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Wednesday, March 8, 2023

द्वंद्वों के जो पार हो गया

जीवन में सत्य के प्रति निष्ठा जगे तभी हमारा जीवन स्फटिक की भाँति निर्मल होगा। हमारे वचनों, कृत्यों और भावों में समानता है तभी हम सत्य के अधिकारी बन सकते हैं। यदि कथनी व करनी में अंतर होगा तो हम अपनी ही दृष्टि में खड़े नहीं रह पाएँगे। यदि मन में प्रेम हो और वचनों में कठोरता तो जीवन एक संघर्ष बन जाता है। यदि मन में उदारता हो और व्यवहार में कृपणता हो तो भी हम सच्चे साधक नहीं कहला सकते। मन, बुद्धि व संस्कार जब एक ही तत्व से जुड़कर एक ही का आश्रय लेते हैं, तब जीवन में निष्ठा का जन्म होता है। श्रद्धा का अर्थ भी यही है कि भीतर द्वंद्व न रहे, हम जो सोचें वही कहें , जो कहें वही करें। जब भीतर एकत्व सध जाता है, तब बाहर भी व्यवहार अपने आप सहज होने लगता है। हम सत्य के पुजारी बनें, अद्वैत को अपने जीवन में उतारें, इसके लिए भीतर एकनिष्ठ होना बहुत ज़रूरी है। 


Thursday, February 2, 2023

कौन देश के वासी हैं हम

धर्म के मूल में तीन बाते हैं, हम कहाँ से आये हैं, हम कहाँ हैं और कहाँ जाने वाले हैं? इनकी खोज ही हमें धर्म की ओर ले जाती है. संतों की वाणी सुनकर हमारे भीतर अपनी वास्तविक स्थिति का बोध जगता है. जिस क्षण कोई अपने सामने पहली दफा खड़ा हो जाता है, आमने-सामने..उसी क्षण वह सत्य को जान जाता है. उस क्षण उसके भीतर संसार से ऊपर उठने, जगने और व्यर्थ कामनाओं से मुक्त होने की चाह जगती है. वास्तव में हम उसी एक तत्व से आये हैं, उसी में हैं और उसी में लौट जाने वाले हैं. लेकिन लौटने से पूर्व हमें देखना है कि भीतर सुई की नोक के बराबर भी द्वंद्व  न बचे, उसका मार्ग बहुत संकरा है, उसमें से एक गुजर सकता है। दुई मिटते ही सारा अस्तित्व हमारी सहायता को आ जाता है, आया ही हुआ है. बाहर से संत, शास्त्र व भीतर से दैवीय प्रेरणा मिलने लगती है और हम उसकी ओर बढ़ते चले जाते हैं. जहां वह है वहाँ सभी ऐश्वर्य हैं। वह हितैषी है, अकारण दयालु है, वह ही तो है जिसने यह खेल रचा है. अंतत: वह स्वयं ही तो इस सीमित जगत के रूप में दिखायी दे रहा है। जबकि वास्तव में वह अलिप्त है और अनंत है। 


Monday, July 4, 2022

रस की धार बहे जब उर में

मन द्वंद्व का ही दूसरा नाम है। देह जड़ है, वह जैसी है वैसी ही प्रतीत भी होती है। देह स्वयं को स्वस्थ रखने का उपाय भी जानती है यदि हम उसे उसकी सहज, स्वाभाविक स्थिति में रहने दें। किंतु मन में लोभ है, जो अनावश्यक पदार्थों से तन को भरने पर विवश करता है। क्रोध में हानिकारक रसायनों को तन में छोड़ता है।  योग, व्यायाम व प्राणायाम के द्वारा तन व मन दोनों को स्वस्थ किया जा सकता है पर मन इसे भी अभिमान का विषय बना लेता है। हम आत्मा के आकाश में उड़ना तो चाहते हैं पर विकारों  की ज़ंजीरें पैरों में बांधे रहते हैं, यह दोहरापन ही द्वंद्व है जो मानव को चैन से नहीं रहने देता। लगता है वह दोनों पाँव धरा में धँसाए है और दोनों हाथ ऊपर उठकर परमात्मा को पुकारता है। जब तक वह अपनी पकड़ नहीं छोड़ता परमात्मा का सान्निध्य मिले भी तो कैसे ? मन के गहरे गह्वर को रूखा-सूखा दर्शन नहीं भर पाता, इसे तो केवल भक्ति के रस ही भरा जा सकता है. ईश्वर के प्रति अटूट, एकांतिक प्रेम ही हमारे मन को विश्राम देता है और रस की ऐसी धार बहाता है, जो उत्साह और उमंग के फूल खिलाती है. जीवन में उत्साह हो, सृजन की क्षमता हो, अनंत आनंद हो, बेशर्त प्रेम हो और कृतज्ञता हो तो तृप्ति की वर्षा होती ही है. परमात्मा के प्रति प्रेम एक निधि है. भक्ति योग से बढ़कर कुछ नहीं. 


