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Thursday, July 6, 2023

तोरा मन दर्पण कहलाये

मन उसी का नाम है जो सदा डांवाडोल रहता है, तभी मन को पंछी भी कहते हैं हिरन भी और वानर भी..आत्मा रूपी वृक्ष के आश्रय में  बैठकर टिकना यदि इसे आ जाये तो इसमें भी स्थिरता आने लगती है, वास्तव में वह स्थिरता होती आत्मा की है प्रतीत होती है मन में, जैसे सारी हलचल होती बाहर की है प्रतीत होती है मन में।मन तो दर्पण ही है जैसा उसके आस-पास होता है झलक जाता है. संगीत की लहरियों में डूबकर यह मस्त हो जाता है और किसी उपन्यास के भावुक दृश्य में भावुक।ऐसे मन का चाहे वह अपना हो या अन्यों का क्या रूठना और क्या मनाना।क्यों न हर सुबह मन को समझते हुए प्रवेश करें ताकि न किसी से मनमुटाव हो और न किसी का मन टूटे. आत्मा रूपी वृक्ष पर कुसुम की तरह खिला रहे सबका मन.


Sunday, May 21, 2023

जीवन जब उपहार बनेगा

हम ध्यान अर्थात् भीतर जाकर विचार करने से घबराते हैं, ऐसे विचारों से जो हमारे भीतर की कमियों को उजागर करते हैं. हम उस दर्पण में देखना नहीं चाहते जो हमें कुरूप दिखलाये तभी कठिन विषयों से भी हम घबराते हैं, जो हम जानते हैं वह सरल है पर उसी को पढ़ते-गुनते रहना ही तो हमें आगे बढ़ने से रोकता है. जब कोई हमें अपमानित करता है तब वह हमारा निकष होता है, प्रभु से प्रार्थना है कि वह उसे हमारे निकट रखे ताकि हम वही न रहते रहें जो हैं बल्कि बेहतर बनें. स्वयं की प्रगति ही जगत की प्रगति का आधार है, हम भी तो इस जगत का ही भाग हैं. हम यानि, देह, मन, बुद्धि। आत्मा तो पूर्ण है उसी को लक्ष्य करके आगे बढ़ना है.  उसी की ओर चलना है चलने की शक्ति भी उसी से लेनी है. आत्मा हमारी निकटतम है हमारी बुद्धि यदि उसका आश्रय ले तो वह उसे सक्षम बनाती है अन्यथा उद्दंड हो जाती है. आत्मा का आश्रित होने से मन भी फलता फूलता है, प्रफ्फुलित मन जब जगत के साथ व्यवहार करता है तो कृपणता नहीं दिखाता समृद्धि फैलाता है. जीवन तब एक शांत जलधारा की तरह आगे बढ़ता जाता है. तटों को हर-भरा करता हुआ, प्यासों की प्यास बुझाता हुआ, शीतलता प्रदान करता हुआ, जीवन स्वयं में एक बेशकीमती उपहार है, उपहार को सहेजना भी तो है.   

