ध्यान एक बीज के रूप में हमारे भीतर प्रकृति द्वारा प्रदान किया जाता है. जन्म के साथ ही शिशु को यह उपहार मिलता है, इसमें वह संभावनाएं छुपी होती हैं जिन्हें वह भविष्य में प्राप्त कर सकता है. इस बीज को जब मन की भूमि में बोया जाता है, इसे श्रद्धा का जल मिलता है और विश्वास की धूप तो यह अंकुरित होने लगता है. धीरे-धीरे यह पौधे से वृक्ष बनता है एक दिन इस पर प्रेम और भक्ति के पुष्प लगते हैं, जिनकी सुवास से मन का कोना-कोना भर जाता है. ध्यान का यह बीज अनेकों के जीवन में बिना अंकुरित हुए ही रह जाता है, तब जीवन रूखा-सूखा ही रहता है. हो सकता है ऐसे लोग बुद्धि के द्वारा श्रेष्ठ पदों को प्राप्त कर लें पर उनके अंतर में बसंत नहीं आता, बाहर से उसे लाने के उपाय करने पड़ते हैं. जीवन में कृत-कृत्यता का अनुभव नहीं होता, वह सन्तोष नहीं आता जिसे पाकर सब धन फीके लगते हैं. गुरुजन ध्यान की इतनी महिमा इसीलिए करते हैं, इसके नियमित अभ्यास से हमारे भीतर के द्वार खुलने लगते हैं, एक गहन शांति और स्थिरता का अनुभव मन को होता है. इस अनिश्चतता भरे वातावरण में यदि मन सदा डांवाडोल होता रहे तो मानव को चैन कैसे मिल सकता है. इसलिए क्यों न आज से ही हम ध्यान को हम अपने जीवन का एक हिस्सा बनाएं.
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Friday, May 22, 2020
Sunday, June 23, 2019
एकोहं बहुस्याम
वेदों में कहा गया है, ब्रह्म
एक था, उसमें इच्छा हुई, एक से अनेक होने की, और इस सृष्टि का निर्माण हुआ. किंतु अनेक
होने के बाद भी उसके एकत्व में कोई अंतर नहीं पड़ा. जैसे कोई बीज एक होता है, किंतु
समय पाकर एक से अनेक हो जाता है. पहले अंकुर फूटता है, फिर तना, डालियाँ, पत्ते,
फूल, फल और अंत में बीज रूप में वह अनेक हो जाता है, किंतु हर बीज उस पूर्व बीज के
ही समान है. उसमें भी अनेक होने की पूरी सम्भावनाएं हैं. जैसे अंकुर, तना, या
डालियाँ, फूल आदि सभी उस बीज में से ही निकले हैं, पर वे बीज नहीं हैं, इसी प्रकार
ब्रह्म से ही जड़ जगत, वृक्ष, पशु, पंछी आदि हुए हैं पर वे ब्रह्म के एकत्व का
अनुभव नहीं कर सकते, केवल मानव को ही यह सामर्थ्य है कि वह फूल की तरह खिले, फिर
उसमें भक्ति व ज्ञान के फल लगें और उसके भीतर ब्रह्म रूपी बीज का निर्माण हो सके.
Thursday, June 13, 2019
जैसे कर्म करेगा मानव
हमारे आस-पास जो भी
परिस्थितियाँ प्रकृति के द्वारा रचित हैं, वे उन्हीं कारणों के परिणाम स्वरूप हमें
मिली हैं, जिनके बीज हमने कभी डाले थे. जैसे कोई छात्र यदि पढ़ाई नहीं करता और फेल
हो जाता है तो यह उसके ही कर्म का फल है. अब उसे दुखी होने या शिकायत करने का क्या
अधिकार है. इस वक्त यदि वह दुखी होकर अपना स्वास्थ्य खराब करेगा या जीवन ही समाप्त
कर लेगा तो इस नये कर्म का परिणाम भविष्य में और दुःख के रूप में उसे मिलेगा. अज्ञानवश
स्वयं को कर्त्ता मानकर हम भविष्य के लिए कारण रूप में बीज डालते रहते हैं. जब फल
हमारी इच्छा के विपरीत आता है तो उसे स्वीकारते भी नहीं. आत्मज्ञान होने के बाद जब
कोई स्वयं को कर्त्ता मानना छोड़ देता है, तब भोक्ता भी नहीं रहता. मन, बुद्धि व
देह द्वारा जो भी कर्म पहले हुए हैं, उन्हीं का परिणाम मन, बुद्धि व देह को मिल
रहा है. आत्मा सदा अलिप्त है, यह ज्ञान ही हमें मुक्त करता है.
