मुक्ति कौन नहीं चाहता ? मुक्ति पुरानी आदतों से, व्यर्थ के खोखले विश्वासों तथा पूर्वाग्रहों से ! मुक्ति की कल्पना ही मन को पंख लगा देती है. मुक्त हृदय कितना शांत हो सकता है, कितना पवित्र और कितना सामर्थ्यवान. उसमें सब कुछ करने की शक्ति आ जाती है, बंधन मुक्त को दुःख कहाँ? लेकिन सारी सीमाएं, दायरे, बंधन और गुलामी की जंजीरें क्या हमारी खुद की ईजाद की हुई नहीं हैं? आदर्श से आदर्श स्थिति में भी हम अपने हृदय को नीचे गिरा लेते हैं. दुःख की कल्पनाएँ, भविष्य के प्रति आशंका, साथ ही द्वेष, कटुता और इन सबसे बचे भी रहे तो दूसरों को सुधारने का लोभ...यही सब मन को नीचे गिराता है. हम अन्यों से तो अपेक्षाएँ करते हैं पर स्वयं उनकी अपेक्षाओं पर खरे उतरे या नहीं, इसका ध्यान नहीं रखते. इस सुंदर जगत की सुंदरता को नकार कर केवल कमियों पर नजर डालना कहाँ तक उचित है. संसार में रहते हुए भी यदि मन को मुक्त रखना आ जाये तो अंतर्मन से रस का स्रोत कभी सूखेगा नहीं.
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Tuesday, August 25, 2020
Thursday, June 4, 2020
रसो वै स:
जीवन वही सार्थक है जिसमें रस है. शास्त्र कहते हैं परमात्मा रसपूर्ण है, इस रस की जिसे एक झलक भी मिल जाती है उसके भीतर इसे पाने की लालसा जग जाती है. परमात्मा के प्रति यह लगन ही जीवन में रस उत्पन्न करती है. नारद मुनि कहते हैं, योग, कर्म, ज्ञान, भक्ति आदि में भक्ति मुख्य है, क्योंकि शेष सबका लक्ष्य भी भक्ति ही तो है. भक्ति जीवन में पूर्णता का अनुभव कराती है. समपर्ण की घड़ी जब जीवन में आती है तो जीवन रसपूर्ण प्रतीत होता है. ज्ञान का उद्देश्य है भक्ति और कर्म की सफलता है भक्ति. योग की पराकाष्ठा है भक्ति. भक्ति में प्रेम और विरह दोनों का अनुभव जरूरी है. प्रेम ही जीवन का आधार है, लक्ष्य भी और गति भी, विरह जगे तो अभिमान टिक नहीं सकता. भगवान को अभिमानी जरा भी नहीं भाते. जो भक्ति में झुकता है उसे कभी लज्जित होकर झुकना नहीं पड़ता.
Friday, March 8, 2019
खिलकर ही जीवन मिलता है
सत्य समग्रता में मिलता है विश्लेषण में खो जाता है. हम एक फूल
को देखते हैं और उसकी सुन्दरता से मुग्ध हो जाते हैं, उस बीज का हमें स्मरण ही
नहीं आता जिसने इस फूल तक की यात्रा में क्या-क्या सहा है. बीज से फूल बनने को जो
एक क्षण में देख लेता है वही परमात्मा के जगत होने को भी स्वीकार कर सकता है. फूल
कोमल है, सुंदर है, सुगंध से भरा है, अपनी और खींचता है, लुभाता है, बीज में ऐसा
कुछ भी नहीं, कोई विशेषता नहीं कि हम उसे अपने घरों, मंदिरों या केशों में सजाएं. हाँ,
बीज के भीतर अंकुरित होने की शक्ति है जो समुचित आधार पाकर विकसित हो सकती है. ऐसे
ही जगत रंगीन है, अपने रूप, रंग, गंध, स्वाद और स्पर्श से आकर्षित करता है, परमात्मा
निर्विशेष है, उसे आप किसी को दिखा नहीं सकते, वह अदृश्य है. उससे ही सब कुछ हुआ
है. उसके साथ यदि कोई जुड़ जाता है तो सहज ही वह भी विकसित होने लगता है, उसका अहम
गल जाता है और आत्मा का जो बीज भीतर सुप्तावस्था में था, प्रस्फुटित होने लगता है.