Friday, March 5, 2021

तोर मन दर्पण कहलाये

 मन दर्पण है, परमात्मा बिम्ब है, जीव प्रतिबिंब है, यदि दर्पण साफ नहीं हो तो उसमें प्रतिबिंब स्पष्ट नहीं पड़ेगा। संसार भी तब तक निर्दोष नहीं दिखेगा जब तक मन निर्मल नहीं होगा। हम अपने मन के मैल को जगत पर आरोपित कर देते हैं और व्यर्थ ही जगत को दोषी मानते हैं। जब कभी हमने किसी को दोषी माना, उस पर अपना ही मत थोपा है। हर कोई जैसा है वैसा है।  अपनी समझ के अनुसार ही हम निर्णायक बनते हैं, हमारी समझ कोई पूर्ण तो है नहीं। यदि भीतर क्रोध है तो वह बाहर आने का रास्ता खोजेगा। यदि भीतर काम है तो वह जगत में उसी को आरोपित करेगा। दृष्टि जैसी होगी सृष्टि वैसा ही रूप धर लेती है। यदि कोई दृष्टिकोण ही न हो तो दुनिया जैसी है वैसी ही दिखेगी, इससे हमारी शांति भंग नहीं होगी। इसलिए संत कहते हैं अहंकार को छोड़े बिना सत्य का साक्षात्कार नहीं हो सकता। अहंकार है किसी भी उपाधि से स्वयं को पहचानना।  उपाधि का अर्थ है किसी वस्तु को स्वयं पर आरोपित कर लेना। आत्मा मुक्त है नित्य है उस पर देह को आरोपित करके स्वयं को मोटा, पतला, काला, गोरा, स्वस्थ, अस्वस्थ मानने लगते हैं। मन व बुद्धि को आरोपित करके स्वयं को सुखी-दुखी मानने लगते हैं। यदि न भीतर कोई आरोपण हो न बाहर ही, तो जीवन फूल की तरह हल्का व सुगंध बिखेरने वाला बन जाएगा।

Wednesday, November 6, 2019

तोरा मन दर्पण कहलाये



मन दर्पण है, परमात्मा  बिम्ब है, जीव प्रतिबिम्ब है. यदि मन का दर्पण स्वच्छ नहीं है तो प्रतिबिम्ब स्पष्ट नहीं पड़ेगा. संसार भी तब तक निर्दोष नहीं दिखेगा जब तक मन निर्मल नहीं होगा. हम अपने मन के दुर्भाव को जगत पर आरोपित कर देते हैं और व्यर्थ ही अन्यों को दोषी मानते हैं. जब भी हमने किसी की निंदा की है, अपना मत ही थोपा है. जगत जैसा है वैसा है, हम निर्णायक बनते हैं अपनी समझ के अनुसार, हमारी समझ न तो पूर्ण है न ही निर्मल है. यदि भीतर क्रोध है तो वह बाहर आने का मार्ग खोजेगा, यदि भीतर ईर्ष्या है तो वह रास्ता निकल लेगी. हम अन्यों को इसका कारण मानेंगे और एक दुष्चक्र में फंस जायेंगे. हमारी दृष्टि जैसी होगी सृष्टि वैसा ही रूप धर लेगी. यदि मन खाली हो अर्थात उसका कोई मत न हो तो दुनिया जैसी है वैसी ही दिखेगी. इसीलिए सन्त कहते हैं, अहंकार को त्यागे बिना शांति का अनुभव हो नहीं सकता. जब मन किसी भी धारणा, विचार या मान्यता से बंधा न हो तो जल की तरह बहता रहता है और उसमें अंतर की शांति का अनुभव सहज ही होता है .

Thursday, September 6, 2018

टिका रहे उत्साही मन जब


७ सितम्बर २०१८ 
जगत परिवर्तनशील है, मन भी परिवर्तनशील है. सदा सत, रज और तम में डोलता रहता है. प्रारब्ध के अनुसार कभी भीतर सत प्रबल रहता है कभी रज या तम. पुरुषार्थ करके इसे सदा सत में स्थित रखना है, और फिर इसके भी पार निकल जाना है. पुरुषार्थ प्रतिदिन करना होगा, जैसे घर में रोज ही सफाई होती है, तन का नित्य ही स्नान होता है, ऐसे ही मन को सत में टिकने का प्रयास भी सतत करना होता है. मन किस अवस्था में है इसका भान साधक को तत्क्षण हो जाता है, जब भी भीतर असहजता का भान हो, स्वर में हल्की सी भी तल्खी आ जाये, तो समझ में आता है तमस या रजस बढ़ा हुआ है. किसी दिन सुबह नींद से जगने के बाद भी भीतर स्फूर्ति का अनुभव न हो तो भी जानना चाहिए कि तमस की अधिकता है, और अधिक सावधान रहने की आवश्यकता है, वरना कर्मों और संबंधों पर भी इसका प्रभाव पड़ेगा. संबंध दर्पण की तरह हमारे मन का प्रतिबिम्ब प्रस्तुत करते हैं. जिस दिन ऐसा लगे कि मधुरता खो रही है, सजग होकर सत्व में टिकने का प्रयास करना चाहिए. जीवन का सौन्दर्य एक क्षण के लिए भी मिटता नहीं है, बस उसे निहारने वाली चेतना चंचलता या जड़ता से धूमिल हो जाती है.  