Friday, March 8, 2019
खिलकर ही जीवन मिलता है
सत्य समग्रता में मिलता है विश्लेषण में खो जाता है. हम एक फूल
को देखते हैं और उसकी सुन्दरता से मुग्ध हो जाते हैं, उस बीज का हमें स्मरण ही
नहीं आता जिसने इस फूल तक की यात्रा में क्या-क्या सहा है. बीज से फूल बनने को जो
एक क्षण में देख लेता है वही परमात्मा के जगत होने को भी स्वीकार कर सकता है. फूल
कोमल है, सुंदर है, सुगंध से भरा है, अपनी और खींचता है, लुभाता है, बीज में ऐसा
कुछ भी नहीं, कोई विशेषता नहीं कि हम उसे अपने घरों, मंदिरों या केशों में सजाएं. हाँ,
बीज के भीतर अंकुरित होने की शक्ति है जो समुचित आधार पाकर विकसित हो सकती है. ऐसे
ही जगत रंगीन है, अपने रूप, रंग, गंध, स्वाद और स्पर्श से आकर्षित करता है, परमात्मा
निर्विशेष है, उसे आप किसी को दिखा नहीं सकते, वह अदृश्य है. उससे ही सब कुछ हुआ
है. उसके साथ यदि कोई जुड़ जाता है तो सहज ही वह भी विकसित होने लगता है, उसका अहम
गल जाता है और आत्मा का जो बीज भीतर सुप्तावस्था में था, प्रस्फुटित होने लगता है.
Thursday, April 20, 2017
मुक्त हुआ मन कब डोले
२१ अप्रैल २०१७
शास्त्रों के अनुसार अनंत जन्मों के हमारे संचित कर्मों में से थोड़ा सा
प्रारब्ध कर्म लेकर हम इस दुनिया में आते हैं. जिनके अनुसार जन्म, आयु, सुख-दुःख आदि हमें मिलते
हैं. जब तक यह ज्ञान नहीं होता कि मनसा,
वाचा, कर्मणा हर कर्म का फल
मिलने ही वाला है, हम नये-नये कर्म बांधते चले जाते हैं, जिनका हिसाब चुकाना ही होगा.
एक बार यह ज्ञान हो जाने के बाद हमें केवल पुराने कर्मों का हिसाब पूरा करना है. स्वयं
को सदा मुक्त अनुभव करने के लिए कर्मों के जाल से छूटना ही एक मात्र उपाय है. जीवन
में कैसी भी परिस्थिति आये मन को समता भाव में रहकर उससे पार हो जाना ही कर्मों से
छूटना है, अन्यथा भविष्य के लिए एक नया बीज बो दिया जायेगा. जिस किसी व्यक्ति, वस्तु अथवा परिस्थिति के
साथ राग अथवा द्वेष का भाव मन में रहता है, उसका सही मूल्यांकन हम कभी
नहीं कर सकते. राग अथवा द्वेष बुद्धि को धूमिल कर देते हैं और हम अनजाने ही नई
रस्सियों में जकड़े जाते हैं.
Sunday, April 16, 2017
समता की जब करें साधना
१७ अप्रैल २०१७
बीज एक है पर उसी से तना, डालियाँ, पत्ते, कलियाँ, फल व फूल प्रकट होते हैं, ऐसे ही जगत में विविधता है पर एक ही ऊर्जा देह और मन के माध्यम से प्रकट हो रही है. बीज यदि संक्रमित हो तो पौधा भी रोगग्रस्त होगा, अथवा तो पौधे को उचित जलवायु न मिले तो भी वह स्वस्थ नहीं होगा. इसी तरह ऊर्जा यदि नकारात्मक हुई अथवा उसको प्रकट होने का उचित माध्यम नहीं मिला तो जीवन स्वस्थ नहीं रह सकता. ऊर्जा को ऊपर से नीचे बहने के लिए कोई प्रयास नहीं करना पड़ता, नीचे गिरना सहज ही होता है पर ऊपर ऊठने के लिए प्रयास चाहिए, इसे ही हमारे शास्त्रों में पुरुषार्थ कहा गया है. मन यदि समता में रहता है तो ऊर्जा सहज ही ऊर्ध्वगामी होती है. सजगता ही इसका साधन है, सजगता बनी रहे इसके लिए ही आसन, प्राणायाम, ध्यान आदि का विधान है.
