हम साध्य और साधन का भेद नहीं कर
पाते इसलिए सदा असंतुष्ट बने रहते हैं. हमारे लिए जगत साध्य है और परमात्मा उसे
प्राप्त करने का साधन, जबकि संसार को साधन बनाकर हमें स्वयं और परमात्मा के पास
पहुँचना है. इस जगत में हम जो कुछ भी करते हैं वह कुछ न कुछ बनने अथवा पाने के लिए
करते हैं. जो हमारे पास है, जैसे हम हैं, वह पर्याप्त नहीं है. यह दौड़ कभी खत्म
होती नजर नहीं आती, संत कहते हैं यदि कोई थम जाये और जैसा वह है, जो उसके पास है,
उसका मूल्यांकन करे अथवा तो कुछ भी न करे बस तटस्थ होकर रहे तो धीरे-धीरे वह प्रकट
होने लगता है जो उसका मूल स्वभाव है. अपने स्वभाव में विश्राम पाते ही लगता है वह
तो पहले से ही मिला हुआ है, जिसकी उसे तलाश है. इस ठहरने में एक बात और घटती है जो
आवश्यक बदलाव है वह अपनेआप ही होने लगता है.
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Tuesday, October 1, 2019
Friday, May 18, 2018
जब तक न एकत्व सधेगा
१९ मई २०१८
जीव, जगत और ईश्वर, जब तक ये तीन दिखते हैं, समाधान नहीं
मिलता. मन में कोई न कोई भेद बना ही रहता है. जीव जब ईश्वर के तन्मयता का अनुभव कर
लेता है, जगत से भी कोई दूरी नहीं रह जाती. किसी के साथ प्रतिस्पर्धा नहीं रहती,
स्वयं को कुछ विशेष दिखाने की दौड़ समाप्त हो जाती है. अपने सुख के लिए किसी बाहरी साधन
पर ही निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं रहती. कर्त्तव्य कर्म करने के लिए ऊर्जा और
उत्साह सदा ही बना रहता है.
Monday, August 21, 2017
जग जैसा जब देखें वैसा
२१ अगस्त २०१७
प्रत्येक आत्मा में ज्ञान पाने की सहज कामना होती है, एक बच्चा भी जन्मते ही अपने
आस-पास के वातावरण से परिचित होना चाहता है. ज्ञान इन्द्रियों तथा मन के रूप में
हमें जानने के सुंदर साधन प्राप्त हुए हैं, जिनके माध्यम से हम जगत को जानते हैं.
जानने के इस क्रम में हम जगत के बारे में कई धारणाएं अथवा मान्यताएं बना लेते हैं,
जिनका कोई प्रमाण हमारे पास नहीं होता, जिसके कारण हमें कष्ट उठाना पड़ता है. यदि
हमारे पास अपनी धारणा के पक्ष अथवा विपक्ष में कोई प्रमाण नहीं है, तो हम उस बात
को न तो स्वीकार करें न ही अस्वीकार. उस स्थिति में हम तटस्थ रहकर ही स्वयं की
रक्षा कर सकते हैं. इस जाननेवाले को जानने के लिए हमें इन साधनों को शुद्ध करने
की आवश्यकता है, मन जितना शुद्ध होगा उतना
ही एकाग्र होगा. एकाग्र मन में जानने वाला यानि आत्मा अपने प्रतिबिम्ब को उसी तरह देख
लेता है, जैसे शान्त झील में हम उसकी तलहटी को देख लेते हैं.
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Monday, December 22, 2014
इतनी शक्ति हमें देना दाता
हमारे मस्तिष्क
का आधा हिस्सा भी हम इस्तेमाल नहीं कर पाते, कोई कहता है कि हम दस प्रतिशत से भी
कम उस क्षमता का प्रयोग करते हैं जो प्रकृति ने हमें दी है. उस दस प्रतिशत में से
भी कितनी तो व्यर्थ ही नष्ट हो जाती है जैसे, व्यर्थ बोलना, नकारात्मक चिन्तन,
नकारात्मक दृष्टिकोण आदि. शक्ति का पूर्ण उपयोग हो सके इसका पहला साधन है पवित्रता
! शुद्ध बुद्धि में शक्ति टिकती है. उस शक्ति का जब हम प्रयोग करते हैं तो और
प्रकटती है. यह सृष्टि न जाने कितनी बार बनी और नष्ट हुई और कितनी बात मानव
ऊंचाइयों पर पहुँचा है और कितनी बार गिरा है. हम आगे बढ़ें यही हमारी नियति है.