Monday, June 18, 2018

तोरा मन दर्पण कहलाये


१८ जून २०१८ 
मन जल की तरह है, तभी तो वह जिस वस्तु में प्रवेश करता है उसी का आकार धारण कर लेता है. मन यदि कठोर हो जाये तो बर्फ जैसा हो जाता है, और क्रोधित हो जाये तो वाष्प जैसा. दोनों ही स्थितियों में वह अपना स्वभाव खो देता है. मन में यदि कोई विकार आ जाये तो भी वह अपनी सहजता खो देता है. जल नीचे की और बहता है, मन यदि अमानी होकर रहे तो स्वभाव में टिका रहेगा, अन्यथा असहज हो जायेगा. सम्मान की कामना ही मन को स्वभाव से दूर कर देती है, जबकि स्वभाव में ही विश्राम है. जल जीवन का प्रतीक है. इसी तरह चेतन सत्ता का जब प्रकृति के साथ संयोग होता है, मन के रूप में ही उसकी उपस्थिति का ज्ञान होता है, अर्थात जीवन की अभिव्यक्ति मन के द्वारा ही होती है. मन को समझ कर जो इसके पार देखने में सक्षम हुआ वही इसे सदा दर्पण की भांति चमकता हुआ देखना चाहता है.

Wednesday, May 23, 2018

छुपा हुआ कोई कण-कण में


२४ मई २०१८ 
यदि हम नजर उठा कर देखें तो प्रतिपल हमारे चारों ओर सौन्दर्य का एक अद्भुत खेल रचा जा रह है. भोर में गगन के बदलते रंग, आकाश के अनंत विस्तार पर रंगीन बदलियाँ, उड़ते हुए पंछी और शीतल पवन किसी अनजान कलाकार की स्मृति दिला देती है. बसंत के मौसम में वृक्षों पर लदे हुए रंगीन पुष्प और बगीचों में सुगंध की बरसात उस अदृश्य शक्तिमान की खबर देती हुई सी लगती है. जैसे चित्र को देखकर उसके चित्रकार के प्रति मन प्रशंसा से भर जाता है बिलकुल उसी तरह, दृश्य को देखकर हमें उसके पीछे छिपे अज्ञात का स्मरण हो आये, इसी में दृश्य की सार्थकता है. भंवरों और पक्षियों के गान को सुनकर भीतर मौन छा जाये जिसमें वह दिव्य प्रकट हो सके तो ही हमने श्रवण शक्ति पायी है. यदि कोई क्षण भर के लिए दर्पण में स्वयं को भी निहारे तो देखने वाले के पीछे छिपा कोई नजर आने लगता है. उस अनजान से जब किसी का परिचय हो जाता है तो जैसे सारा जगत ही उसका मित्र हो जाता है. बुद्ध का मुदिता, मैत्री, करुणा का उपदेश तभी फलित होता है.

