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Wednesday, December 10, 2014

तुम्हीं हो बन्धु सखा तुम्हीं हो

जुलाई २००७ 
परमात्मा के नाम के सिवा सभी कुछ नश्वर है, इसका बोध होते ही सारा दृश्य बदल जाता है. अस्तित्त्व मुखर हो जाता है. ऐसा बोध आत्मा की गहराई से उपजता है. भीतर जो सत्य, आनंद का स्रोत है वहाँ से. जो चमत्कार कर सकता है, अभाव व प्रभाव से निकाल कर वह हमें स्वभाव में लाता है. सहज ही अकर्ता भाव सधने लगता है. परमात्मा हमारा सुहृदय है, सखा है, आत्मीय है, मीत है और ऐसा हितैषी जो कभी राह से भटकने नहीं देता. उससे विमुखता ही असजगता है. असजग होकर हम अपने स्रोत से दूर हो जाते हैं, आत्मा के पद से हट जाते हैं. ऐसा होते ही दुःख हमें घेर लेता है.

Sunday, December 25, 2011

परम आकाश


अगस्त २००२ 
वह परमात्मा जिसे लोग मंदिरों में तलाशते हैं, मन के मंदिर में ही मिल सकता है. भक्त को वह अपने हृदय में प्रतीत होता है. वह भक्त को निर्देश देता है, प्रेम देता है, आनंद और ज्ञान देता है. उच्च मनोभूमि पर स्थापित करता है, द्वन्दों से परे ले जाता है, आकाश की तरह मुक्त वह परमात्मा स्वयं सच्चिदानंद है, उसकी अनुभूति होने के बाद संसार का सुख मृगतृष्णा की भांति प्रतीत होता है. भीतर का सुख शाश्वत है, असीम है, अपरिवर्तनीय है. जहाँ कोई रुकावट नहीं, कोई उहापोह नहीं, कोई चाह नहीं, कोई अपेक्षा नहीं. वह शाहों का शाह जब दिल में बसता हो तो और कुछ चाहने योग्य बचता भी कहाँ है. वह जिसका मीत बना हो उसका शोक सदा के लिये हर लिया जाता है. जीवन उत्सव बन जाता है. भक्ति, प्रेम और ज्ञान ही जीवन को तृप्त कर सकते हैं, इसका पता चलने पर अपनी कमियों को दूर करने की समझ भी बढ़ती है और संकल्प का बल भी मिलता है. एक छोटी सी किरण भी यदि उस परम की भीतर मिल जाये तो राह मिल जाती है.



Tuesday, October 25, 2011

एकै साधे सब सधे


जून २००२ 

कबिरा इस जग आये के अनेक बनाये मीत
जिन बांधी इक सँग प्रीत वही रहा निश्चिन्त
उस एक से जब लौ लग जाती है तो जीवन फूल की तरह हल्का हो जाता है. हम रुई के फाहे की तरह गगन में उड़ने लगते हैं. वह एक इतना प्रिय है और इतना अपना कि दिल भर जाता है. उसकी कृपा असीम है. उसका बखान करना जितना कठिन है उतना सरल भी. एक शब्द में कहें तो वही प्रेम है. अंतर की गहराई में जो प्रेम है उसके लिये और सृष्टि के लिये... वह उसी का है. हमें वहीं जाना है जहाँ न राग है न द्वेष है, न संयोग न वियोग, न दिन न रात्रि, न अच्छा न बुरा. उस अद्भुत लोक में प्रवेश करने के लिये ध्यान की आवश्यकता है. ध्यान हमारे हृदय में भक्ति भाव ही उत्पन्न नहीं करता है, हमें ईश्वर का निमित्त बनाता है. हम इस महासृष्टि में अपने योगदान को दे पाने में सक्षम होते हैं.