Monday, October 20, 2014
भक्ति अति निराली घटना
मार्च २००७
परम सत्य की प्राप्ति का
कोई भी मार्ग हो तो उसका अंत भक्ति में ही होता है, अर्थात ज्ञान का फल भी भक्ति
है और कर्मयोग का फल भी भक्ति ही है. भक्ति स्वयं ही साधन है और स्वयं ही साध्य
भी. भक्ति का अर्थ है सत्य से प्रेम...परम से प्रेम ! विष्णु की भक्ति करें या राम
की, शंकर की अथवा कृष्ण की, सभी एक को ही पहुँचती है. यदि कोई अनपढ़ हो, शास्त्र न
पढ़ सकता हो या समझ सकता हो, स्तुति न गा सकता हो, वह एक बात तो कर ही सकता है. वह
ईश्वर से प्रेम कर सकता है. उसके किसी भी नाम को भज सकता है. उसको स्मरण कर सकता
है. उसका प्रेम ही उसको तार देगा.
Friday, September 27, 2013
उद्यम ही भैरव है
मार्च २००५
‘उद्यमः भैरवः’ पुरुषार्थ के लिए हमें जो प्रयत्न करना है, वही
भैरव है. वही शिव है. शुभ कार्यों के लिए किया गया साधन परमात्मा का ही रूप है. हम
साधन तो करते हैं पर असाधन से नहीं बचते.
२३ घंटे ५९ मिनट तथा ५९ सेकेण्ड यदि हम साधन करें और एक सेकंड भी असाधन में लग गये
तो सारा साधन व्यर्थ हो जाता है. और यदि एक सेकंड ही साधन किया पर शेष समय असाधन न
किया तो वह साधन हमारे लिए हितकारी होगा. जप-पूजा करने के बाद भी यदि भीतर शांति
का अनुभव नहीं होता तो कमी साधन में नहीं बल्कि कारण हमारा असाधन है. संतजन कहते
हैं, यह सम्पूर्ण संसार एक ही सत्ता से बना है. वही ज्ञानी है, वही अज्ञानी है.
वही कर्ता है, वही भोक्ता है. हम साक्षी मात्र हैं. जाने-अनजाने सभी उसी ओर जा रहे
हैं. वही हमारा मार्ग दर्शक है वही हमारा ध्येय है. यह सारा संसार उसी की लीला के
लिए रचा गया है.
Friday, December 28, 2012
साध्य ही जब बनता साधन
दिसंबर २००३
हमारा प्राप्तव्य यदि ऊँचा होगा तो साधन भी उत्तम अपनाएंगे. साध्य और साधन जब एक हो
जाते हैं, तब जीवन में समता आती है. हृदय जब समभाव में स्थित रहता है तब कर्मों के
बंधन नहीं बंधते. लक्ष्य यदि विस्मृत हो गया तो जीवन में पुलक नहीं रहती, रंग नहीं
रहता और ऐसा जीवन भारस्वरूप ही होता है खुद के लिए और अन्यों के लिए भी. मृत्यु का
सामना करने की तैयारी यदि हमने नहीं की तो सिवाय पछताने के कुछ हाथ नहीं आयेगा. उस
समय जो हमारे साथ जायेगी वह हमारी चेतना
होगी, प्रज्ञावान चेतना...प्रज्ञा तभी जगेगी जब जीवन में ध्यान होगा, मन स्थिर होगा,
उसके लिए ज्ञान चाहिए, ज्ञान भक्ति के बिना नहीं टिकता. भक्ति तभी मिलेगी जब
सुमिरन होता रहे औए सुमिरन तभी होगा जब परम ही हमारा लक्ष्य हो, उसे जानने व पाने
की चाह भीतर उठे. मन रूपी चरखे में जब श्वास रूपी धागा काता जाता है, और उन
श्वासों में उसके नाम की गूंज उठती है तब जो चादर बिनी जाती है वही प्रज्ञा है. तब
अंतर में आनंद का स्रोत छलकता है, उस सोते में सारे शिकवे-शिकायतें, चाहते डूब
जाती हैं, रह जाती है मात्र शीतलता और सहजता.
