जब मन में मान्यताओं व पूर्व धारणाओं की दीवार गिर जाती है, तब सत्य सम्मुख होता है. उस समय जो क्रिया शक्ति जगती है वह कर्ता विहीन होती है. जैसे हवा बहती है पर कोई बहाता नहीं ! जब शब्दों की आड़ में हम अपने अज्ञान को छिपा लेते हैं तब ज्ञान ही बन्धन बन जाता है. एक निर्विचार स्थिति ऐसी होती है जैसे अचानक घोर अँधेरे में कोई बिजली कौंध जाये, उस एक क्षण में सब कुछ एक साथ दिखाई पड़ता है. उसी में टिके रहने की कला ध्यान है. उस अखण्ड शांति का स्पर्श मन व बुद्धि की चंचलता को मिटाता है, उन्हें शुद्ध करता है. वही भीतरी संगम है, वही कैलाश है और वही अमृत का कुंभ है. इस योग से एक ऐसी सजगता का जन्म होता है, जो बस अपने आप में है, वह किसी वस्तु विशेष के प्रति नहीं है. इस तरह साधक का मन जिस खालीपन का अनुभव करता है उसमें कोई बोझ नहीं रहता.
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Sunday, November 29, 2020
Thursday, October 3, 2019
मौन से ही वह द्वार खुलेगा
संत कहते हैं, शब्दों का इतना ही
कार्य है कि भीतर मौन को उत्पन्न कर दे. मौन लक्ष्य है, शब्द साधन हैं. जैसे यदि कोई
व्यक्ति एक प्रश्न पूछता है, फिर जवाब की प्रतीक्षा में रुक जाता है, उस क्षण भीतर
मौन है. जवाब देने वाला व्यक्ति शब्दों के माध्यम से ही उत्तर देता है, पर सुनने
वाला यदि उत्तर से संतुष्ट नहीं होता, तो भीतर एक अन्य प्रश्न का जन्म होता है,
मौन खंडित हो जाता है. यदि उत्तर उसे स्वीकार्य है तो फिर एक क्षण के लिए मौन का
अनुभव उसे हो सकता है. मौन का यह क्षण इतना छोटा होता है कि हम उसे चूक ही जाते हैं.
उस मौन से ही अस्तित्त्व का द्वार खुलता है. शास्त्रों का प्रयोजन इतना ही है कि
हमें भीतर के उस मौन से परिचित करा दे, विचार का जन्म किसी न किसी इच्छा के कारण
होता है, इसीलिए मन से इच्छाओं के त्याग पर इतना जोर दिया गया है. भीतर जब मौन
होता है, तब मन खो जाता है, चेतना केवल अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित रहती है.
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अस्तित्त्व,
इच्छा,
चेतना,
डायरी के पन्नों से,
मौन,
शब्द
Sunday, July 28, 2019
गुरू की महिमा कौन बखाने
शब्द
अधूरे हैं, अल्प सामर्थ्य है शब्दों में. भाव गहरे हैं, अनंत ऊर्जा है भावों में, किंतु गुरू
के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करनी हो तो भाव भी कम पड़ जाते हैं. वहाँ तो मौन ही शेष
रहता है. जब उसके हृदय से साधक का हृदय जुड़ जाता है तो मौन में ही संवाद घटता
है. गुरू के शब्द और कर्म प्रेम से ही उपजे हैं. वह नित जागृत है, करुणा, प्रेम और
जीवन के प्रति उत्साह के भाव उसके हृदय में लबालब भरे हैं. उसका ज्ञान एक पवित्र
जल धारा की तरह साधकों के मनों को तरोताजा कर देता है. उसके हृदय का वृक्ष शांति,
सुख और आनंद के फलों से लदा है, जो वह बेशर्त प्रदान करता है. उसकी आँखों में
प्रेम की मस्ती है, आत्मा में बेशकीमती खजाना है, जो वह लुटा रहा है. वह साधकों के
अंतर में साधना का बीज बोता है, जो भी व्यर्थ है उसे उखाड़ फेंकने के लिए प्रेरित
करता है, जो भी अच्छा है, उसे बाड़ लगाकर सहेजने के लिए कहता है. उसके भीतर से
जो स्वर्गिक संगीत निकलता है, उसे सुनकर साधक जीवन के सुन्दरतम रूप को देखते हैं.
