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Wednesday, April 9, 2014

जिसने सूरज चाँद बनाया

जनवरी २००६ 
जीवन कितना अद्भुत है, कितना सुंदर तथा कितना भव्य ! नीला आकाश, हरे-भरे बगीचे, मधु से युक्त पवन तथा शीतल जल. किसी को भी इसे बिगाड़ने का कोई अधिकार नहीं. जीवन की कद्र करनी है, जीवन को खत्म करने का हमें क्या अधिकार है. इसे देखकर मन कभी आश्चर्य से खिल जाता है कभी मुग्ध हो जाता है. उस अनदेखे परमात्मा की स्मृति आते ही उसके लिए श्रद्धा से भर जाता है. यह अद्भूत संसार उसने उन सबके लिये रचा है, जो इसकी खुशबू को अपने अंदर समोते हैं, इसके रस को पीते हैं, इसकी नरमाई-गरमाई को महसूसते हैं. हम मानव कितने भाग्यशाली हैं, हमें ईश्वर की बनाई इस सृष्टि में रखा गया है उसकी महिमा का गान करने के लिए, उसके गुणों को धारण करने के लिए. उसके आनंद का अनुभव करने के लिए. उसकी लीला में सहभागी बनने के लिए.

Wednesday, September 12, 2012

सत्यं-शिवं-सुन्दरं


अगस्त २००३ 
सुख-दुःख से परे, मान-अपमान से ऊपर, इच्छा-अनिच्छा के द्वंद्व से मुक्त मन कितना सुंदर है. सत्यं-शिवं-सुन्दरं का जब जीवन में प्रवेश हो संभवतः तभी वास्तविक जीवन शुरू होता है. सत्य ही शिव है, और जो कल्याणकारी है, वही सुंदर है, यह जगत हमारे मन का प्रतिबिम्ब ही दिखाता है. जब मन शांत हो, सौम्यता को धारण कर चका हो, जगत में रची गयी सैकड़ों लीलाएं चाहे वे सुखद हो अथवा दुखद, अब एक सी प्रतीत होती हैं. घड़ी-घड़ी मन भीतर आ जाता है, उसी केन्द्र की ओर जो उसका मूल है, बाहर के कार्यों को करने के लए उसे सप्रयास बाहर लाना पड़ता है. इसे ही अमनी भाव कहते हैं. मौन से कैसी प्रीति हो जाती है. वाणी के मौन के साथ-साथ भीतर का मौन.. क्योंकि अब कोई चाह शेष नहीं रहती, जब इस जगत से विशेष कुछ मिलने वाला नहीं है जो पहले से ही हमारे पास नहीं है तो बाहर क्यों जाएँ. भीतर कोई मिल गया है जिसे जानकर ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ पाना शेष नहीं रह गया है. सब कुछ इतना सहज हो जाता है मानों जन्मो-जन्मों से इसी पथ के राही हों. तब जीवन एक खेल लगता है.

Monday, June 11, 2012

एक वही तो डोल रहा है


अप्रैल २००३ 
जहाँ-जहाँ मन जाये उसकी गहराई में उसी एक की सत्ता को देखने का अभ्यास करें, संत ऐसा कहते हैं. हृदय में द्वेष बुद्धि न रहे तो सारी समस्याओं का समाधान अपने–आप मिलता है, हम जो भी कर्म करते हैं उस का बीज हमारे मन में रह जाता है और समय आने पर कर्म के अनुसार फल हमें भोगना पड़ता है. यदि सभी के साथ हमारी भावना में समता होगी, उनके हित की कामना होगी, तो हमारा व्यवहार शुद्द होगा, और अंतर एक शुभ्र, निर्मल आकाश की तरह उस ज्योति स्वरूप आत्मा के प्रकाश की झलक दिखायेगा. यह सम्पूर्ण जगत उसी की लीला है, खेल है, जिसके हम पात्र हैं, हम खेल में इतना उलझ जाते हैं कि घर जाने की सुध ही नहीं रहती, ध्यान वह विश्रांति है जिसे पाने के लिये हम घर जाते हैं, जहाँ प्रेम का पाथेय लिये प्रभु हमारी प्रतीक्षा रत हैं, जैसे माँ बच्चे को स्वच्छ करती है वैसी ही वह मन, बुद्धि पर छाई धूल को साफ करते हैं, अब खेलते समय भी उसकी याद बनी रहती है, जब एक बार पूर्ण मिल जाये तो अपूर्ण कोई क्यों चाहेगा, गंगा सामने हो तो पोखर को क्यों ताकेगा, फिर खेल भी उसकी पूजा बन जाता है और उसका सान्निध्य हमें हर पल प्राप्त होने लगता है.