Wednesday, November 21, 2012
ज्योति जल रही उसकी भीतर
अक्टूबर २००३
परमात्मा सद्गुरु के रूप में बार-बार धरा पर अवतरित होते हैं. कृपा की फुहार बरसाते
हैं. कुम्भ के रूप में हम जिस ब्रह्माण्डीय शक्ति की उपासना करते हैं वह उसी का
रूप है. यदि हम उसे अपने जीवन रूपी रथ को हांकने के लिए कहें तो वह तत्क्षण तैयार
हो जाते हैं. वह हमारी चेतना की मूर्छा को दूर करते हैं. जीवात्मा रूपी अर्जुन जब
परमात्मा रूपी कृष्ण को अपना गुरु बनाता है तो वह उसे प्रेरित करते हैं, ज्ञान
प्रदान करते हैं, ध्यान की विधि बताते हैं. अनेकों उपायों से वह अर्जुन की सुप्त
चेतना को जागृत करते हैं. अहंकार का आवरण दूर करते हैं. जीवन अमूल्य है, उसी का
उपहार है, वही इसका आधार है, हमें उसे ही जानना है जो इस देह और मन के भीतर ज्योति
जलाकर बैठा है. जगत तो एक साधन है शरीर को चलाने के लिए, ज्ञान पाने के लिए. कृपा
होते ही यह जीवन एक उत्सव बन जाता है. गूंगे की मिठाई की तरह जो भीतर को रस से भर
देता है. तब भीतर उजाला ही उजाला भर जाता है, जिसमें सभी कुछ स्पष्ट है, कहीं कोई
संशय नहीं रहता.
Sunday, November 11, 2012
नई राह पर नया उजाला
हमें अपने भीतर नया दृष्टिकोण
जगाना होगा, अभी मात्र आधा किलोमीटर ही चले हैं, अभी बहुत चलना है, अभी तो
प्रारम्भ ही हुआ है, कदम अभी तो चलना ही शुरू कर रहे हैं, गति पकड़ना तो अभी शेष
है. मन को उस स्तर तक ले जाना होगा कि ऐसा लगे कोई छलांग लगी है. कितनी ही बार हम ऐसा
चिंतन करके जीवन को दिशा प्रदान करना चाहते हैं, पर बार-बार ऐसा क्यों लगता है कि
हम कहीं पहुंच नहीं पा रहे हैं, या तो हमारी दिशा भटक गयी है या हमारी गति शिथिल
हो गयी है. तब हम यह भूल जाते हैं कि भक्ति, ज्ञान या कर्म स्वयं में फलस्वरूप
हैं, वे साधन भी हैं और साध्य भी. वे हमें अपने भीतर उजाले का दर्शन कराते हैं.
पूर्ण समपर्ण ही भक्ति है, स्वयं को मात्र देह न मानकर चिन्मय तत्व जानना ही ज्ञान
है और सहज प्राप्त कार्य को करना ही कर्म है. फिर जाना कहाँ और पाना क्या ? जब कोई
अपेक्षा नहीं तो दुःख-सुख का भी प्रश्न नहीं है. हम तब संसार में रहते हुए भी कमल
की नाईं संसार से परे रह सकते हैं. सदा सर्वदा अपने सत्य स्वरूप में स्थित.