Tuesday, January 24, 2017
माली सींचे मूल को
२४ जनवरी २०१७
जीवन का निर्माण अंधकार में आरम्भ होता है, एक बीज को धरती के नीचे बोया जाता है और एक दिन वह वृक्ष का रूप ले लेता है, जड़ों के रूप में उसका स्रोत छिपा ही रहता है. जड़ों की भी यदि खोद के निकाल लें तो जीवन सूख जाता है. उन्हें वहीँ पोषित करना होता है. इसी तरह हमारा मूल भी भीतर छिपा है, जिसे वहीं पोषित करना है, मूल तक पहुंचने का नाम ही ध्यान है. देह को स्थिर करके पहले मन को देखना फिर मन को शांत करते हुए उस बीज तक पहुंचना जो जीवन का स्रोत है, यह पहला चरण है, फिर उस स्रोत को परम से जोड़ना जिससे वह पोषित हो सके दूसरा सोपान है. प्रार्थना भी ध्यान का विकल्प हो सकती है और नाम जप भी, अपनी-अपनी रूचि के अनुसार कोई भी मार्ग अपनाकर हम अपने मूल को सींच सकते हैं.
Friday, June 5, 2015
जिस क्षण एक हुआ यह मन
जुलाई २००९
धर्म की
साधना है मन रूपी दाल को फिर बीज बनाना, बीज में ही अंकुर फूटता है. एक क्षण में
तब अंकुर वृक्ष बनने लगता है. बीज के लिए धरती है शब्द, सत्संग, गुरू के वचन, मनन.
जिस वक्त संध्या काल हो अर्थात मन एक अवस्था से दूसरी में जा रहा हो तब यह बीज बोना
चाहिये, जैसे निद्रा और जागरण के मध्य या जागरण और निद्रा के मध्य ! जुड़ा हुआ मन ही
गहराई में जा सकता है.
Thursday, May 21, 2015
मुक्त करेगा ज्ञान ही भय से
मार्च २००९
तात्कालिक भय और
असुरक्षा की भावना जब हमें घेर लेती है तो बुद्धि अपना काम करना बंद कर देती है.
हमें लगता है कि हमें खतरा है, जबकि आत्मा को भय हो ही नहीं सकता. पुराने संस्कारों
के कारण अथवा प्रारब्ध के कारण मन भय जगाता है, जो बीज पहले बोये थे उनके फल आने
लगें तो मन विचलित होता है. लेकिन ज्ञान की तलवार से इस वृक्ष को ही काट देना है.
भय के पीछे मोह ही तो है, मोह के पीछे अज्ञान है, अज्ञान ही हमें बाहर की घटनाओं
से प्रभावित करता है, जबकि बाहर की घटनाओं का हमारे मन के विचारों व भावनाओं से
कोई संबंध नहीं है, हम संबंध जोड़ लेते हैं.
Monday, May 18, 2015
कमल खिले मन सरवर में जब
फरवरी २००९
भीतर जाकर
ही ज्ञान होता है कि बाहर कुछ भी अपना कहने जैसा नहीं है, पकड़ने को यहाँ कुछ भी
नहीं है. यदि इस ज्ञान के बीज को अपने हृदय में धारण किया, सींचा और पालना की तो
भीतर एक कमल खिलता है. दूसरे से सुख न कभी मिला है, न मिलेगा, वही जानना ही प्रेम
है. जाग्रति का तेल हो और प्रेम की बाती हो तो आनंद का प्रकाश फैलता है और तब वहाँ
होती है परम शांति ! यह संसार जो पहले कारागृह लगता था अब वह सुंदर आश्रय स्थल बन
जाता है. जागना हमारे हाथ में है, प्रेम हमारे भीतर है. अगर अपने दुखों से अभी तक
घबरा नहीं गये तो बात और है लेकिन जब भीतर की पीड़ा खलने लगे तो खिलने देना है भीतर
का कमल.