उसकी आत्मा के प्रकाश में भीग कर उनमें भी भीतर जाने की ललक जगती है, पावों में
पंख लग जाते हैं, मन जीवन के प्रति तीव्र चाह से भर उठता है.
Monday, July 9, 2018
सृजनशील जब मन हो जाये
९ जुलाई २०१८
जीवन ऊर्जा हर क्षण बंट रही है.
कहीं नक्षत्रों का निर्माण हो रहा है तो कहीं पुष्पों का सृजन. इस धरती पर हर क्षण
कितना कुछ नया बन रह है और पुराना विनष्ट हो रहा है. मानव मन में भी असंख्य विचारों
का सृजन होता है, विशाल पुस्तकालय उन विचारों की ही देन हैं. जाने-अनजाने हम सभी सृष्टिकर्ता
के इस कार्य में उसके सहायक बन जाते हैं. उसने मानव को ही नित नूतन सृजन की क्षमता दी है. मन की गहराई में न जाने कहाँ से किसी
कवि और लेखक के भीतर भावनाओं और विचारों का जखीरा चला आता है, जिसे वह रचना के रूप में बाहर
उलीच देता है. भाषा और व्याकरण का सीमित ज्ञान ही इसका कारण है ऐसा नहीं लगता, अवश्य
ही उसका मन किसी अनंत स्रोत से जुड़ा है, जो ताजे कूप की तरह सदा भरा रहता है. कभी
ऐसा भी देखा गया है जिस भाषा का इस जन्म में अध्ययन ही नहीं किया, किन्हीं पलों
में उसके शब्द भी भीतर से फूटने लगते हैं. तब विश्वास हो जाता है, यह यात्रा सिर्फ
इसी जन्म की तो नहीं है.
Saturday, June 9, 2018
जीवन जब उपहार बनेगा
९ जून २०१८
जीवन हमारे चारों और बिखरा है, हमारे भीतर है, रग-रग में बह रहा है, फिर भी हमारी
उससे मुलाकात नहीं होती. जीवन प्रतिपल बरस रहा है, लेकिन हमारे अंतर में कोई रसधार
बहती नजर नहीं आती. ध्यान करने बैठें तो विचारों की एक भीड़ चली आती है. शब्दों का
ऐसा जाल हमें भीतर जकड़ लेता है कि कहीं आत्मा के दर्शन नहीं होते. संत कहते हैं,
यह जगत पूर्ण से उपजा है, अपने आप में पूर्ण है और इसका हर अंश पूर्ण है. हमें
संदेह भी नहीं होता कि अपूर्णता का दर्शन केवल मन की कल्पना ही तो नहीं.
नकारात्मकता पर हमें पूरा विश्वास है और सकारात्मकता पर संदेह. जीवन विधेय का प्रतीक
है और उसी को मिलता है जो पूरे स्वीकार भाव में टिक जाता है. जीवन में जिस क्षण भी
हमारे भीतर द्वंद्व समाप्त हो जाता है, हम उसमें स्थित हो जाते हैं,
Wednesday, January 25, 2017
सबका मंगल होए रे
२५ जनवरी २०१७
हम जीवन में कितने ही व्यक्तियों से मिलते हैं. जिनमें कुछ के साथ थोड़े समय के लिए कुछ के साथ देर तक हम समय बिताते हैं. विचारों का आदान-प्रदान भी होता है और वस्तुओं का भी. इससे भी सूक्ष्म एक शै है जिसका आदान-प्रदान निरंतर चलता रहता है, चाहे वह व्यक्ति सम्मुख हो या हम उसके बारे में किसी से बात कर रहे हों, या उसके बारे में कुछ सोच रहे हों. किसी के प्रति हमारी भावना केवल हम तक सीमित नहीं रह पाती, वह तत्क्षण उस तक पहुँच जाती है. स्थूल से सूक्ष्म अति शक्तिशाली है. हम शब्दों का ध्यान रख लेते हैं और भीतर क्रोध रखते हुए भी बाहर से जाहिर नहीं करते, कभी-कभी इसका विपरीत भी हो सकता है. कोई भीतर प्रेम होते हुए भी बाहर से उदासीनता व्यक्त करे, पर दोनों ही स्थितियों में सूक्ष्म तरंगों के द्वारा हमारी वास्तविक भावनाएं उसके अंतरतम तक पहुँच जाती हैं, और भविष्य में उसका व्यवहार उनसे भी प्रभावित होगा. इसीलिए संत कहते हैं सदा हृदय से सबके लिए मंगल कामना करते रहें.
