यह सृष्टि तीन गुणों से संचालित होती है। जब तीनों गुण साम्यावस्था में आ जाते हैं तब सृष्टि अव्यक्त हो जाती है। हमारे भीतर भी ये तीन गुण हर क्षण अपना कार्य करते रहते हैं। जब सत गुण की प्रधानता होती है, मन के भीतर हल्कापन, स्पष्टता व सहज आनंद की अनुभूति होती है। रजोगुण हमें क्रियाशील बनाता है, इसकी अधिकता मन के चंचल व अस्थिर होने का कारण है। तमोगुण प्रमाद, आलस्य, निद्रा को लाता है। तीनों गुणों के सामंजस्य से जीवन भली भाँति चलता है। यदि प्रातः काल सतो गुण प्रधान हो, दिन में रजो तथा रात्रि के आगमन के साथ तमो गुण बढ़ जाये तो साधना, कर्म व विश्राम तीनों होते रहेंगे और स्वास्थ्य बना रहेगा। दिन में तमो गुण बढ़ने से कार्य नहीं होगा, रात्रि में रजो बढ़ जाए तो नींद नहीं आएगी। इन गुणों का आपसी ताल-मेल सधना योग का फल है। योग साधना क्रियाशील होने के साथ-साथ हमें पूर्ण विश्राम करना भी सिखाती है। साक्षी की अवस्था में आत्मा इन तीनों गुणों के पार चला जाता है, वह इनसे प्रभावित नहीं होता। वह परम विश्राम की अवस्था है जिससे लौटकर बुद्धि प्रज्ञावान हो जाती है, जिसे कृष्ण स्थितप्रज्ञ कहते हैं।
Tuesday, January 10, 2023
Thursday, April 22, 2021
तन, मन में जब एक्य सधेगा
देह और मन एक-दूसरे के विरोधी जान पड़ते हैं , देह को विश्राम चाहिए और मन विचारों की रेल चला देता है, नींद गायब हो जाती है. देह को काम करना है, व्यायाम करना है, मन आलस्य का तीर छोड़ देता है, कल से करेंगे, कहकर टाल जाता है. इसी तरह मन जब विश्राम चाहता है, ध्यान के लिए बैठता है तो देह साथ नहीं देती, यहाँ-वहाँ दर्द होता है और अदृश्य चीटियां काटने लगती हैं. मन जब अध्ययन के लिए बैठना है तो देह थकान का बहाना बनाती है. देह को भूख नहीं है पर स्वादिष्ट भोजन देखकर मन नहीं भरता. मन ऊर्जा है, अग्नि तत्व से बना है. देह में पृथ्वी, जल दोनों तत्व हैं और आग व पानी तो वैसे भी एक-दूसरे के विरोधी हैं. यदि देह व मन में समझौता हो जाये, एकत्व हो जाये, समन्वय हो जाये तो वे अग्नि और जल से मिलकर बनी भाप की तरह कितनी ऊर्जा को जन्म दे सकते हैं. देह भौतिक है, मन आध्यात्मिक, यदि दोनों में सामंजस्य हो जाये तो जीवन में एक नया ही आयाम प्रकट होता है. ऐसा होने पर काम के समय मन, तन को सहयोग देता है, विश्राम के समय देह भी मन को सहयोग देती है. दो होते हुए भी वे दोनों एक की तरह कर्म करते हैं, तब कोई द्वंद्व शेष नहीं रहता. स्वाध्याय तथा प्राणायाम का निरंतर अभ्यास इस लक्ष्य की ओर ले जाने में अति सहायक है. यही अद्वैत की ओर पहला कदम है.