैं. कृत्य का
अभिमान नहीं रहता. ज्यादा करने की चाह भी समाप्त हो जाती है. हमारे कर्म तब अपने
आप होते प्रतीत होते हैं, वह परमात्मा जैसे हमें अपने हाथों में नचा रहा हो. हम
निर्भार होकर जीने लगते हैं. पदार्थों के प्रति भाव भी बदल जाता है, पदार्थ हमारे
उपयोग में आयें बस वहीं तक उनका महत्व है, वे हमारे अहंकार को बढ़ाएं तो उनका
त्यागना ही उचित है. भीतर एक सहजता का जन्म होता है. यह कितना अद्भुत अनुभव है. एक
अनोखी शांति और स्थिरता भीतर बनी रहती है. हम उस स्रोत से जुड़ जाते हैं जहाँ से आए
हैं.
Saturday, December 7, 2013
तुम्हीं हो बन्धु सखा तुम्हीं हो
हम जिसका चिंतन करते हैं
वैसे ही हो जाते हैं. यदि हम कृष्ण का चिन्तन करते हैं तो धीरे-धीरे उसके गुणों को
धारण करने लगते हैं. कृष्ण को सात्विक भोजन पसंद था, पसंद है और पसंद रहेगा, उसे
संगीत से प्रेम है, वह निडर है, प्रेमी है, नटखट है, विनोदी है, वह सुन्दरता का
सिरमौर है. वह क्या नहीं है, ऐसा होने पर भी हमसे दूर नहीं जाता, निकटस्थ है,
भक्तों के हृदय में स्वयं को प्रकट कर देता है. वह आत्मा का सखा है, गुणात्मक रूप
से आत्मा और परमात्मा में कोई भेद नहीं. मन व बुद्धि सीमित हैं जो उसे नहीं जान पाते,
लेकिन मन द्वारा किया गया उसका चिन्तन मन को शुद्ध बनाता है, शुद्ध मन में आत्मा
की झलक मिलती है. तब मानव यह जानने लगता है जो दिख रहा है वह अस्थिर है, जो अदृश्य
है वही वास्तविक है. आत्मा की ही सत्ता से मन व बुद्धि कार्य कर रहे हैं, प्रमुख
वही है और यह आत्मा, परमात्मा का अंश है सो सभी कुछ उसी का ही हुआ !
Sunday, November 18, 2012
एक पुकार सदा आती है
अक्तूबर २००३
हमारे तन का पोर-पोर, मन का हर अणु परमात्मा के नाम से इस तरह ओत-प्रोत हो जाये कि
जैसे पात्र पूरा भर जाने पर जल छलकने लगता है वैसे ही उसके नाम का अमृत हमारे
अधरों व नेत्रों से स्वतः ही झलकने लगे. हमारा चित्त जब पूर्णतया तृप्त होगा उसके
नाम से भरा होगा तो भीतर के पाप-ताप, अशुभ वासनाएं धुल जाएँगी. उसके नाम में अनंत
शक्ति है, वह ऐसा जहाज है जो हजारों को पार लगाता है. हमारे भीतर-बाहर उसकी ही सत्ता
है. वह हजारों हाथों से हमें सम्भाले है, हमारी बुद्धि को वही तीक्ष्णता देता है, हमारे
प्राणों का वही आधार है. वह ईश्वर अनिर्वचनीय है, वह जब हमारे साथ है तो हमें किसी
बात का भय नहीं, कोई आशा नहीं, कोई चाह नहीं. वह मौन में भी बोलता है. हमारे भीतर
उसी का मौन छाया है जो तृप्ति प्रदान करता है. हम आत्मा के द्वारा ही उसका अनुभव
कर सकते हैं, इसके लिए न तो बल चाहिए न ही बुद्धि, हम जिस कार्य को बिना शरीर, मन,
बुद्धि आदि की सहायता के कर सकते हैं वह है ध्यान. वही हमें प्रभु से मिलाता है.