Sunday, April 8, 2018

रंगमंच ही है यह दुनिया


उपनिषद और ब्रह्मसूत्र जो कहते हैं, वही सत्य पुराणों में बखान किया गया है. कहानियों और आख्यानों के माध्यम से सत्य को रोचक और मनहर बनाकर प्रस्तुत करने से वह सहज ही ग्राह्य हो गया है. जगत मिथ्या है, ब्रह्म सत्य है, यह बात रामायण द्वारा भी समझायी गयी है और महाभारत द्वारा भी. राम जब लीला करते हैं तो यही सन्देश दे रहे हैं कि हमें जीवन को सहजतापूर्ण ढंग से जीना सीखना है, यहाँ कुछ भी स्थायी नहीं है, इसलिए नाटक की तरह अपनी भूमिका निभाकर जगत से अछूते निकल जाना है. जो जितना अच्छा अभिनय करेगा उसका जीवन उतना ही  रसपूर्ण होगा, और जो जगत को सत्य मानकर हर बात को दिल पर रख लेगा, उसका जीवन भार हो जाएगा। मन यदि दर्पण की तरह हो जिसपर किसी भी घटना का चित्र तो बने पर छाप न पड़े तो हमारा हर पल नया होगा और हर दिन एक कहानी की तरह जीवन अपने पन्ने खोलता हुआ मिलेगा। 

Thursday, February 2, 2017

सुख-दुःख दोनों रचना मन की

२ फरवरी २०१७ 
स्वयं को जाने बिना हम यह उम्मीद करते हैं कि दूसरे हमें जानें, स्वयं को समझे बिना हम दूसरों को समझने की कोशिश करते हैं. दोनों ही बार निराशा ही मिलने वाली है. इस दुनिया में हमें जो कुछ दिखाई दे रहा है वह स्वयं के दर्पण पर प्रतिबिम्बित होकर ही दिखाई दे सकता है. स्वयं में यदि कहीं कोई उलझाव है तो प्रतिबिम्ब भी स्पष्ट नहीं बन सकता. साधना का एकमात्र उद्देश्य यही है कि हम स्वयं को भीतर बाहर अच्छी तरह परख लें. किस बात से हम दुःख बनाते हैं और किस बात से सुख, सुख-दुःख का निर्माता हमारा स्वयं का मन ही है, यह बात जब अनुभव के तौर पर नजर आने लगती है तो तत्क्षण हम दुःख के पार हो जाते हैं. 

Friday, June 19, 2015

यह जगत इक आईना है

फरवरी २०१०
यह जगत एक दर्पण है, इसमें वही झलकता है जो हमारे भीतर होता है, भीतर प्रेम हो, आनंद हो, विश्वास हो तथा शांति हो तो चारों और वही बिखरी मालूम होती है, अन्यथा जगत सूना-सूना लगता है. यहाँ किस पर भरोसा किया जाये ऐसे भाव भीतर उठते हैं, भीतर की नदी सूखी हो तो बाहर भी शुष्कता ही दिखती है, लेकिन भीतर का यह मौसम कब और कैसे बदल जाता है पता ही नहीं चलता. कर्मों का जोर होता है अथवा तो हम सजग नहीं रह पाते. कोई न कोई विकार हमें घेरे रहता है तो हम भीतर के रब से दूर हो जाते हैं, हो नहीं सकते पर ऐसा लगता है, यह लगना भी ठीक है क्योंकि भीतर छिपे संस्कार ऐसे ही वक्त अपना सिर उठाते हैं, पता चलता है कि अहंकार अभी गया नहीं था, कामना अभी भीतर सोयी थी, ईर्ष्या, द्वेष के बिच्छू डंक मारने को तैयार ही बैठे थे. अपना-आप साफ दिखने लगता है.  

