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Tuesday, January 10, 2023

तीन गुणों के पार हुआ जो

यह सृष्टि तीन गुणों से संचालित होती है। जब तीनों गुण  साम्यावस्था में आ जाते हैं तब सृष्टि अव्यक्त हो जाती है। हमारे भीतर भी ये तीन गुण हर क्षण अपना कार्य करते रहते हैं। जब सत गुण की प्रधानता होती है, मन के भीतर हल्कापन, स्पष्टता व सहज आनंद की अनुभूति होती है। रजोगुण हमें क्रियाशील बनाता है, इसकी अधिकता मन के चंचल व अस्थिर  होने का कारण है। तमोगुण प्रमाद, आलस्य, निद्रा को लाता है।  तीनों गुणों के सामंजस्य से जीवन भली भाँति चलता है। यदि प्रातः काल सतो गुण प्रधान हो, दिन में रजो तथा रात्रि के आगमन के साथ तमो गुण बढ़ जाये तो साधना, कर्म व विश्राम तीनों होते रहेंगे और स्वास्थ्य बना रहेगा। दिन में तमो गुण बढ़ने से कार्य नहीं होगा, रात्रि में रजो बढ़ जाए तो नींद नहीं आएगी। इन गुणों का आपसी ताल-मेल सधना योग का फल है। योग साधना क्रियाशील होने के साथ-साथ हमें पूर्ण विश्राम करना भी सिखाती है। साक्षी की अवस्था में आत्मा इन तीनों गुणों के पार चला जाता है, वह इनसे प्रभावित नहीं होता। वह परम विश्राम की अवस्था है जिससे लौटकर बुद्धि प्रज्ञावान हो जाती है, जिसे कृष्ण स्थितप्रज्ञ कहते हैं। 


Thursday, April 22, 2021

तन, मन में जब एक्य सधेगा

 देह और मन एक-दूसरे के विरोधी जान पड़ते हैं , देह को विश्राम चाहिए और मन विचारों की रेल चला देता है, नींद गायब हो जाती है.  देह को काम करना है, व्यायाम करना है, मन आलस्य का तीर छोड़ देता है, कल से करेंगे, कहकर टाल जाता है. इसी तरह मन जब विश्राम चाहता है, ध्यान के लिए बैठता है तो देह साथ नहीं देती, यहाँ-वहाँ दर्द होता है और अदृश्य चीटियां काटने लगती हैं. मन जब अध्ययन के लिए बैठना है तो देह थकान का बहाना बनाती है. देह को भूख नहीं है पर स्वादिष्ट भोजन देखकर मन नहीं भरता. मन ऊर्जा है, अग्नि तत्व से बना है. देह में पृथ्वी, जल दोनों तत्व हैं और आग व पानी तो वैसे भी एक-दूसरे के विरोधी हैं. यदि देह व मन में समझौता हो जाये, एकत्व हो जाये, समन्वय हो जाये तो वे अग्नि और जल से मिलकर बनी भाप की तरह कितनी ऊर्जा को जन्म दे सकते हैं. देह भौतिक है, मन आध्यात्मिक, यदि दोनों में सामंजस्य हो जाये तो जीवन में एक नया ही आयाम प्रकट होता है. ऐसा होने पर काम के समय मन, तन को सहयोग देता है, विश्राम के समय देह भी मन को सहयोग देती है. दो होते हुए भी वे दोनों एक की तरह कर्म करते हैं, तब कोई द्वंद्व शेष नहीं रहता. स्वाध्याय तथा प्राणायाम का निरंतर अभ्यास इस लक्ष्य की ओर ले जाने में अति सहायक है.  यही अद्वैत की ओर पहला कदम है. 


Tuesday, October 1, 2019

थम कर पल भर बैठा हो जो



हम साध्य और साधन का भेद नहीं कर पाते इसलिए सदा असंतुष्ट बने रहते हैं. हमारे लिए जगत साध्य है और परमात्मा उसे प्राप्त करने का साधन, जबकि संसार को साधन बनाकर हमें स्वयं और परमात्मा के पास पहुँचना है. इस जगत में हम जो कुछ भी करते हैं वह कुछ न कुछ बनने अथवा पाने के लिए करते हैं. जो हमारे पास है, जैसे हम हैं, वह पर्याप्त नहीं है. यह दौड़ कभी खत्म होती नजर नहीं आती, संत कहते हैं यदि कोई थम जाये और जैसा वह है, जो उसके पास है, उसका मूल्यांकन करे अथवा तो कुछ भी न करे बस तटस्थ होकर रहे तो धीरे-धीरे वह प्रकट होने लगता है जो उसका मूल स्वभाव है. अपने स्वभाव में विश्राम पाते ही लगता है वह तो पहले से ही मिला हुआ है, जिसकी उसे तलाश है. इस ठहरने में एक बात और घटती है जो आवश्यक बदलाव है वह अपनेआप ही होने लगता है.