Sunday, December 18, 2016
राज अनोखा जिसने जाना
१९दिसम्बर २०१६
जीवन प्रतिपल एक रस बाँट रहा है, ऐसा रस जिसका न कोई ओर है न छोर, जो अपने होने की घोषणा नहीं करता, जो जरा सा भी मुखर नहीं है, जिसे महसूस करने के लिए मन की एक ऐसी सहज अवस्था चाहिए जो सन्तुष्टता से उपजती है. वास्तव में वर्तमान का हर नन्हा सा पल अपने भीतर अनंत तक प्रवेश करने की क्षमता छिपाये है. हम शब्दों के आवरण में इतने ढके हैं कि उस सूक्ष्म द्वार को अनदेखा कर देते हैं. अनजान भविष्य की दुश्चिंताओं के कारण तथा अतीत की स्वप्नवत स्मृतियों के कारण हम वर्तमान में रहते भी कहाँ हैं. हमारे बिना ही जीवन इतना सरस और मधुर हो सकता है, इसका विश्वास भी तो नहीं होता। जिसे यह राज खुल जाता है वही वास्तव में घड़ी-घड़ी उस रस में डूब सकता है.
Thursday, August 27, 2015
वही जीवन का सार है
जो एक रस है, अपार है,
सदा साथ है. जो जागृत है, प्रेममय है, सदा सुख है. जो सहज है, सदा पुकार दे रहा है,
सच्चा मित्र है, वही जीवन में बहार है. जो सदा खुला हुआ द्वार है, सबको समो लेता
है, जिसके बिना जीवन असार है. वही जीवन का आधार है.
Tuesday, May 26, 2015
भक्तिभाव जब उपजेगा
अप्रैल २००९
परमात्मा से बड़ा
परमात्मा का सच्चा भक्त है, परमात्मा तो महान है ही, मानव होकर जो परमात्मा की
ऊंचाई तक पहुंचा हो वह भी तो पुण्यात्मा हो जाता है. भक्ति साधन नहीं है, भक्ति
साध्य है ! मार्ग चाहे कोई भी हो सभी का फल भक्ति है, आनंद की चाह ही भक्ति है,
सुखी होने की कामना ही भक्ति है, ऐसा सुख जो कभी खत्म न हो, जो परमात्मा के समान
अनंत हो ! वह परमात्मा जो मन, बुद्धि से पकड़ में नहीं आता, भक्ति ही उस रस को पा
सकती है. मन के पार जहाँ न मन की चाह है, न अपमान का भय, न दुःख का त्याग है न सुख
की पकड़, वही रस बरसता है, भक्ति महकती है !
Thursday, February 5, 2015
कोरा कागज है यह मन मेरा
यह सृष्टि कितनी अद्भुत
है, सागर की लहरें, गगन के सितारे, पंछियों के गान, चाँद की चाँदनी सभी जैसे उत्सव
मना रहे हैं ! परमात्मा रसरूप है, उसकी बनाई सृष्टि रस का सागर है ! संसार तो
दर्पण है, हम जैसे हैं वैसा ही हमें उसमें दिखाई पड़ेगा. संसार तो कोरा कागज है हम
जैसा चित्र उस पर बनाएं वैसा ही दिखता है. हम यदि चाहें तो इस पर कुछ न बनाएं कोरा
ही रहने दें तो मोक्ष का द्वार खुल जाता है ! मोक्ष का अर्थ है परम स्वंत्रता !
परम स्वीकार ही परम आजादी है, अमनी भाव है, मन है ही नहीं ! वहीं अखंड आनंद है,
परम दशा है, सुख-दुःख वहाँ है ही नहीं ! जहाँ हम परम ऊर्जा के साथ एक हो जाते हैं
!
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स्वतन्त्रता
Monday, January 5, 2015
मिटकर ही जीवन खिलता है
अगस्त २००७
मैं निर्गुणिया गुण
नहीं जाना
एक धनी के हाथ बिकाना
मैं कायर मेरा सद्गुरु
सूरा
मैं ओछा मेरा सद्गुरु
पूरा
मैं मूरख सद्गुरु सयाना
एक धनी के हाथ बिकाना
जब तक साधक अपनी सारी
वृत्तियों को इष्ट के चरणों पर विलीन नहीं कर देता तब तक जीवन में विशेषता नहीं
होती. एक बार अन्न का दाना अंधकार में दब जाता है तो हजार गुना होकर वापस आता है.