Tuesday, March 3, 2015
मिट कर ही मंजिल मिलती है
फरवरी २००८
अगर बीज
अपने को बचाए तो बचता नहीं और मिटाए तो अमर हो जाता है. जो मिटेगा वही बचेगा, जो
बचाएगा वह मिट जाता है. जिस दिन यह ‘मैं’ जान लेता है, मेरे होने में ही बंधन है
उस दिन यह मन को सूक्ष्म करने की क्रिया आरम्भ करता है. यह ‘मैं’ का पर्दा मखमल से
मलमल का करना है, जिस दिन यह मन पूरा मिट जाता है उस दिन परमात्मा ही बचता है. अभी
तो मोटा लोहे का पर्दा है मन, जिस दिन ‘मैं’ नहीं रहता उस दिन वह महा अतिथि आता
है. अभी मन खाली नहीं है, भीतर कोलाहल है, इसे शांत करके ही मन महीन किया जा सकता
है. सूक्ष्म करते करते शून्य की यात्रा शुरू करनी है जो पूर्ण पर समाप्त होती है. हमारे भीतर सूक्ष्म भी है स्थूल भी. देह बर्फ
जैसी है, मन पानी जैसा, आत्मा भाप जैसी है. जो स्वयं को देह मानता है वह मृत्यु से
डरेगा. जो स्वयं को मन मानता है वह काव्य, संगीत तथा कला में रूचि रखता है और जो
स्वयं को आत्मा मानता है वह सर्वव्याप्त है, वह उड़ान भर सकता है. वह मुक्त है. वह
नष्ट नहीं हो सकता. वह सूक्ष्म है, जो जितना सूक्ष्म है उतना ही शक्तिशाली होता
जायेगा. वह चट्टान सा दृढ़ भी होगा और फूल से भी कोमल. वह होकर भी नहीं होगा और
उसके सिवा भी कुछ होगा भी नहीं, सारे द्वंद्व उसमें आकर मिट जायेंगे. वह होने के
लिए कुछ करना नहीं है. वह तो है ही, केवल उसे जानना भर है. मन को खाली करना ऐसा तो
नहीं है कि कोई बर्तन ख़ाली करना हो. कामना को त्यागते ही या समर्पण करते ही मन ठहर
जाता है, ठहरा हुआ मन ही ख़ाली मन है !
Tuesday, March 18, 2014
भीतर जाकर ही मिलता वह
अक्तूबर २००५
जब हम कुछ पल के लिए शांत
होते हैं, तो शांति ऊपरी-ऊपरी होती है और जाती है, पर जब हम अन्तर्मुखी होकर गहराई
में जाते हैं तो पता चलता है कि वास्तविक शांति किसे कहते हैं. भीतर जाकर जब पता
चलता है कि विकार कैसे जन्मते हैं, कैसे बनते हैं और कैसे एकत्र होते हैं. एक बार
जब भीतर कोई विकार जगता है तो दुखी होने का कारण पैदा हो ही गया. ऊपर-ऊपर का चित्त
परिमित है और उसके नीचे का वृहत्तर चित्त है. जब तक भीतर वाला चित्त नहीं सुधरता
तब तक बाहर का चित्त कभी शांत कभी अशांत होता ही रहेगा. हम बार-बार एक ही गलती करते
हैं क्यों कि गलती का बीज तो नीचे है, ऊपर से डाली काट देने से क्या होता है, पुनः
नई डाली निकल आती है. जब तक हम जड़ को नहीं काटेंगे तब तक गलती करने का स्वभाव बना
ही रहेगा. हमें यदि सदा के लिए सुख-शांति का अनुभव करना चाहते हैं तो सदा के लिए
विकारों से मुक्त होना पड़ेगा. और इसके लिए भीतर की यात्रा करनी ही होगी.
Friday, February 7, 2014
तोरा मन दर्पण कहलाये
जुलाई २००५
हमारा
मन वास्तव में दर्पण है जो भीतर उठने वाले हर विचार को प्रतिबिम्बित करता है. हमारे
अंतः करण का निर्माण प्रतिक्षण होता रहता है, कोई भी घटना जो भीतर घटी हो अथवा
बाहर, प्रतिक्रिया जगाती है, यह प्रतिक्रिया राग या द्वेष दोनों में से ही कोई
होती है. दोनों ही हमें बांधते हैं, यह जानते हुए भी हम स्वभाव वश प्रतिक्रिया
करते हैं, अंतः करण को मैला करते हैं, वही हमारे मन में झलकता है और उसका संस्कार
भी भीतर बन जाता है. जो भी घट रहा है उसे साक्षी भाव से देखने पर ही मन शांत रहता
है और कोई बीज नहीं पड़ता. जिस व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति के प्रति हम
प्रतिक्रिया जगाते हैं अनजाने में हम उसके जैसे होने लगते हैं, अपने पद से नीचे
गिर जाते हैं. साधना के पथ पर दो कदम आगे चले नहीं कि तीन कदम पीछे आ गये, तभी तो
लक्ष्य दूर ही रहता है. मन में छाई हल्की सी धूमिल रेखा भी साधक को मान्य नहीं, वह
प्रतिक्षण सहजावस्था में रहना चाहता है.