Sunday, December 9, 2018

स्वयं में ही विश्रांति मिले जब


१० दिसम्बर २०१८ 
मन में कामना उठती है किसी न किसी अभाव का अनुभव करने के कारण. उस अभाव की पूर्ति के लिए हम कर्म में तत्पर होते हैं. कर्म का एक संस्कार भीतर पड़ता है और भविष्य में उसका निर्धारित फल भी मिलने ही वाला है. उदाहरण के लिए यदि हमारे भीतर कहीं जाने की कामना उत्पन्न हुई, इसका अर्थ है हम जहाँ हैं वहाँ कोई अभाव है, गन्तव्य पर जाकर हम पूर्णता का अनुभव करेंगे. यात्रा के दौरान कितने ही संस्कार मन पर पड़े और लक्ष्य पर पहुँच कर जिस प्रसन्नता का हमने अनुभव किया, उसे पुनः-पुनः अनुभव करने की नई कामना ने भीतर जन्म लिया. अब उस स्थान पर भी भीतर अभाव का अनुभव होगा, यही बंधन है. जीवन इसी चक्र का दूसरा नाम है, हम जिस कामना की पूर्ति के लिए इतना श्रम करते हैं, वह हमें पुनः वहीँ पहुँचा देती है, जहाँ से हम चले थे. क्या कोई ऐसा क्षण हो सकता है, जब भीतर कोई अभाव न हो, पूर्ण तृप्ति का अनुभव हो और हम पूर्ण स्वाधीनता का अनुभव करें. मन की धारा यदि बाहर से लौट आए और भीतर की तरफ यात्रा करे एक बिंदु पर आकर वह स्वयं में खो जाती है और जो शेष रहता है वही सहज विश्राम है, जिसमें कोई अभाव नहीं रहता.

Sunday, May 13, 2018

कर्मशील हो जीवन अपना


१४ मई २०१८ 
सृष्टि में हर पल कुछ न कुछ घट रहा है, लगता है जगत नियंता एक पल भी विश्राम नहीं करता. भगवद् गीता में कृष्ण कहते हैं, मुझे कुछ भी पाने अथवा करने योग्य नहीं है फिर भी मैं अनवरत क्रियाशील हूँ. पंछी भी दिन भर कुछ न कुछ करते ही रहते हैं, और तभी वह रात होते ही चैन की नींद सो जाते हैं. मानव ने जो अपनी रातों की नींद गंवा दी है क्या वह शारीरिक अकर्मण्यता के कारण तो नहीं है, आजकल परिवार छोटे हो गये हैं, सुख-सुविधा और साधन सम्पन्न परिवारों में काम करने के लिए भी कोई न कोई सहायक या सहायिका होती ही है. शेष बचा काम आधुनिक उपकरणों से हो जाता है, अब ज्यादा समय बीतता है टीवी, कम्प्यूटर के सामने या मोबाइल पर, देह को अति विश्राम मिलने से वह स्थूल हो जाती है और फिर अस्वस्थ. शारीरिक थकान नहीं हुई तो निद्रा दूर ही रहेगी. निद्रा में थका हुआ तन ही तो विश्राम पाता है. मन तो तब भी सक्रिय रहता है. देह की स्थिरता ही मन को भी एकाग्र करने में सहायक होती है और तभी समाधि जैसी गहन निद्रा का अनुभव कोई कर सकता है, जैसे शिशु सोते हैं या कोई थका हुआ कृषक या मजदूर. घर के कामों में मशीनों के बढ़ते चलन की वजह से हाथ-पैर के जोड़ों में गति नहीं होती और यदि कोई नियमित व्यायाम न करे तो उनमें पीड़ा होने लगती है. इससे बचने का उपाय है कि प्रतिदिन कुछ न कुछ शारीरिक श्रम किया जाये. कुछ खेती करें, गमलों में ही सब्जियां उगायें. मोहल्ले में जाकर सबको साथ लेकर योग की कक्षा चलायें या स्वच्छता का बीड़ा उठायें. समाज को आगे ले जाने का बीड़ा श्रमशील व्यक्तियों ने ही उठाया है. जीवन की अंतिम श्वास तक जो सक्रिय रह सकेगा वही मृत्यु का स्वागत हँसते-हँसते कर सकता है.  