कार्य करते हुए यदि कर्तापन नहीं रहे तो भी हम शरीर, मन, बुद्धि से परे ही हुए.
ऐसा कार्य भी ध्यान बन जाता है. हमारा जीवन सहज भी है और दुष्कर भी, ईश्वर भी ऐसा
ही ही है अति निकट भी अति दूर भी. इन द्वंद्वों से भी मुक्त होना है, तब एक सहज
शांति का अनुभव होता है, पर हम ही उसे गंवा देते हैं पर कृष्ण हमारा मित्र हमें
बार-बार अपनी ओर ले जाने की चेष्टा करता है.
Friday, October 12, 2012
वह छुप न सकेगा परमात्मा
सितम्बर २००३
अनंत-अनंत ब्रह्मांडो का रचियता वह परब्रह्म रसमय है. जिसकी सत्ता से सृष्टि अनंत काल
से चली आ रही है, न जाने कितनी बार कितने रूपों में हम इसके अनोखे खेल देखते आये
हैं, हम प्रथम बार कब इस धरा पर आये थे, कौन जानता है ? शायद जब से यह सृष्टि है
तभी से हम भी यहाँ हैं, और शरीर के न रहने पर भी हमारी सत्ता ऊर्जा के रूप में तो
यहाँ रहेगी ही, तो जैसे वह परम सत्य अनादि है, अनंत है, वैसे ही उसने हमें भी बनाया
है. उसका हमारा सम्बन्ध बहुत पुराना है, वह जानता है पर हम भूले रहते हैं. माया का
आवरण डालकर वह जादूगर हमें भुलावे में डाल देता है. पर कभी-कभी किसी जन्म में संत
कृपा से माया का पर्दा हटता है, और हमें अपने वास्तविक स्वरूप की झलक मिलती है, तब
लगता है जिन वस्तुओं को हम इतना महत्व दे रहे हैं, वे तो बिना नींव की हैं, उनका
कोई आधार ही नहीं है, वे हर पल बदल रही हैं. हमारा शरीर भी निरंतर अनित्य की ओर जा
रहा है, ऐसा हो सकता है कि किसी एक दिन यह जगत हमारी आँखों से लुप्त हो जाये, हम
पुनः एक नए शरीर में डाल दिए जाएँ, उससे पूर्व ही इन रहस्यों को जीना होगा. संत
बताते हैं कि जैसे बादल, चाँद, तारे आदि आकाश में स्थित है पर आकाश उनसे अलिप्त
है, वैसे भी वह परमात्मा हमारे भीतर है और मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार से परे है.
Tuesday, July 31, 2012
छूटें जब आग्रह तब वह आता है
जून २००३
देह को जन्मने के बाद जो नाम दिया गया है, वह तो बदला जा सकता है लेकिन तन के
भीतर जहाँ से खुद के होने की सत्ता का भान होता है, वह अपरिवर्तनीय है. वही वास्तव
में हम हैं, और वह सभी के भीतर है. सभी के भीतर वही चैतन्य है. उस का अनुभव करने
के लिये ही हम शरण में जाते हैं, उसका अनुभव होने के बाद एक मदहोशी एक सात्विक
मस्ती का अनुभव होता है, शरण में जाने का अर्थ है कोई आग्रह न रखना, अस्तित्त्व ने
जो हमारे लिये तय किया है उसे स्वीकार करना, वैसे भी हम जो चाहते हैं, वह सभी होता
कहाँ है और जो होता है वह भाता नहीं, जो भाता है वह टिकता नहीं फिर जो नहीं भाता
वह भी नहीं टिकेगा तो अप्रिय को देखकर हमें परेशान होने की आवश्यकता नहीं है. सारे
आग्रह जब छूट जाते हैं तो जीवन सहज हो जाता है, भीतर की गाठें खुलने लगती हैं,
प्रकाश हो जाता है.