Tuesday, October 20, 2020

शक्ति की जो करे साधना

 मन द्वंद्व का ही दूसरा नाम है. यह जगत ही दो से बना है और मन भी इसी जगत का हिस्सा है. यहाँ सुख के साथ दुःख  है और दिन के साथ रात है. हम दिन को भी स्वीकारते हैं और रात को भी. किन्तु सुख के साथ दुःख को नहीं स्वीकारते. दिन और रात को हम बाहर की घटना मानते हैं और सुख-दुःख को मन के भीतर की, बाहर पर हमारा कोई बस नहीं वह प्रकृति से संचालित है पर हमें लगता है भीतर पर हमारा बस चल सकता है. हम दुःख को अस्वीकारते हैं और इसी कारण कभी भी उससे छुटकारा नहीं मिल पाता। यदि दुःख को भी सहजता से स्वीकार लें तो वह टिकने वाला नहीं है. उससे बचने की प्रक्रिया में हम उसकी अवधि को बढ़ा देते हैं और उसकी तीव्रता को भी. इसी तरह मन में प्रेम भी है और क्रोध भी, हम प्रेम को अच्छा मानते हैं और क्रोध से छुटकारा पाना चाहते हैं. क्रोध को दबाते हैं या क्रोध आने पर स्वयं को दोषी मान लेते हैं. मन की जिस शक्ति से हम क्रोध को दबाते हैं और जिस विचार के द्वारा मन को क्रोध न करने के लिए समझाते हैं या आत्मग्लानि से भर जाते हैं, वह भी तो उसी मन का हिस्सा है जो क्रोध को उत्पन्न कर रहा है. यह तो ऐसी ही बात हो गयी जैसे कोई अपने दाएं हाथ को बाएं हाथ से रोके. जब तक भीतर यह समझ नहीं जागती कि सकारात्मक या नकारात्मक दोनों ही भावनाएं एक ही शक्ति से उपजती हैं, हम उनके पार नहीं जा सकते. ध्यान के द्वारा यही समझ विकसित होती है, शक्ति की आराधना से भी हम उस शक्ति का अनुभव कर लेते हैं और फिर जो भावना जब जगाना चाहें ,जगा सकते हैं. 


Sunday, July 15, 2018

निर्मल बोध जगे जब भीतर


१६ जुलाई २०१८ 
मन के भीतर चल रहे द्वंद्व को हम जितना-जितना मिटाने का प्रयत्न करते हैं, उतना ही उसे पोषित करते चले जाते हैं. हमारा ध्यान जहाँ भी होगा, ऊर्जा उधर ही बहेगी और उस स्थिति को समाप्त करने के बजाय उसे और भी बढ़ाएगी. इससे तो बेहतर होता कि हम प्रार्थना में बैठ जाते, अथवा ध्यान स्वयं की तरफ ले जाते, निज स्वरूप में ही शांति का अनुभव किया जा सकता है. मन की दुविधा को मन भला कैसे शांत कर सकता है, कोई अपनी ही बनाई हुई मूर्ति को जिस तरह नहीं तोड़ना चाहता, वैसे ही मन स्वयं के बनाये हुए मनोराज्य को ध्वंस नहीं कर सकता. उसे तो बोध के द्वारा ही समझाया जा सकता है. भीतर के मौन में टिक कर ही उस शांत अवस्था का अनुभव किया जा सकता है जहाँ कोई द्वंद्व नहीं है. परमात्मा से प्रार्थना, उसकी स्तुति, और उपासना के द्वारा हम इस निर्मल बोध को अनुभव कर सकते हैं.  