Thursday, February 1, 2018

दो के पार ही जाना हमको

२ फरवरी २०१८ 
जीवन द्वंद्वों से बना है. यहाँ जो वस्तुएं, घटनाएँ, गुण तथा मूल्य एक दूसरे के विपरीत दिखाई पड़ते हैं, वे विपरीत न होकर एक दूसरे के पूरक हैं. दिन के बिना रात नहीं होती, सुख के साथ दुःख लगा ही है. मित्रता और शत्रुता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. जो हमारे प्रिय पात्र हैं वे ही कल अप्रिय भी लग सकते हैं. एक का अस्तित्व दूसरे पर ही टिका है. बीमारी न हो तो स्वास्थ्य की कीमत कौन जानेगा. अशांति न हो तो शांति की चाह किसे होगी. संत जगत की इस व्यवस्था को जानकर उनसे ऊपर उठ जाते हैं. जहाँ दो नहीं हैं विश्राम वहीं है. 

Tuesday, August 22, 2017

थम कर चलना जो सीखेगा

२३ अगस्त २०१७ 
इस जगत की कितनी सारी महत्वपूर्ण घटनाएँ अपने आप हो रही हैं, वायु बह रही है, श्वासें चल रही हैं, देह में रक्त का संचरण हो रहा है. जीवन का अनमोल उपहार हमें अकारण ही प्राप्त हुआ है. इसको सार्थक करना ही हमारा एकमात्र कर्त्तव्य है. जीवन अर्थपूर्ण तभी बनता है जब भीतर के शांति स्रोत का पता चल जाता है. जब तक कोई दुविधा है, जीवन एक संघर्ष ही नजर आता है. शांति का अनुभव करने के लिए ध्यान का अभ्यास अति आवश्यक है. जैसे कोई यात्री घंटों से चल रहा हो और एक वृक्ष की निर्मल छाया में पल भर को विश्राम करने के लिए रुक जाये. इस विश्राम के बाद चलने का उसका आनंद पहले से बढ़ जायेगा. इसी तरह सब कुछ छोड़कर कुछ पलों के लिए खाली होकर बैठ जाना और मन को देखते रहना चित्त को अनोखी विश्रांति से भर जाता है.


Wednesday, June 28, 2017

भाव बनें जब पावन अपने

२८ जून २०१७ 
हमारी पूजा और प्रार्थना मन के किस स्तर से आती हैं, साधक को इसका ध्यान रखना होगा. यदि पूजा से हम कुछ पाना चाहते हैं और प्रार्थना हम इसलिए करते हैं कि लोग हमें धार्मिक कहें, तो दोनों व्यर्थ हैं. पूजा को अहंकार बढ़ाने का नहीं उसे नष्ट करने का साधन बनाना है. जब तक मन पूर्ण संतोष व विश्राम का अनुभव नहीं कर लेगा उसे कुछ न कुछ बनने अथवा पाने का रोग लगा ही रहता है. ध्यान के बिना पूर्ण विश्राम सम्भव नहीं, अथवा तो मन जब श्रद्धा से ओतप्रोत हो जाये. भावशुद्ध हों तभी ध्यान घटता है. देह को पूर्ण शांत अवस्था में बैठाकर गहरी लम्बी श्वासें लेते हुए जब साधक स्वयं को परम के सम्मुख छोड़ देता है तब वही शांति और संतोष बनकर उसके मन व देह पर आच्छादित हो जाता है. 

Wednesday, March 22, 2017

श्रम में ही विश्राम छुपा है

२३ मार्च २०१७ 
सृष्टि में जैसे दिन-रात का चक्र अनवरत चल रहा है, अर्थात श्रम और विश्राम के लिए नियत समय दिया गया है, वैसे ही साधक के लिए प्रवृत्ति और निवृत्ति का विधान किया गया है. ध्यान का समय ऐसा हो जब दोनों तरह की  इन्द्रियां अर्थात कर्मेन्द्रियाँ व ज्ञानेन्द्रियाँ  बाहरी विषयों से स्वयं को निवृत्त कर लें, मन में कोई इच्छा न रहे, बुद्धि हर जिज्ञासा को परे रख दे, आत्मा स्वयं में ठहर जाए. ध्यान में मिले पूर्ण विश्राम के पश्चात जब कार्य में प्रवृत्त होने का समय आये तो ऊर्जा स्वतः ही प्रस्फुटित होगी. कर्म तब फल की इच्छा के लिए नहीं होगा बल्कि जो ऊर्जा ध्यान में भीतर जगी है, उसके सहज प्रकटीकरण के लिए होगा. इसीलिए हमारे शास्त्रों में  सन्धया करने के विधान का  विवरण मिलता है, दिन में कम से कम दो बार साधक शान्त होकर बाहरी जगत से निवृत्त हो जाये, तो जिस तरह दिन-रात सहज ही बदलते हैं, कर्म और विश्राम सहज ही घटेंगे. 

