जैसे सूर्य की किरण श्वेत है पर उसमें सात रंग छिपे हैं, वैसे ही भक्ति का रूप प्रेम है पर उसमें ग्यारह प्रकार की सुगंध छिपी है. पहला प्रकार है प्रेमास्पद की गुण महिमा गाना, जिससे हम प्रेम करते हैं, उसके गुणों का बखान करना स्वाभाविक है. दूसरा प्रकार है उसके रूप के प्रति आसक्त होना. सौंदर्य के प्रति समर्पित व्यक्ति आक्रामक नहीं होता. जहाँ भी सुंदरता है भक्त को उसके पीछे वही दिखता है. अरूप के प्रति समर्पित होकर रूप का दर्शन करना है, रूप से फिर अरूप की और जाना है. जैसे प्रकृति में विविधता है, वैसे ही मानव भी विभिन्न कलाओं के माध्यम से उस रूप को व्यक्त करता है. मूर्तिकला, चित्रकला, वास्तु हर सृजन के पीछे भक्ति है. पूजासक्ति भक्ति का तीसरा प्रकार है. भीतर पूर्णता का अनुभव करके जो भी कृत्य किया जाता है वह पूजा है. स्मरणासक्ति अर्थात स्मृति में बने रहना, जिसे प्रेम करते हैं उसकी याद बने रहना भी भक्ति का एक रूप है. दास्यभाव भक्ति का अगला प्रकार है,भक्त ईश्वर के दास हैं, इस भाव में एक निश्चिंतता है, स्वामी को सब समर्पण कर दिया है, अब उसके कुशल-क्षेम की रक्षा वही करेंगे. सख्यासक्ति में भक्त भगवान को अपना सखा मानता है. सखा भाव में हर भेद मिट जाता है, वे हर वस्तु बांटते हैं. वात्सल्यासक्ति में भगवान को अपना शिशु मानकर प्रेम जताना भी भक्ति है. कांतासक्ति में ईश्वर में प्रियतम भाव को आरोपित किया जाता है. ईश्वर को अपना प्रियतम मैंने से उससे कुछ भी छिपाया नहीं जा सकता. तन, मन, धन सब कुछ उसे समर्पित कर देना ही कांतासक्ति है. इसके बाद आती है आत्मनिवेदनासक्ति जिसमें सभी भावों को उन्हें समर्पित कर देता है. तन्मयासक्ति में भक्त भगवान के स्मरण, उसके रस में, उनकी स्मृति में पूरी तरह से डूब जाता है. परमविरहासक्ति में प्रियतम के अभाव से ही भक्ति का अनुभव होता है. विरह की पीड़ा ही भक्त के हृदय में दर्द भरा आनंद भर देती है.
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Sunday, June 21, 2020
Friday, January 23, 2015
तू ही है जमीं तू ही आसमां
2007
हम ईश्वर का ध्यान तभी तो
कर सकते हैं जब हम उसे पहचान लें, उसकी पहचान तो सद्गुरु ही कराते हैं और एक बार
उसकी पहचान हो जाये तो फिर कभी वह ध्यान से उतरता नहीं है. पहला परिचय खुद का होता
है और तब लगता है जिन्हें हम दो मान रहे थे वे दो थे ही नहीं, एक ही सत्ता थी, वही
आत्मा, वही परमात्मा, वही सद्गुरु वही संसार ! कहीं कोई भेद नहीं, किसी को भी छोड़ना
नहीं ! जो भी सहज प्राप्य हो, हितकर हो, मंगलमय हो, इस जगत के लिए और स्वयं के लिए
शुभ हो वही धारण करने योग्य है. तब सारे संशय भीतर से दूर हो जाते हैं, अंतर्मन खाली
हो जाता है. कोई आग्रह नहीं, कोई चाह भी नहीं, जैसे नन्हा बालक सहज प्रेरणाओं पर
जीता हुआ, अस्तित्व तब माँ हो जाता है, ब्रह्मांड पिता होता है. सारे वृक्ष,
पर्वत, आकाश तब सखा हो जाते हैं और सारे लोग भी एक अनाम बंधन में बंधे अपने ही
लगते हैं !
