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Tuesday, March 27, 2018

एकै साधे सब सधे


२७ मार्च २०१८ 
हमारा जीवन जब तक हमारे शब्दों की गवाही न देने लगे तब तक सारे शब्द एक प्रलाप ही तो हैं. मन, वचन और कर्म जब एक हो जाते हैं तो जीवन में एक मोहक अनवरत बिखरने वाली सुगंध भर जाती है. जीवन का मर्म समझना हो तो दो-चार वाक्यों में ही समझा जा सकता है, वे वाक्य चाहे भगवद गीता के हों या महात्मा बुद्ध के, शंकर के हों या लाओत्से के. स्वंय के पार जाकर ही स्वयं को पाया जा सकता है और वहाँ जाकर पता चलता है, यहाँ दो नहीं हैं, एक ही सत्ता है. जब तक सभी के साथ एकत्व का अनुभव न हो, दूसरा दूसरा ही रहे, उहापोह बना ही रहता है. किसी ने सत्य कहा है, एकै साधे सब सधे..पतंजलि ने भी कहा है, एक तत्व का ध्यान करने से मन की समता प्राप्त होती है. वही एक हमारा ध्येय बने, आदर्श बने और प्राप्य बने, हर साधक की यही अभीप्सा होती है.

Friday, June 5, 2015

जिस क्षण एक हुआ यह मन

जुलाई २००९ 
धर्म की साधना है मन रूपी दाल को फिर बीज बनाना, बीज में ही अंकुर फूटता है. एक क्षण में तब अंकुर वृक्ष बनने लगता है. बीज के लिए धरती है शब्द, सत्संग, गुरू के वचन, मनन. जिस वक्त संध्या काल हो अर्थात मन एक अवस्था से दूसरी में जा रहा हो तब यह बीज बोना चाहिये, जैसे निद्रा और जागरण के मध्य या जागरण और निद्रा के मध्य ! जुड़ा हुआ मन ही गहराई में जा सकता है. 

Friday, August 8, 2014

समझ समझ कर चलना होगा

जनवरी २००७ 
बुद्ध पुरुषों के वचनों को समझ लेने मात्र से हम बुद्ध नहीं हो पाते, जब तक हमारा स्वयं का अनुभव न हो. उनके वचन सत्य सिद्ध हैं, वे उनके अनुभव हैं पर वे हमारे जीवन को नहीं बदल सकते. वे केवल तथ्य की सूचना देते हैं, उनकी उदघोषणा में कोई भावावेश नहीं है. वे हमें हमरी समझ के अनुसार चलने का आग्रह करते हैं. हम मात्र बुरा-बुरा कहकर विकार को छोड़ने की कोशिश करते हैं पर सफल नहीं होते. यदि विकार को विकार की तरह देखते हैं तभी बदलते हैं. हमारे दृष्टि में भी जब विकार अग्नि जैसा लगे, तभी हम उससे बचते हैं. यदि संकट की घड़ी में ही केवल पुण्य का विचार करें और आराम के वक्त यदि सहजता से विकार के वश में रहें तो जिससे हम लड़ते हैं वह प्रबल होता है. हम जिसका दमन करते हैं वह एक न एक दिन बाहर आयेगा.