Saturday, June 9, 2018

जीवन जब उपहार बनेगा


९ जून २०१८ 
जीवन हमारे चारों और बिखरा है, हमारे भीतर है, रग-रग में बह रहा है, फिर भी हमारी उससे मुलाकात नहीं होती. जीवन प्रतिपल बरस रहा है, लेकिन हमारे अंतर में कोई रसधार बहती नजर नहीं आती. ध्यान करने बैठें तो विचारों की एक भीड़ चली आती है. शब्दों का ऐसा जाल हमें भीतर जकड़ लेता है कि कहीं आत्मा के दर्शन नहीं होते. संत कहते हैं, यह जगत पूर्ण से उपजा है, अपने आप में पूर्ण है और इसका हर अंश पूर्ण है. हमें संदेह भी नहीं होता कि अपूर्णता का दर्शन केवल मन की कल्पना ही तो नहीं. नकारात्मकता पर हमें पूरा विश्वास है और सकारात्मकता पर संदेह. जीवन विधेय का प्रतीक है और उसी को मिलता है जो पूरे स्वीकार भाव में टिक जाता है. जीवन में जिस क्षण भी हमारे भीतर द्वंद्व समाप्त हो जाता है, हम उसमें स्थित हो जाते हैं,


Thursday, February 1, 2018

दो के पार ही जाना हमको

२ फरवरी २०१८ 
जीवन द्वंद्वों से बना है. यहाँ जो वस्तुएं, घटनाएँ, गुण तथा मूल्य एक दूसरे के विपरीत दिखाई पड़ते हैं, वे विपरीत न होकर एक दूसरे के पूरक हैं. दिन के बिना रात नहीं होती, सुख के साथ दुःख लगा ही है. मित्रता और शत्रुता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. जो हमारे प्रिय पात्र हैं वे ही कल अप्रिय भी लग सकते हैं. एक का अस्तित्व दूसरे पर ही टिका है. बीमारी न हो तो स्वास्थ्य की कीमत कौन जानेगा. अशांति न हो तो शांति की चाह किसे होगी. संत जगत की इस व्यवस्था को जानकर उनसे ऊपर उठ जाते हैं. जहाँ दो नहीं हैं विश्राम वहीं है. 

Monday, March 6, 2017

बनें साक्षी हर द्वंद्व के

७ मार्च २०१७ 
जीवन द्वंद्वों से गुंथा है, दिन-रात, सुबह-शाम, धरा-आकाश, स्वर्ग-नर्क, सुख-दुःख, अपना-पराया कितने सारे जोड़े हैं जिनसे हम प्रतिदिन दो-चार होते हैं. हमारी कठिनाई यही है कि हम सुख चाहते हैं, दुःख नहीं, स्वर्ग के गीत गाते हैं नर्क से मुँह फेरते हैं, अपनों के लिए आँखें  बिछाते हैं, पराये से कोई मतलब नहीं, पर जीवन ऐसा होने नहीं देता, वह सदा जोड़ों में ही मिलता है. हर सुख की कीमत दुःख के रूप में देर-सवेर चुकानी ही है. स्वर्ग का मार्ग नर्क से होकर ही गुजरता है. कोई अपना कब पराया बन जायेगा पता ही नहीं चलता. क्या  इसका अर्थ हुआ कि जीवन हमें छल रहा है ? नहीं, जीवन हमें द्वन्द्व से पार जाने का  एक अवसर दे रहा है, क्योंकि  उसके पार ही ही है वह महाजीवन जिसे कोई परमात्मा कहता है कोई, खुदा ! जब तक हम सुख-दुःख, गर्मी-सर्दी के साक्षी बनकर उनसे प्रभावित होना त्याग नहीं देते, सहज आनंद की धारा में, जो अनवरत अस्तित्त्व बहा रहा है भीगने से हम वंचित ही रह जाते हैं.

Thursday, March 14, 2013

बुद्धं शरणम गच्छामि


भगवान बुद्ध के चार आर्य सत्य हैं- “संसार में दुःख है, दुःख का कारण है, कारण का निवारण है, एक अवस्था ऐसी है जहाँ कोई दुःख नहीं है”. यदि कोई संवेदनशील है तो पहले सत्य का अनुभव कर  सकता है, दुःख का तो सबको पता है पर जिन बातों को हम सुख मानते हैं उनका अंत भी दुःख में होता है, यह वह स्पष्ट देख पाता है, क्योंकि संसार द्वन्द्व के नियम से ही चलता है. विपासना ध्यान में हम अपने भीतर उतरते हैं, शरीर को देखते हैं, श्वास-प्रश्वास को देखते हैं. देखते-देखते मन की सच्चाईयों को देखने लगते हैं. मन विकार जगाता है, फिर दुःख होता है, जब विकार को त्यागता है तब शांत हो जाता है. जहाँ से विकार जगते हैं यदि हम उस मूल तक पहुंच जाएँ, कौन है हमारे भीतर, जो विकार जगाता है, क्या वह सत्य है, क्योंकि आत्मा तो स्वयंपूर्ण है, उसे जगत से क्या चाहिए, सत्य वही है, तो जो असत है वही विकार जगाता है, भीतर जाकर पता चलता है, वास्तव में वह है ही नहीं, मात्र प्रतीत होता है. 