Wednesday, December 10, 2014
तुम्हीं हो बन्धु सखा तुम्हीं हो
जुलाई २००७
परमात्मा
के नाम के सिवा सभी कुछ नश्वर है, इसका बोध होते ही सारा दृश्य बदल जाता है.
अस्तित्त्व मुखर हो जाता है. ऐसा बोध आत्मा की गहराई से उपजता है. भीतर जो सत्य,
आनंद का स्रोत है वहाँ से. जो चमत्कार कर सकता है, अभाव व प्रभाव से निकाल कर वह
हमें स्वभाव में लाता है. सहज ही अकर्ता भाव सधने लगता है. परमात्मा हमारा सुहृदय
है, सखा है, आत्मीय है, मीत है और ऐसा हितैषी जो कभी राह से भटकने नहीं देता. उससे
विमुखता ही असजगता है. असजग होकर हम अपने स्रोत से दूर हो जाते हैं, आत्मा के पद
से हट जाते हैं. ऐसा होते ही दुःख हमें घेर लेता है.
Friday, August 1, 2014
चलो घर चलें
जनवरी २००७
कृष्ण हमारा
सखा है और वह हमसे कहता है जैसे मैं तुम्हें प्रेम करता हूँ वैसे ही तुम मुझसे करो
और मेरे नाते जगत से करो. जैसे मैं आनंद हूँ, वैसे ही तुम्हें भी जीना चाहिए. हमें
अपना परिक्षण नहीं करना है बल्कि वीक्षण करना है, जीवन जीना कोई गम्भीर कार्य नहीं
है, ईश्वर को पाना भी कोई गम्भीर कार्य नहीं है. हमें उस क्षण की प्रतीक्षा नहीं
करनी है जब हमें पूर्ण आनंद मिलेगा बल्कि इसी क्षण उसे पाना है. ईश्वर की समीक्षा
करनी है, वह जो सदा हमारे साथ है. हम उसके उत्तराधिकारी हैं, उसका सब कुछ हमारा है,
हम विशाल संपदा के अधिकारी हैं, यह सारा ब्रह्मांड हमारा घर है. न जाने कितने जन्मों
से हम घर से बाहर थे, अपने विरसे को हमने खो दिया था पर घर लौट कर आने पर वह हमारा
ऐसे स्वागत करता है जैसे हम उसके प्रियतम हों.
Saturday, May 31, 2014
चिरकाल से नाता जिससे
अप्रैल २००६
परमात्मा
सर्व समर्थ है फिर भी जब हम उसे प्रेम करते हैं वह हमारा सखा बनता है. हमें करना
ही क्या है ? मात्र उससे प्रेम ही तो ! और निर्भार हो जाना है, हमारे उर में जो
शांति बन छा जाता है, प्रेम का दरिया बनकर बहने लगता है ! हमारे भीतर का अंधकार
दूर कर देता है. मन में सूक्ष्म वासनाएं छिपी हुई हैं, हम जब उसके सम्मुख होते हैं
तो कुछ देर के लिए लगता है जैसे अंतःकरण पूर्ण निर्मल हो गया है पर पुनः पुनः
संसार का आकर्षण हमें अपनी ओर खींच लेता है, तभी तो बार-बार प्रार्थना की आवश्यकता
है, बार-बार शुभ संकल्पों की जरूरत है. बार-बार सन्त दर्शन की आवश्यकता है. जीवन
में तभी प्रेम का उदय होगा. जैसे एक-एक बूंद को सहेजकर तालाब बनता है वैसे ही एक–एक
क्षण हमें उसकी स्मृति भीतर भरनी है, ताकि वह सदा हमारे द्वारा पूजित होता रहे,
सदा हमारी आराधना का केंद्र रहे. उसका नाम हमारे रोम-रोम में समाँ जाये. उसका
प्रेम हमारे माध्यम से प्रकट होने लगे.