Monday, August 25, 2014

फूल खिले जब ध्यान का

फरवरी २००७ 
सद्गुरु कहते हैं, ध्यान उत्तम प्रार्थना है. हमारे भीतर ही ऐसा कुछ है जहाँ पूर्ण विश्राम है. मन तो सागर की लहरों की तरह है अथवा आकाश के बादलों की तरह, जो आते हैं और चले जाते हैं, और सारे विकार वे भी तो मात्र विचार हैं जिनका कोई अस्तित्त्व ही नहीं. भय का विचार हमें कैसे जड़ कर देता है, जबकि वह है क्या, एक कल्पना ही तो ! हम खाली हैं, ठोस तो केवल अस्तित्त्व है जो सदा रहने वाला है, वास्तव में वही हम हैं, जिसमें से रिसता है प्रेम, करुणा, कृतज्ञता और शांति. जिसमें से झरता है आनंद. पहले विचार आंदोलित करते रहे हों पर ध्यान के बाद वे बेजान हो जाते हैं. उन्हें देखना भर है. उनमें स्वयं की शक्ति नहीं है, वे आते हैं और चले जाते हैं, जिसने तय कर लिया है कि अब से उसके जीवन में जो भी होगा श्रेष्ठतम ही होगा, उससे कम नहीं, सारा अस्तित्त्व उसके साथ है. ईश्वर श्रेष्ठतम है और वह हर क्षण हमारे साथ है.


Tuesday, January 14, 2014

वही पुकारे है सबको

हमारी देह एक किराये के मकान की तरह है, हम जितने दिन, महीने अथवा वर्ष इस मकान में रहते हैं, हमें इसका किराया देना पड़ता है, वह है इसका रख-रखाव, पोषण तथा रक्षा आदि. हम जब इस जगत में रहते हैं तो सुने हुए को अपने स्वार्थ के अनुसार ढाल लेते हैं, हम किसी बात को वह जिस रूप में कही गयी है उसी रूप में समझ लें तो हमारी देह जल्दी हमारा साथ नहीं छोड़ेगी, बीमार नहीं होगी. आराम, विश्राम तथा काम तीनो का संतुलन भी हमें बनाना होगा तभी यह देह रूपी मकान हमारे लिए सुरक्षित है, तब तक, जब तक हम इसमें रहकर अपने उद्देश्य को प्राप्त नहीं होते. हमारे जीवन का उद्देश्य स्वयं को जानना है, हमारे सारे पुरुषार्थ उसी की ओर ले जाने वाले हैं. सारे सन्त, शास्त्र उसी की ओर जाने का इशारा कर रहे हैं. निजी इन्द्रिय सुख का जीवन बहुत जी लिया उससे सिवाय दुःख तथा रोग के कुछ भी प्राप्त नहीं होता है, अब तो जीवन को एक उत्सव बनाना है, एक खेल ! जिसके हृदय में देह तथा आत्मा की भिन्नता स्पष्ट है वह सुरक्षित है, तृप्त है, पूर्ण है, आनन्द से भरा है तथा परमात्मा के साथ है. परमात्मा को तर्क से नहीं जाना जा सकता वह श्रद्धा की वस्तु है, अंतर श्रद्धावान हो तो देह बाधक नहीं बनती, देह भी तब शिवालय बन जाती है.

Thursday, January 3, 2013

सहज हुए सब होता जाये


“मैंने यह किया, मुझे यह करना है और मैं यह करूँगा,” ऐसे संकल्प करने वाला मन सदा उलझा ही रहता है. वास्तव में जो हमें करना है वह सहज है, वह सप्रयास नहीं होता अपने आप होता है जैसे फूल का खिलना, सहज प्राप्त कर्त्तव्यों के पालन में, अपनी रूचि, योग्यता आदि के अनुसार करने वाले कार्यों में हमें कोई प्रयास नहीं करना पड़ता, ऐसे कर्म हमें बांधते नहीं और हम त्रिगुणात्मक प्रकृति से परे हो जाते हैं, मुक्त हो जाते हैं. मन तब भीतर की ओर जाने का सामर्थ्य पाता है और वहाँ उसे परम विश्राम का अनुभव होता है..निस्सीम, अनंत आनंद का अनुभव..जो परमेश्वर का अंश है. यह सकल सृष्टि उस परम के एक अंश मात्र में स्थित है और वह हमसे अहैतुक प्रेम करता है, उसका प्रेम वैसा ही स्वाभाविक है जैसे हमारा अपनी सन्तान के प्रति सहज ही होता है. ईश्वरीय प्रेम हमारे प्रेम से अनंत गुना अधिक है. उसका स्मरण यदि बना रहे तो हम पूर्ण तृप्ति का अनुभव करते हैं. उसके प्रेम का अभाव ही हमें दुखी करता है.