Wednesday, January 16, 2013

प्रेम से प्रकट होए मैं जाना...


जनवरी २००४ 
हमारी जीवन शैली हिंसात्मक है या अहिंसात्मक इसका पता हमें दो-तीन बातों से लग जाता है, हम स्वतंत्रता का अनुभव करते हैं या परतंत्रता का, सापेक्षता का अथवा निरपेक्षता का, अशांति का अथवा शांति का. हमारा मन यदि क्षोभ से भर जाता है तो हम हिंसा के शिकार हैं, हम विरोध करते हैं, द्वंद्व का शिकार होते हैं तो भी हिंसा अपना कार्य कर रही है, हम असंवेदनशील हो रहे हैं, क्षमा नहीं कर  पाते तो हिंसा ही है. यही वह सूक्ष्म पर्दा है जो हम परमात्मा से अलग करता है. हम उसके प्रति प्रेम तो अनुभव करते हैं पर स्थिर नहीं रख पाते क्योंकि अब तक मन विरोध के भाव में आ चुका है. प्रेम में कोई विरोध नहीं होता, प्रेम सभी कुछ स्वीकारता है, अच्छा-बुरा सभी कुछ, विष-अमृत सभी कुछ !  

Wednesday, January 9, 2013

शांति है जहां प्रगति है वहाँ


जनवरी २००४ 
शान्ति पूर्वक सहअस्तित्त्व हमारी पहली आवश्यकता है, तभी किसी भी तरह का विकास सम्भव है. अहिंसा का अर्थ केवल शारीरिक हिंसा से बचना ही नहीं है, बल्कि हमें इसके सूक्ष्म स्वरूप को भी जानना होगा. क्रोध का कोई भी रूप हिंसा है, द्वंद्व भी हिंसा है, द्वन्द्वातीत हुए बिना मन शांत नहीं हो सकता. अहिंसा का प्रारम्भ सर्वप्रथम घर से होता है, आज समाज के बदले हुए वातावरण में घरेलू हिंसा का शिकार वृद्ध, महिलाएं, बच्चे, अशक्त सभी किसी न किसी रूप में हो रहे हैं, आये दिन जो समाचार तथा आंकड़े मिलते हैं, उन्हें देखकर आश्चर्य होता है कि क्या हम एक सभ्य समाज के नागरिक हैं? धर्म जब तक जीवन का एक मह्त्वपूर्ण अंग नहीं बन जाता, आचरण में नहीं उतरता, परिवर्तन नहीं होगा. घरों में नियमित संध्या, ध्यान तथा सद्ग्रन्थों का पाठ होता रहे तो बच्चों को संस्कार मिलते रहते हैं. आज पीढियों का अंतर बढ़ता जा रहा है इसे दूर करने का सबसे सुंदर उपाय है धर्म तथा अध्यात्म, जहां किसी भी तरह का कोई भेद नही होता.  

Thursday, May 3, 2012

अपार है विस्तार....


जब छोटा मन पिघल जाता है, बह जाता है, न-मन हो जाता है, तब भीतर रस का स्रोत फूट पड़ता है, तब जो बचता है वही बड़ा मन है, गुरु तत्व है. वही हमारा वास्तविक घर है, जहाँ हम तुष्टि-पुष्टि पाते हैं. मन जब विचारों के प्रवाह से मुक्त होता है, भाव जगते हैं, कोमलता का अहसास होता है, संवेदनशीलता बढ़ती है, तब छोटा मन जो स्वयं को पृथक समझता है, खो जाता है. विशाल मन सारी समष्टि को अपना मानता है. इस तरह सभी एक ही धागे में पिरोये मोती की तरह प्रिय लगते हैं. तब हम हजार मुख वाले, हजार हाथों वाले, हजार पैरों वाले हो जाते हैं. हमारा अंतर्मन इतना खाली हो जाता है कि जगत के ताप उसको सताते नहीं. वह द्वंद्वात्मक नहीं रहता कर्तृत्व की कामना शांत हो जाती है, फल की तो कामना रहती नहीं. यह जगत एक क्रीड़ा स्थल प्रतीत होता है. इसका विस्तार विस्मय को जन्म देता है और श्रद्धा को भी.