Thursday, October 18, 2012
एक वही न दूजा कोई
सितम्बर २००३
ईश्वर का नाम भक्त के हृदय को पवित्र करता है, उसे नाम जपने में कभी आलस्य नहीं
होता. अच्छा लगता है और एक वक्त ऐसा भी आता है जब नाम सुमिरन के अतिरिक्त बात करना
भी बोझ मालूम पड़ता है. सचमुच अध्यात्म के मार्ग पर चलने वाले निराले होते हैं. जगत
से उल्टा होता है उनका व्यवहार, वे संसारिक बातों में दक्ष न हों पर अपने चिर सखा
के सम्मुख सत्य में स्थित होते हैं. ईश्वर के सम्मुख वे अपने पूर्ण होशोहवास में
प्रस्तुत होते हैं और तभी तत्क्षण उसकी उपस्थिति का अहसास भी करते हैं. उन्हें वह
इतना प्रिय, प्रियतर, प्रियतम लगता है कि उसके सिवा सब कुछ फीका लगता है. लेकिन यह
जगत भी तो उसी का प्रतिबिम्ब है, उसी के कारण आकाश में नीलिमा का आभास होता है और
जल में हरीतिमा का. वही भीतर है और वही बाहर है. वही हमें सम्भालता है वही हमारी
रक्षा करता है. वही धर्म है, वही न्याय है, वही ज्ञान है, वही सदबुद्धि है, वही
मंगल है, वही शिव है, वही जीवन है, वही जीवनदाता है, वह एक है पर उसके नाम अनेक
हैं, उसके रूप अनेक हैं, वह सुखमय है, वह रसमय है, वह सुखद है, अद्भुत है, नित्य
है, चिरसखा है, अनंत है, आनंद है, शांति
प्रदाता है, वही साधना है, वही साध्य है, वही साधन है, वही श्रेय है वही प्रेय भी !
Sunday, March 4, 2012
कृष्ण कथा अमृत
जनवरी २००३
भागवद् महापुराण में कृष्ण की कथा है, बल्कि कहना चाहिए कि कृष्ण कथा का अमृत है भागवद्, जिसे पढ़कर कृष्ण के प्रति अथाह प्रेम उमड़ता है. वह इतनी प्यारी बातें कहते हैं अपने ग्वालबाल मित्रों से, गोपियों से, सखा उद्धव से और मित्र अर्जुन से कि बरबस उनपर प्यार आता है. वह सभी को निस्वार्थ भाव से प्रेम करते हैं बिना किसी प्रतिदान की आशा के, एकांतिक प्रेम ! और जो उन्हें प्रेम करता है उसे वह अभयदान देते है, वह उनके निकट आकर निर्भय हो जाता है. वह सम्पूर्ण प्रेम, ज्ञान और प्रेम के आगार हैं.... वास्तव में वह जो हैं उसकी कल्पना भी कर पाना हमारे लिये कठिन है. हम एक बार प्रेम से उनका नाम भी उच्चारित करते हैं तो हृदय में कैसी हिलोरें उमड़ती हैं. उनका नाम और वह अभिन्न हैं. वह भक्त की हर बात सुनते हैं, सारी छोटी-बड़ी कामनाएं उन पर उजागर हैं, सारी कमियों के वह साक्षी हैं, उसका प्रमाद व लापरवाही भी उनसे छिपी नहीं है और भक्त का प्रेम भी....
Sunday, August 21, 2011
जय श्री कृष्ण
कृष्णंवन्देजगद्गुरुं... कृष्ण सारे जगत के गुरु हैं. जहां कृष्ण हैं वहाँ श्री है. वे सहज हैं भीतर और बाहर एक से, युद्ध के मैदान में भी और सखाओं के साथ खेल में भी. भीतर की शुद्धता ही उन्हें सहज बनाती है. कृष्ण के प्रति श्रद्धा का भाव रखकर हम उस ज्ञान के अधिकारी बन सकते हैं, जो हमें दृढ निश्चयी बनाता है, समता सिखाता है. स्वयं को भुलाकर, अहम् त्याग कर जब हम कृष्ण के सम्मुख जाते हैं तो उनकी कृपा, जो सदा बरस ही रही है हमें भी मिलने लगती है, उनके सामने हमारी उपलब्धियों की कोई कीमत नहीं. यदि हमें मान चाहिए तो प्रभु के सम्मुख नहीं आना चाहिए. अहंकार को पोषणा नहीं है उसे तोडना है तभी हम कृष्ण के निकट आ सकते हैं.
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