जैसे एक असत्य को छिपाने के लिए किसी को हजार असत्यों का सहारा लेना पड़ता है, पर एक न एक दिन वह झूठ पकड़ा ही जाता है. मानव स्वयं को झूठमूठ ही देह मानता है फिर इसके इर्दगिर्द सुरक्षा के कितने प्रबन्ध करता है, पर एक न एक दिन आत्मा का पंछी उड़ जाता है. मृत्यु के बाद ही उसे सत्य का भास होता है कि वह देह नहीं था, झूठ पकड़ा जाता है पर तब तक बहुत देर हो चुकी होती है. जैसे मकड़ी स्वयं ही जाल बुनती है और कभी-कभी स्वयं ही उसमें फंस जाती है, मन उन घटनाओं का सृजन करता है जो अभी घटी ही नहीं. कंप जाता है सोच-सोचकर ही. हवामहल बनाता है जिनका अस्तित्त्व ही नहीं, मन अपने ही विचारों के जाल में उलझ जाता है. जिसे चिकित्सक अवसाद कहते हैं. मन यदि जान ले वह मात्र उपकरण है प्रकृति का बनाया हुआ और जब उसकी जरूरत है उसे काम में लेना है, तो व्यर्थ की भाग-दौड़ से बच जायेगा. उहापोह और उधेड़बुन तब कहानियों में लिख शब्द ही रह जायेंगे. मन यदि जान ले कि वह वरदान की ऊर्जा पर पलता है, आत्मा की ऊर्जा से ही वह पल में मीलों तक चलता है तो कभी-कभी शुक्रिया कहने हेतु हाथ तो जोड़ेगा. आँख तो उठाएगा उस ओर और उस क्षण भर के विश्राम में ही उसे प्रेम और आनंद के स्रोत की झलक मिलेगी, जो उसका मूल है.
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Sunday, August 30, 2020
Wednesday, May 23, 2018
छुपा हुआ कोई कण-कण में
२४ मई २०१८
यदि हम नजर उठा कर देखें तो प्रतिपल हमारे चारों ओर सौन्दर्य
का एक अद्भुत खेल रचा जा रह है. भोर में गगन के बदलते रंग, आकाश के अनंत विस्तार
पर रंगीन बदलियाँ, उड़ते हुए पंछी और शीतल पवन किसी अनजान कलाकार की स्मृति दिला
देती है. बसंत के मौसम में वृक्षों पर लदे हुए रंगीन पुष्प और बगीचों में सुगंध की
बरसात उस अदृश्य शक्तिमान की खबर देती हुई सी लगती है. जैसे चित्र को देखकर उसके
चित्रकार के प्रति मन प्रशंसा से भर जाता है बिलकुल उसी तरह, दृश्य को देखकर हमें
उसके पीछे छिपे अज्ञात का स्मरण हो आये, इसी में दृश्य की सार्थकता है. भंवरों और
पक्षियों के गान को सुनकर भीतर मौन छा जाये जिसमें वह दिव्य प्रकट हो सके तो ही हमने
श्रवण शक्ति पायी है. यदि कोई क्षण भर के लिए दर्पण में स्वयं को भी निहारे तो देखने
वाले के पीछे छिपा कोई नजर आने लगता है. उस अनजान से जब किसी का परिचय हो जाता है
तो जैसे सारा जगत ही उसका मित्र हो जाता है. बुद्ध का मुदिता, मैत्री, करुणा का
उपदेश तभी फलित होता है.
Thursday, May 18, 2017
योग सधे जर्रे जर्रे से
१८ मई २०१७
नीले अम्बर में सहज उड़ान भरता पंछी कितना प्रफ्फुलित प्रतीत होता है, अपने पंखों पर जब वह अप्रयास तिरने लगता है तब लगता है कोई अदृश्य सत्ता उसे सहेजे है. उसके पंखों में कितनी ऊर्जा है और उसके उर में कितना उल्लास, इसी तरह कूकते हुए पंछी अपनी मस्ती में न जाने कितने गीत गाते हैं. उनके भीतर संगीत के ये सुर किसी अनजान स्रोत से आते हुए प्रतीत होते हैं. मानव इन सबसे अनजान अपने छोटे-छोटे सुखों-दुखों में खोया हुआ प्रकृति के उस स्पर्श से वंचित ही रह जाता है जो मानवेतर जीवों को सहज ही प्राप्त है. कोई मानव जब स्वयं को कुदरत से एक कर लेता है, विश्व के साथ अभिन्नता का अनुभव कर लेता है तो सारी कायनात उसे अपने साथ नाचती हुई दिखती है. हमारी उर्जा का स्रोत भी अजर हो सकता है बशर्ते हमें उससे जुड़ना आ जाये.
Friday, December 9, 2016
पल भर भी वह दूर नहीं है
१० दिसम्बर २०१६
जहाँ हमें जाना है वहाँ हम पहुँचे ही हुए हैं. जैसे मछली सागर में है, पंछी हवा में है आत्मा परमात्मा में है. मछली को पता नहीं वह सागर में है, पंछी को ज्ञात नहीं वह पवन के बिना नहीं हो सकता, वैसे ही आत्मा को पता नहीं वह शांति के सागर में है. मीन और पंछी को इसे जानने की न जरूरत है न ही साधन हैं उनके पास पर मानव क्योंकि स्वयं को परमात्मा से दूर मान लेता है और उसके पास ज्ञान के साधन हैं, वह इस सत्य को जान सकता है. यही आध्यात्मिकता है, यही धार्मिकता है, यही साधना का लक्ष्य है.
Thursday, February 5, 2015
कोरा कागज है यह मन मेरा
यह सृष्टि कितनी अद्भुत
है, सागर की लहरें, गगन के सितारे, पंछियों के गान, चाँद की चाँदनी सभी जैसे उत्सव
मना रहे हैं ! परमात्मा रसरूप है, उसकी बनाई सृष्टि रस का सागर है ! संसार तो
दर्पण है, हम जैसे हैं वैसा ही हमें उसमें दिखाई पड़ेगा. संसार तो कोरा कागज है हम
जैसा चित्र उस पर बनाएं वैसा ही दिखता है. हम यदि चाहें तो इस पर कुछ न बनाएं कोरा
ही रहने दें तो मोक्ष का द्वार खुल जाता है ! मोक्ष का अर्थ है परम स्वंत्रता !
परम स्वीकार ही परम आजादी है, अमनी भाव है, मन है ही नहीं ! वहीं अखंड आनंद है,
परम दशा है, सुख-दुःख वहाँ है ही नहीं ! जहाँ हम परम ऊर्जा के साथ एक हो जाते हैं
!
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