समर्पण इसी को कहते हैं, जो वह करवाए वही करना. जो वह चाहे उसी में हाँ मिलानी ही
सच्चा समर्पण है. सद्गुरु को जब साधक समर्पित हो जाते हैं तो जीवन से सारा विषाद
चला जाता है. इसके बाद तो केवल भगवान ही भगवान जीवन में रहते हैं ! नया दृष्टिकोण,
नई विचार धारा, नया जीवन मिलता है ! उसे भीतर से रस मिल जाता है और वह एकाग्र हो
जाता है ! यही एकाग्रता फिर सजगता में बदलती है और सजगता ही ध्यान है, सुरत है,
प्रेम है, भक्ति है, ज्ञान है !
Wednesday, July 23, 2014
अति मीठी है कथा प्रभु की
नवम्बर २००६
भगवद
कथा हमारे मन में जाकर हमें हमारे स्वभाव की ओर लौटा ले जाती है. यह तारक है, रोम-रोम
को रसपूर्ण कर देती है. आनंद की ऐसी वर्षा करती है कि हृदय भीतर तक भीग जाता है. भीतर
जो आनन्द का सृजन करे वह कथा ही तो है, शब्दों के रूप में उसी की प्रतिमा है. कथा
से हमें कितना कुछ मिलता है, ज्ञान, भक्ति, प्रेम, रस, प्रेरणा और जीने को सही ढंग
से जीने की कला भी भगवद कथा सिखाती है.
Tuesday, May 20, 2014
गोपी मनहर सुंदर हरिओम
कृष्ण
रसावतार है, उसका स्मरण होते ही गोपियों का हृदय द्रवित होकर बहने लगता है. उसे वे
प्रेम क्या करें उनका नाम लेते ही भीतर सब कुछ बदलने लगता है. उसका साथ तृप्ति से
भर देता है. भीतर जो पुलक बन कर अंग-प्रत्यंग में स्पन्दित हो रहा है वह अनंत ही
उनकी आराधना का अधिकारी है. वह स्वयं पूर्ण है, पर एकाकी नहीं रहता तभी तो एक से
अनेक हो जाता है, प्रेम का आदान-प्रदान करता है और उनके साथ खेलता है. वह सच्चा
साहिब उन्हें बहुत प्रिय है, गोपियाँ भी क्या किसी से कम हैं, उसका ही एक रूप वे भी
तो हैं.
Tuesday, March 11, 2014
जब भीतर रस धार बहे
सितम्बर २००५
हम वास्तव में कौन हैं ?
कहाँ से आए हैं ? क्यों आए हैं ? हमें क्या करना है ? इन सारे प्रश्नों के उत्तर
यदि किसी को मिल जाएँ तो वह स्वयं के भीतर एक प्रकार के बल का अनुभव करता है. वह
बल यूँ तो सदा से ही उसके पास था पर दिशाविहीन होने के कारण व्यर्थ ही व्यय हो रहा
था. इन सारे प्रश्नों के उत्तरों की खोज का लक्ष्य भी यदि जीवन में हो तो जीवन सरस
बन जाता है. परमात्मा के पास उसी के लिए जाना हो तो भीतर रस का अनुभव किये बिना
नहीं जा सकते, हम तो परमात्मा के पास संसार के लिए ही जाते हैं, जब भीतर सूना
मरुथल है.