Thursday, April 18, 2013
कर्मगति अति गहन, हे अर्जुन !
जुलाई २००४
जो कर्म वर्तमान में हम करते
हैं, वे क्रियमाण कहलाते हैं, जो कर्म बीज रूप में हमारे सूक्ष्म शरीर के साथ रहते
हैं, वे संचित कर्म कहलाते हैं और जब वे परिपक्व हो जाते हैं व फल देने का कार्य
करते हैं, तब उन्हें प्रारब्ध कर्म कहते हैं. साधना के द्वारा जब कोई साधक संचित
कर्मों के बीजों को भून देता है तब उनमें फल नहीं लगते, और साधना के रूप में नए शुभ
क्रियमाण कर्म करता है, तो नए बीज शुभ ही बो रहा है जो वक्त आने पर शुभ फल ही
देगें. भक्त अपने सभी कर्मों को समर्पण करके मुक्त हो जाता है. ज्ञानी जानता है कि
भीतर आत्मा व परमात्मा दो सखाओं की भांति विद्यमान हैं, परमात्मा द्रष्टा है,
आत्मा भोक्ता है, यदि आत्मा भी द्रष्टा भाव में आ जाये, तो जगत एक मनोहारी सुखद
कर्मक्षेत्र बन जायेगा.
Saturday, July 23, 2011
कर्म और कर्म फल
मई २००१
किसान यदि बीज बोते हुए सजग है तो फल अपने आप ही अच्छा आयेगा. कर्म करते समय यदि हम सजग रहें तो कर्म के फल की चिंता करने की जरूरत नहीं रहेगी. प्रकृति के इस नियम को जिसने मात्र बुद्धि के स्तर पर नहीं, अनुभूति के स्तर पर समझ लिया तो धर्म उसके जीवन में स्वतः आ जायेगा. धर्म सरल है उनके लिये जो चित्त से सरल हैं. करेले का बीज लगाकर कोई आम की आशा करे तो उसे क्या कहेंगे ऐसे ही कोई भी कर्म चाहे वह कितना ही छोटा हो स्वार्थ वश, मलिन भाव से अथवा क्रोध से किया गया हो तो परिणाम दुखद ही होगा. भीतर यदि संकीर्णता हो तो बाहर का सुख भी व्यर्थ ही सिद्ध होता है.
Thursday, June 9, 2011
सत्संग
मई २०००
किसी भी संवेदनशील हृदय को प्रकृति अपनी सुंदरता से मोह लेती है, फिर इस सुंदरता को रचने वाले के प्रति आकर्षण जगता है. इस तरह अनजाने ही आध्यात्मिकता का एक नन्हा सा बीज अंतर में बो दिया जाता है, मौसम आते जाते रहते हैं, कभी प्रतिकूलता मिलती है कभी अनुकूलता और अंकुर को पौधा बनने में बरसों लग जाते हैं, मनीषियों, ऋषियों, संतों और अवतारों के जीवन उनके सदुपदेशों के रूप में इस पौधे को जल और भोजन मिलता है और धीरे धीरे यह बढ़ने लगता है. यात्रा आरम्भ तो हो जाती है लेकिन इसे दिशा मिलती है सत्संग से.
Thursday, June 2, 2011
अहंकार
अप्रैल २०००
कर्त्ताभाव जब क्षीण हो जाये तो ही ब्रह्मभाव जगेगा, बीज जब मिटेगा तब ही तो वृक्ष बनेगा. जब तक कर्त्ता मौजूद रहेगा अहंकार बना ही रहेगा, और हम उस ईश्वर से दूर ही रहेंगे. अपनी आवश्यकताएँ कम से कम रखने से, अन्यों पर कम से कम आश्रित रहने से अहंकार का विस्तार नहीं होता. लोभ, क्रोध जैसे अवगुणों पर ध्यान देने से भी अहंकार कम होता है, लेकिन हम जो भी साधना करेंगे वह भी तो कहीं अहंकार को बढावा देने वाली ही नहीं सिद्ध हो रही. ईश्वर जो अपना आप बनकर बैठा है, सब देखता है और मुस्काता है कि उसका नाम लेने वाले भी किस तरह संसार के चक्रव्यूह में फंसे हैं.
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