Sunday, November 16, 2014

मैं हूँ मंजिल...मैं ही मुसाफिर

अप्रैल २००७ 
सद्गुरु कहते हैं, मैं हूँ मंजिल, मैं ही सफर भी... मैं ही मुसाफिर हूँ..अर्थात हमारा मन व बुद्धि भी उसी आत्मा से निकले हैं, यानि वही हैं, तो जिसे आत्मा तक पहुंचना है वह मन रूपी यात्री भी आत्मा ही है और जिस साधन से वहाँ पहुंचता है वह भी तो उसी एक से ही निकला है. तो सफर भी वही है और लक्ष्य तो वह है ही, कितना सरल व सहज है अध्यात्म का रास्ता न जाने कितना पेचीदा बना दिया है इसे लोगों ने. सीधी सच्ची बात है कि हमारा मन जब अपना स्वार्थ साधना चाहता है, अपनी ख़ुशी चाहता है तो यह आत्मा से दूसरा हो जाता है और जब अपनी नहीं बल्कि समष्टि की ख़ुशी चाहता है, यह जान जाता है कि जगत एक दर्पण है, यहाँ जो हम करते हैं वही प्रतिबिम्बित होकर हमारे पास आता है तो यह खुशियाँ देना प्रारम्भ करता है, जिससे लौटकर वही इसके हिस्से में आती हैं. अहंकार को पोषने से सिवाय दुःख के कुछ हाथ नहीं आता क्योंकि अहंकार हमें अन्यों से पृथक करता है जबकि हम सभी एक ही विशाल सृष्टि के अंग हैं, एक-दूसरे पर आश्रित हैं, स्वतंत्र सत्ता का भ्रम पालने के कारण ही सुख-दुखी होते हैं, हम ससीम मन नहीं असीम आत्मा हैं !


Friday, February 7, 2014

तोरा मन दर्पण कहलाये

जुलाई २००५ 
हमारा मन वास्तव में दर्पण है जो भीतर उठने वाले हर विचार को प्रतिबिम्बित करता है. हमारे अंतः करण का निर्माण प्रतिक्षण होता रहता है, कोई भी घटना जो भीतर घटी हो अथवा बाहर, प्रतिक्रिया जगाती है, यह प्रतिक्रिया राग या द्वेष दोनों में से ही कोई होती है. दोनों ही हमें बांधते हैं, यह जानते हुए भी हम स्वभाव वश प्रतिक्रिया करते हैं, अंतः करण को मैला करते हैं, वही हमारे मन में झलकता है और उसका संस्कार भी भीतर बन जाता है. जो भी घट रहा है उसे साक्षी भाव से देखने पर ही मन शांत रहता है और कोई बीज नहीं पड़ता. जिस व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति के प्रति हम प्रतिक्रिया जगाते हैं अनजाने में हम उसके जैसे होने लगते हैं, अपने पद से नीचे गिर जाते हैं. साधना के पथ पर दो कदम आगे चले नहीं कि तीन कदम पीछे आ गये, तभी तो लक्ष्य दूर ही रहता है. मन में छाई हल्की सी धूमिल रेखा भी साधक को मान्य नहीं, वह प्रतिक्षण सहजावस्था में रहना चाहता है.  

Monday, September 9, 2013

तोरा मन दर्पण कहलाये

फरवरी २००५ 
जगत के साथ जो हमारा व्यवहार है, वह प्रतिबिम्ब है हमारे भीतर के जगत का, लोगों के साथ हमारा सबंध दर्पण के समान है. दूसरों में जो कमियां हमें दिखाई देती है, वास्तव में वे हमारे भीतर होती है, और हम उन्हें निकालना चाहते हैं, पर यदि हम बाहर को ही देखते रहे और यह न देखा कि हमारे व्यवहार का संचालन कौन कर रहा है तो हम स्वयं को नहीं बदल पाएंगे. हमारा आचरण भले ही उसके विपरीत हो पर भीतर का भाव वही रहेगा. ध्यान के समय हम उस गहराई तक पहुंच सकते हैं, और स्वयं को सुझाव देकर परिवर्तन ला सकते हैं. हम अपने पूर्व जीवन को यदि मुडकर देखें तो पाते हैं, मन के अधीन रहकर सदा दुःख ही जाना है, मन की गहराई में समाधान मिलता है, इसी समाधान का अनुभव ही सच्ची आध्यत्मिकता है. प्रभु की शरण में जाकर हम इसे पा सकते हैं.