Thursday, November 28, 2013
मन ही रचता सुख-दुःख सारे
अप्रैल २००५
सन्त
कहते हैं, भीतर कितनी शांति है, कितना प्रेम और कितना आनन्द.. भीतर आत्मा है,
ईश्वर है और बाहर भी उन्हीं का प्रसार चहूँ ओर हो रहा है. प्रकृति के सुंदर रूप,
झीलें, हिमाच्छादित पर्वत, वनस्पतियाँ, फूल, झरने, शीतल हवाएं, वर्षा, विविध
सुगंधें, और न जाने कितने-कितने अनुपम पदार्थ, मानव, पशु-पक्षी, चाँद, तारे, ग्रह-नक्षत्र
सभी कुछ कितना अद्भुत है. इन सबको रचने वाला स्वयं कितना अद्भुत होगा. सन्त कहते
हैं वह हमारे भीतर है, वह जो मिलकर भी नहीं मिलता, जो बिछड़कर भी नहीं बिछड़ता, जो
दूर भी है और पास भी, जो दीखता भी है और नहीं भी दीखता, जो सदा एक सा है, नित्य
है, शुद्ध है, पूर्ण है, बुद्ध है, जो प्रेम है, रस है, आनन्द है, शांति है, सुख
है पर जिसके जगत में दुःख भी है और पीड़ा भी, असत्य भी, घृणा भी. सभी कुछ उसी से
उपजा है, उसी की लीला है, राम है तो रावण भी है, कृष्ण है तो कंस भी है. इस जगत
में सारे विरोधी भाव हैं, रंग हैं, वरना किसी की महत्ता का भान कैसे होता. मरीज न
हो तो वैद्य का क्या काम, माया न हो तो माया पति का क्या कार्य, पर सन्त कहते हैं
जगत के इन द्वन्द्वों के मध्य रहते–रहते हमें बहुत समय हो गया, सुख-दुःख के चक्र
में फंसकर हम अनेकों बार वही वही कर्म ही करते आए हैं, हमें इनसे ऊपर उठना है, द्वन्द्वातीत
होना है हमें, पर हमारा मन इनसे ऊपर उठना चाहता ही नहीं वह किन्हीं विश्वासों,
पूर्वाग्रहों, मान्यताओं में बंधा स्वयं तो अशांत होता ही है और हम जो उसके इशारों
पर चलते हैं व्यर्थ ही फंस जाते हैं.
Wednesday, August 7, 2013
छिपी है भीतर रस की आकर
दिसम्बर २००४
कृष्ण ने इस धरा पर जो लीला की थी, वह अपने भीतर के रस को
अभिव्यक्त करने के लिए ही तो की थी. हमें भी अपने भीतर के रस को आस-पास बिखराना
है, ध्यान से यह सहज ही होता है. हम प्रेम के रस से ही बने हैं, प्रेम में ही
हमारा विलय होगा. जो हमारे अपने हैं, हितैषी हैं उन्हें तो हमारा प्रेम मिलता ही
है, यह सारा जगत हमारे अंतर की ऊष्मा से वंचित न रहे. हम दाता बनें. जिस परमात्मा
ने हमें सिरजा है वह भी हमसे मात्र प्रेम ही चाहता है. संतजन कहते हैं वह हमें
निरंतर प्रेम भरी नजर से निहार रहा है, जैसे माँ के लिए उसकी सन्तान हो वैसे ही. हर
कोई यहाँ अपनी-अपनी क्षमता से यही तो कर रहा है, कवि, संगीतज्ञ, चित्रकार,
मूर्तिकार अपने भीतर के माधुर्य को उंडेलना चाहते हैं, मानो भीतर कोई सोता बह रहा
है जो अनंत से जुड़ा है.
Friday, August 17, 2012
सदगुरु ज्ञान है
जुलाई २००३
जैसे चन्द्रमा की ओर चकोर देखता है एक निष्ठ होकर, उसी तरह साधक ज्ञान की ओर चित्त
को लगाता है. ज्ञान सारे धोखे हर लेता है, संसार की पोल खुल जाती है. भक्त वही है
जो विभक्त न हो, हम केवल परमात्मा से ही विभक्त नहीं हो सकते, संसार से कितना भी
जुड़ें अलग होना ही पड़ेगा. संसार हर पल बदल रहा है. सदगुरु का ज्ञान हमारे भीतर
बादल बन कर बरसता है, सभी कुछ स्वच्छ करते हुए अंतरात्मा को भिगोता है, भीतर रस
उत्पन्न होता है. अब संसार सत्य प्रतीत नहीं होता है, परमात्मा निकट आ गया है ऐसा
प्रतीत होता है. मन रूपी पक्षी तभी पूर्ण शांति का अनुभव कर सकता है जब वह गुरु
ज्ञान रूपी दानों को चुगे. परमात्मा रूपी खजाना जब भीतर है तो क्यों मन भिक्षु बन
संसार से सुख माँगे, क्यों न उस खजाने को लुटाए.
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