Sunday, December 18, 2016
राज अनोखा जिसने जाना
१९दिसम्बर २०१६
जीवन प्रतिपल एक रस बाँट रहा है, ऐसा रस जिसका न कोई ओर है न छोर, जो अपने होने की घोषणा नहीं करता, जो जरा सा भी मुखर नहीं है, जिसे महसूस करने के लिए मन की एक ऐसी सहज अवस्था चाहिए जो सन्तुष्टता से उपजती है. वास्तव में वर्तमान का हर नन्हा सा पल अपने भीतर अनंत तक प्रवेश करने की क्षमता छिपाये है. हम शब्दों के आवरण में इतने ढके हैं कि उस सूक्ष्म द्वार को अनदेखा कर देते हैं. अनजान भविष्य की दुश्चिंताओं के कारण तथा अतीत की स्वप्नवत स्मृतियों के कारण हम वर्तमान में रहते भी कहाँ हैं. हमारे बिना ही जीवन इतना सरस और मधुर हो सकता है, इसका विश्वास भी तो नहीं होता। जिसे यह राज खुल जाता है वही वास्तव में घड़ी-घड़ी उस रस में डूब सकता है.
Saturday, November 15, 2014
प्रेम गली अति सांकरी
अप्रैल २००७
संत कहते हैं हम लाख चाहें,
शब्दों से अपनी बात समझा नहीं सकते, जो काम मौन कर देता है वह शब्द नहीं कर पाते. हम
अपने व्यवहार से, भीतर छिपी करुणा से किसी हद तक अपने विरोधी को भी प्रभावित कर
सकते हैं. भीतर जो प्रतीक्षा है उसी में सारा रहस्य छिपा है. आतुरता, प्यास यही
साधना की पहली शर्त है. ज्ञान को जितना भी पढ़ें, सुनें, गुनें, तृप्ति नहीं मिलती.
वह परमात्मा कितना ही मिल जाये ऐसा लगे कि मिल तो गया है फिर भी मिलन की आस जगी
रहती है. प्रेम में संयोग और वियोग साथ-साथ चलते हैं. इसलिए भक्त कभी हँसता है कभी
रोता है, वह ईश्वर को अभिन्न महसूस करता है पर तृप्त नहीं होता, फिर उसे सामने
बिठाकर पूछता है, पर दो के बीच की दूरी भी उसे सहन नहीं होती. वह स्वयं मिट जाता
है केवल ईश्वर ही रह जाता है. ज्ञानी भी एक है, और कर्मयोगी के लिए यह सारा जगत
उसी एक का स्वरूप है. एक का अनुभव ही अध्यात्म की पराकाष्ठा है.
Wednesday, July 23, 2014
अति मीठी है कथा प्रभु की
नवम्बर २००६
भगवद
कथा हमारे मन में जाकर हमें हमारे स्वभाव की ओर लौटा ले जाती है. यह तारक है, रोम-रोम
को रसपूर्ण कर देती है. आनंद की ऐसी वर्षा करती है कि हृदय भीतर तक भीग जाता है. भीतर
जो आनन्द का सृजन करे वह कथा ही तो है, शब्दों के रूप में उसी की प्रतिमा है. कथा
से हमें कितना कुछ मिलता है, ज्ञान, भक्ति, प्रेम, रस, प्रेरणा और जीने को सही ढंग
से जीने की कला भी भगवद कथा सिखाती है.
Tuesday, July 1, 2014
पानी बिच मीन प्यासी
अगस्त २००६
ध्यान में
जो नीरवता भीतर प्रकट होती है, वह अतीव मधुर है. वह शब्दों से परे है. यह जगत भी
तभी सुंदर लगता है जब अंतर शांत हो. हमारी चेतना इतनी भव्यता छिपाए है कि उसे
शब्दों में कहा ही नहीं जा सकता. यह प्रकृति कितने रूप धर कर हमें लुभाती है.
सौन्दर्य जो बाहर है, वह उत्पन्न हुआ है, जो भीतर है वह तो सहज है, स्वनिर्मित है.
जब तक कोई इस सौन्दर्य को जान नहीं लेता है तब तक प्रेम को पहचान नहीं पाता. प्रेम
का अनुभव किये बिना ही उसे इस जगत से जाना पड़ता है, वह प्यासा ही रह जाता है, जगत
से सुख पाने की इच्छा उसे दूसरों का गुलाम बना देती है.
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