Saturday, July 20, 2013

ध्यान कमल खिलाएं भीतर

नवम्बर २००४ 
ध्यान करने से पूर्व आवश्यक है कि लक्ष्य का निर्धारण कर लिया जाये, चित्त की शुद्धि के लिए या भक्ति की प्राप्ति के लिए. इससे ध्यान की उर्जा केन्द्रित होगी अन्यथा इधर-उधर बिखर जाएगी. ऊर्जा के सही प्रवाह के लिए रास्ते भी बनाने होंगे अन्यथा बिना नालियों वाले खेत की तरह पानी खेत को ही बर्बाद कर देगा. ध्यान के द्वारा हम अपने मन की गहराइयों में छिपे संस्कारों को बदल सकते हैं. भीतर कोई गाँठ न रहे, हृदय खुलता जाये, पारदर्शी हो जाये, ताकि मनके दर्पण में आत्मा का सूरज चमकने लगे, यही ध्यान से होना है. जीवन से व्यर्थ कब विदा होने लगता है, पता ही नहीं चलता. जो चिर है, शुभ है, सुंदर है वही हमारा अभीष्ट हो जाता है.


Sunday, April 28, 2013

तोरा मन दर्पण कहलाये


  अगस्त २००४ 
हमें अपने भीतर उस प्रज्ञा को जगाना है जो मन को धूमिल न होने दे, जैसे धूल से ढके दर्पण में चित्र स्पष्ट नहीं दिखाई पड़ता वैसे ही अशुद्ध बुद्धि होने पर हम व्यक्तियों, घटनाओं तथा वस्तुओं को उनके सही रूप में नहीं देख पाते, सत्य का भान हमें नहीं होता. सत्य को परखने के लिए हमें उसे कई कोणों से देखना होगा. हम जो भी हैं अथवा हमारे इर्द-गिर्द का संसार, वातावरण जैसा भी है, उसे हमने ही बनाया है. हमारे भूतकाल की छाया हमारे वर्तमान पर पड़ रही है, हमारा वर्तमान ही भविष्य को बनाएगा. समस्त पूर्वाग्रहों को छोड़कर जो बुद्धि निर्णय देती है, जिस पर भूत की छाया न हो, वह शुद्ध है. मन को सारे संकल्पों-विकल्पों से मुक्त रखते हुए हमें वर्तमान का हर पल जीना है. ऐसा होते ही हम परम ऊर्जा से भर जाते हैं, हमारे भीतर सामर्थ्य आता है अंतर्मन को भेदकर भीतर छिपी क्षमताओं को बाहर लाने का. तभी भीतर ज्ञान के मोती निकलेंगे और जब ज्ञान स्थिर होगा वही प्रेम में बदल जायेगा. प्रेम जो हमारे व्यवहार द्वारा अन्यों तक जायेगा, स्वतः जैसे झरना बहता है.

Friday, January 18, 2013

भक्त जहाँ वहीं भगवान


जनवरी २००४ 
भक्त को परमात्मा की निकटता का अनुभव होता है, जैस वह उसकी बात सुन रहे हों और समझ भी रहे हों, जवाब भी दे रहे हों. वह उसके जीवन के हर कार्यकलाप के साक्षी होते हैं, उसे आश्चर्य नहीं होता क्योंकि परमात्मा घट-घट में ऐसा वह जानता है. उसके मन के स्वच्छ दर्पण में जब उनका सौम्य दर्शन होता है तो मन भीग जाता है, नयनों में जल भर आता है. कृष्ण से युगों की दूरी का कोई महत्व नहीं, वह आज भी हैं, आत्मा की अमरता का उपदेश देते हुए, शुद्ध भक्ति का पाठ पढ़ाते हुए, प्रेम के लिए आतुर आत्माओं को असीम प्रेम बांटते हुए. भक्त और भगवान के मध्य प्रेम का यह आदान-प्रदान कितना अद्भुत है. हृदय को जैसे इसी कार्य के लिए रचा गया है !  ऐसा भक्त सहिष्णुता, सामंजस्य, शांतिपूर्ण सह अस्तित्त्व का सहज ही पालन करता है, क्योंकि वह सबमें उसी को देखता है. उसके स्व का विस्तार होता ही चला जाता है.