Thursday, October 18, 2012
एक वही न दूजा कोई
सितम्बर २००३
ईश्वर का नाम भक्त के हृदय को पवित्र करता है, उसे नाम जपने में कभी आलस्य नहीं
होता. अच्छा लगता है और एक वक्त ऐसा भी आता है जब नाम सुमिरन के अतिरिक्त बात करना
भी बोझ मालूम पड़ता है. सचमुच अध्यात्म के मार्ग पर चलने वाले निराले होते हैं. जगत
से उल्टा होता है उनका व्यवहार, वे संसारिक बातों में दक्ष न हों पर अपने चिर सखा
के सम्मुख सत्य में स्थित होते हैं. ईश्वर के सम्मुख वे अपने पूर्ण होशोहवास में
प्रस्तुत होते हैं और तभी तत्क्षण उसकी उपस्थिति का अहसास भी करते हैं. उन्हें वह
इतना प्रिय, प्रियतर, प्रियतम लगता है कि उसके सिवा सब कुछ फीका लगता है. लेकिन यह
जगत भी तो उसी का प्रतिबिम्ब है, उसी के कारण आकाश में नीलिमा का आभास होता है और
जल में हरीतिमा का. वही भीतर है और वही बाहर है. वही हमें सम्भालता है वही हमारी
रक्षा करता है. वही धर्म है, वही न्याय है, वही ज्ञान है, वही सदबुद्धि है, वही
मंगल है, वही शिव है, वही जीवन है, वही जीवनदाता है, वह एक है पर उसके नाम अनेक
हैं, उसके रूप अनेक हैं, वह सुखमय है, वह रसमय है, वह सुखद है, अद्भुत है, नित्य
है, चिरसखा है, अनंत है, आनंद है, शांति
प्रदाता है, वही साधना है, वही साध्य है, वही साधन है, वही श्रेय है वही प्रेय भी !
Tuesday, August 7, 2012
जैसे जैसे वह मिलता है
जुलाई २००३
जब ईश्वर का अनुभव हमें होता है तो वह हमारे विचारों, भावनाओं को पवित्र करना
चाहता है. तब हम वही करना आरम्भ करते हैं जो उसे प्रिय हो, हम उसके साधन बन जाते हैं,
वह हममें सामर्थ्य भरता है. परिपूर्ण करता है. सम्पूर्ण जीवन प्रदान करता है,
जीवन्मुक्त करता है. विश्वास और श्रद्धा से ही आत्मा उजागर होती जाती है. हम उसकी
महानताओं को प्रकाशित करने लगते हैं. हमारे माध्यम से वह स्वयं को ही प्रदर्शित
करता है. जैसे-जैसे हम उसे समर्पित होते जाते हैं वही वह रह जाता है, हमारा झूठा
अहं गिर जाता है. हमारा नया जन्म होता है. और ईश्वर का अनुभव होता है सदगुरु की
कृपा से, वह एक ऐसा दिया है जो स्वयं जलकर औरों को प्रकाशित करता है. कठोर साधना
के बाद जो उसने पाया है वह सहर्ष ही लुटा देता है. वह प्रेमवश हमारे अपराधों को
सहता है. हमारी कमियों को दूर करने का रास्ता बताता है. उसका प्रेम अनंत है. उसे
ईश्वर के निकट देखकर हमें भी ऐसी प्रेरणा होती है, वह हमें अपना सा बनाना चाहता
है.Tuesday, July 10, 2012
प्रेम पनपता है जब भीतर
मई २००३
मन की शुद्धता उसी के पास है, जो हरेक के भीतर उसी चैतन्य का दर्शन करता है, जो
सुख-दुःख में सम रहने की कला जानता है, जो धैर्यवान है, जो मिथ्या अहंकार का पोषण
नहीं करता. जो सत्य का पक्षधर है, जो प्रकाश की खोज करता है वह हृदय पावन होने
लगता है. जैसे कीमती पदार्थ रखने के लिये कीमती व सुरक्षित स्थान भी चाहिए, वैसे
ही ज्ञान के लिये भी पात्रता चाहिए. ज्ञान होने पर ही हृदय में प्रेम का उदय होता
है, प्रेम अपने आप में साधन भी है और साध्य भी, परम के प्रति प्रेम यदि दृढ़ है तो
साधक को और कुछ प्राप्य नहीं रह जाता. ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम ही साधना का
लक्ष्य है. प्रेम होने पर सारे सदगुण अपने आप प्रसाद रूप में मिल जाते हैं. तब कोई
उहापोह नहीं रहती, सारा का सारा विषाद न जाने कहाँ चला जाता है.
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