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Wednesday, May 28, 2014

तेरे हाथों सौंप दिया सब

मार्च २००६ 
जितना-जितना हम उस परम सत्ता के करीब होते जाते हैं, उससे घनिष्ठ नाता जोड़ते जाते हैं, जो सत्ता कण-कण में व्याप्त है. हम देह की सीमाओं से पार होते जाते हैं. कृत्य का अभिमान नहीं रहता. ज्यादा करने की चाह भी समाप्त हो जाती है. हमारे कर्म तब अपने आप होते प्रतीत होते हैं, वह परमात्मा जैसे हमें अपने हाथों में नचा रहा हो. हम निर्भार होकर जीने लगते हैं. पदार्थों के प्रति भाव भी बदल जाता है, पदार्थ हमारे उपयोग में आयें बस वहीं तक उनका महत्व है, वे हमारे अहंकार को बढ़ाएं तो उनका त्यागना ही उचित है. भीतर एक सहजता का जन्म होता है. यह कितना अद्भुत अनुभव है. एक अनोखी शांति और स्थिरता भीतर बनी रहती है. हम उस स्रोत से जुड़ जाते हैं जहाँ से आए हैं.

Monday, May 26, 2014

तेरी शरण में आये हैं हम

मार्च 2006
प्रार्थना में बहुत शक्ति है, पग-पग पर प्रार्थना हमें सहारा देती है. उसका स्मरण भीतर चलता रहे तो यह अपने आप में ध्यान का ही एक रूप है. हम उसे ही अपने अंतर की कथा-व्यथा सुना सकते हैं, वह दीखता नहीं पर उसकी हजार आँखें हैं, जैसे दरवाजे पर चिक लगी हो तो बाहर के लोग भीतर नहीं देख सकते पर भीतर से बाहर देखा जा सकता है, वैसे ही वह हमारे भीतर से सब कुछ देख रहा है पर हम ही उसे नहीं देख पाते. प्रार्थना में हमारा अहं गल जाता है. शरण में आने का सुख सारे सुखों से बड़ा है, उसमें कोई मिलावट नहीं, कोई दुःख भी नहीं. शुद्ध ज्ञान में स्थित होकर ही हम शरण में आते है, शरण का अर्थ है सत्य के प्रति समर्पित होना, जो सही है उसे ही चाहना, जो कल्याणकारी है उसकी ही कामना करना. तब कोई बोझ नहीं रहता, कोई डर भी नहीं सताता, भक्त को पूर्ण विश्वास होता है जिसकी शरण में वह आया है, वह सर्व-समर्थ है, उसे तब अपने सुख-दुःख की परवाह नहीं रह जाती, वह तो उसकी रजा में ही अपनी रजा मानता है.

Friday, March 2, 2012

श्रद्धा मुक्ति का द्वार है



श्रद्धावान लभते ज्ञानं ! ईश्वर में, सत्य में, शुभ में, श्रद्धा हो तो वह सदा वर्तमान है. हमारे निकट है. साधना में उससे अभिन्नता का अनुभव हमारे मन को फूल सा खिला देता है. हमारे आसपास भी धीरे-धीरे परिवर्तन शुरू हो जाता है. वास्तविक जीवन तभी शुरू होता है जब हम अपने भीतर के आनंद को पा लेते हैं., स्वयं की प्रसन्नता के लिये जगत के मोहताज नहीं रहते, पूर्ण मुक्त हो जाते हैं. एकांत में रहने से जो भय भीत नहीं है, मनसा. वाचा, कर्मणा जो सदमार्ग पर स्थित है. अपने सुख-दुःख के लिये जो स्वयं उत्तरदायी है वही साधना के पथ पर आगे बढ़ सकता है.

Thursday, February 23, 2012

कैसे कैसे अनुभव


जनवरी २००३ 
राम विश्राम में है ऐसा संत जन कहते हैं, सामान्य नींद की जगह शवासन करें तो शरीर में उठने वाली छोटी से छोटी संवेदना को भी महसूस किया जा सकता है. यह एक सुखद अनुभव है. देह में प्राण ऊर्जा का विचरण भी महसूस किया जा सकता है. त्राटक में स्टील के ग्लास के किनारों को कई परतों में बंटते देखना और उस पर प्रकाश के सात रंगों की चमक भी अनोखा अनुभव है. फर्श या दीवार की सतह का आकर्षक रूप धारण करना, प्रकाश के एक बिंदु का विस्तृत होते जाना, एकटक देखने पर किसी वस्तु का हिलना तथा आँखें बंद करके भी टीवी स्क्रीन दिखाई देना और कानों में एक मधुर ध्वनि का निरंतर सुनाई देना यह सारे अनुभव एक साधक को इस जगत में होते हुए भी इस जगत से परे रखते हैं. यह जगत जैसा हमें दिखाई देता है वैसा ही नहीं भी हो सकता. यह हमारी नजर पर ही निर्भर करता है. हमारा मन ही इस जगत की उत्पत्ति का कारण है. 

Wednesday, February 22, 2012

चेतनत्व बिखरा चहुँ ओर


दिसंबर २००२ 
कभी किसी डाली से लगे फूल को सहला कर देखें तो लगता है वह हमारे स्पर्श को महसूस कर रहा है. जीवन कितना अद्भुत है...हर वस्तु में चेतना है, एक ही चेतना का सभी में स्पंदन है. हम वस्तुओं को उनके वास्तविक स्वरूप में देखें तो सब कुछ कितना सुंदर है. एक नंग-धडंग, मिट्टी से सना  अनपढ़ बच्चा  भी अपने भीतर वही चेतना छिपाए है, असीम सम्भावनाओं का भंडार...हमारा शरीर, मन, बुद्धि भले ही सीमा से बंधे हों, पर हमारी आत्मा यानि जो हम वास्तव में हैं, वह अपरिमित है. उसके सान्निध्य में हम भी असीम हैं, जीवन मुक्त, चिन्मय और शाश्वत !