Monday, June 11, 2012
एक वही तो डोल रहा है
अप्रैल २००३
जहाँ-जहाँ मन जाये उसकी गहराई में उसी एक की सत्ता को देखने का
अभ्यास करें, संत ऐसा कहते हैं. हृदय में द्वेष बुद्धि न रहे तो सारी समस्याओं का
समाधान अपने–आप मिलता है, हम जो भी कर्म करते हैं उस का बीज हमारे मन में रह जाता
है और समय आने पर कर्म के अनुसार फल हमें भोगना पड़ता है. यदि सभी के साथ हमारी
भावना में समता होगी, उनके हित की कामना होगी, तो हमारा व्यवहार शुद्द होगा, और अंतर
एक शुभ्र, निर्मल आकाश की तरह उस ज्योति स्वरूप आत्मा के प्रकाश की झलक दिखायेगा.
यह सम्पूर्ण जगत उसी की लीला है, खेल है, जिसके हम पात्र हैं, हम खेल में इतना उलझ
जाते हैं कि घर जाने की सुध ही नहीं रहती, ध्यान वह विश्रांति है जिसे पाने के
लिये हम घर जाते हैं, जहाँ प्रेम का पाथेय लिये प्रभु हमारी प्रतीक्षा रत हैं,
जैसे माँ बच्चे को स्वच्छ करती है वैसी ही वह मन, बुद्धि पर छाई धूल को साफ करते
हैं, अब खेलते समय भी उसकी याद बनी रहती है, जब एक बार पूर्ण मिल जाये तो अपूर्ण
कोई क्यों चाहेगा, गंगा सामने हो तो पोखर को क्यों ताकेगा, फिर खेल भी उसकी पूजा
बन जाता है और उसका सान्निध्य हमें हर पल प्राप्त होने लगता है.
Thursday, April 26, 2012
आत्मा का फूल
वही इस जगत का आधार है. वही सारे
स्पन्दनों का आधार है. पहले शब्द हुआ फिर उसके अनुरूप आकृति. हमारे भीतर भी वही आदि
सत्ता विद्यमान है. यह जगत हमें इसीलिए तो प्रिय लगता है, क्योंकि यह सब कुछ उसी
का है. एक उसी को चाहो तो प्रकृति भी साथ देने लगती है. जगत जो हर पल अपना शासन मन पर करना चाहता है, वह भी
प्रिय लगने लगता है. समय का प्रतिबंध, जीवन में अनुशासन, और एक कर्म बद्धता अपने
आप आने लगती है. वह हमारे ह्रदय की हर बात जानते हैं, गुणातीत, सबके मध्य होते हुए
भी अलिप्त,, सुख-दुःख से परे, उद्वेग रहित, आकाश की भांति... उनसा होने के लिये ही
उनको चाहना, धर्म के मार्ग पर दृढ़ रहना है. यदि परम के प्रति प्यास जगी है तो उस
पौधे को सींचते रहना चाहिए. अन्यथा वह पौधा सूख जायेगा. सभी को पूर्णता की तलाश
है. तन और मन के स्तर पर हम कभी पूर्ण नहीं हो सकते, आत्मिक स्तर पर ही हम पूर्णता
का अनुभव कर सकते हैं. इसकी झलक मिलते ही अपना आप जैसे सारे ब्रह्मांड को व्याप्त कर
लेता है. दुनिया एक खेल लगती है...एक नाटक. ध्यान से देखें तो जीवन का अर्थ क्या
है ? क्या यह फूलों के खिलने और और फिर मुरझा कर झर जाने जैसा नहीं है. पर मुरझाने
से पूर्व वे अपनी सारी खुशबू को लुटाते हैं जो उनके भीतर है. आत्मा में भी प्रेम की
खुशबू है, हमारे तन व मन भी प्रेम की मांग
करते हैं, आत्मा के लिये वे भी ‘पर’ हैं, उसका सबसे पहला प्रेम तो उन्हें ही मिलता
है. इसके बाद वह अपने आप बिखरने लगता है.
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