Tuesday, February 21, 2012

श्रद्धा ही मंजिल है


दिसम्बर २००२ 
हमारी कथनी और करनी में अंतर जितना अधिक होगा मन में संशय का कुहरा भी उसी अनुपात में बढ़ेगा. कोई घटना कितनी देर तक मन पर प्रभाव डालती रहती है इससे भी दम्भ के घने होने का पता चलता है. ऐसे में कोई सहायता कर सकता है तो वह है श्रद्धा...वही इस संशय को दूर कर सकती है. वही हमें अपने स्वभाव में टिकाती है तब दिखावे या आडम्बर की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती. तब प्रार्थना उठने से पूर्व ही सुन ली जाती है. जीवन का लक्ष्य एक हो, राह एक हो, मन में दृढ़ता हो, तभी मंजिल मिलेगी. अंतर में प्रेम का झरना सूखने न पाए, रिसता रहे, बूंद-बूंद ही सही, संवेदना भीगी रहे, वाणी में रुक्षता न आये न आँखों में परायापन, प्रेम सभी पर समरस रूप से बरसे तब ही मानना चाहिए कि श्रद्धा अटूट है. 

Monday, February 20, 2012

वैराग्य महासुख है


दिसम्बर २००२ 
मन में जब तक दरिद्रता रहेगी, अभाव रहेगा तो जीवन में समृद्धि कैसे आयेगी. मन में समृद्धि का बीज बोना है तब ही जीवन में भी पूर्णता का अनुभव होगा. तृष्णा जब समाप्त होगी तभी वैराग्य टिकेगा. वैराग्य ही हमें दृढ़ता प्रदान करता है, स्वतंत्र व पूर्ण बनाता है. मन तब तृप्त हो जाता है. जो कुछ हमें मिला है उसका सम्मान करते हुए तृप्ति का अहसास बना रहे तभी वैराग्य जीवन में खिलता है. अपने ‘स्व’ का विस्तार भी तब होता है. परम से नाता जुड़ता है, हर वस्तु, यह सम्पूर्ण सृष्टि हमारा कर्मक्षेत्र बन जाती है, पर उस में बंधन नहीं है एक अलिप्तता है, बाहर कार्य करते हुए भी भीतर से बिल्कुल अछूते रहने की कला तभी आती है.

Thursday, February 16, 2012

मन लौट के भीतर आये


दिसम्बर २०१२ 
जिसे अपने आप का ज्ञान नहीं है, उसे ही अभिमान, ममता, लोभ, मोह आदि के कारण दुःख होते हैं. मन का यह नाटक तब तक चलता रहता है जब तक हम अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित नहीं होते. हमारा अहं तभी तक है जब तक हम स्वयं को शरीर से भिन्न व मन से अलग नहीं देखते. ऐसा तभी संभव है जब हम स्वयं के कण-कण से परिचित हों, सूक्ष्म परिवर्तनों के प्रति सजग रहें. कब क्या मन में उठ रहा है इसे जानते रहें. जब सजगता खो जाती है तब संसार मन पर अपना अधिकार जमा लेता है. जब सजग रहते हैं तब भीतर से एक रस की धार सदा बहती रहती है उसमें आप्लावित रहते हैं. मन बाहर भी जुड़ा हुआ है और भीतर भी बुद्धि से जुड़ा है. जब वह भीतर लौट आता है नमः हो जाता है.

Tuesday, January 31, 2012

परम खजाना


नवंबर २००२ 
रामरस के बिना हृदय की तृष्णा नहीं मिटती. परम प्रेम हमारा स्वाभाविक गुण है, उससे च्युत होकर हम संसार में आसक्त होते हैं. कृष्ण का सौंदर्य, शिव की सौम्यता, और राम का रस जिसे मिला हो वही धनवान है. जिस प्रकार धरती में सभी फल, फूल व वनस्पतियों का रस, गंध व रूप छिपा है वैसे ही उस परमात्मा में सभी सदगुण, प्रेम, बल, ओज, आनंद व ज्ञान छिपा है, संसार में जो कुछ भी शुभ है वह उस में है तो यदि हम स्वयं को उससे जोड़ते हैं, प्रेम का संबंध बनाते हैं तो वह हमें इस शुभ से मालामाल कर देता है, दुःख हमसे स्वयं ही दूर भागता है, मन स्थिर होता है. धीरे धीरे हृदय समाधिस्थ होते हैं. एक बार उसकी ओर यात्रा शुरू कर दी हो तो पीछे लौटना नहीं होता...दिव्य आनंद हमारे साथ होता है और तब यह जीवन एक उत्सव बन जाता है.

वह कौन है


परमात्मा हमारा जीवन धन है, हमारा सर्वस्व, हमारे अस्तित्त्व का प्रमाण, वह हमारा हितैषी है. शुभचिंतक और सुहृदयी. वह हमारी अंतरात्मा है. भक्त के पोर-पोर में उसका नाम अंकित है, उसके प्रति वह अपने भीतर इतना प्रेम उमड़ते महसूस करता है कि उसकी गूंज तक उसे सुनाई पड़ती है. उसका नाम लेते ही आँखें नम हो जाती हैं. वह प्रियतम है, अनुपम है और मधुमय है. वही जानने योग्य है. एक उसी की सत्ता कण-कण में व्याप्त है, वही चैतन्य हर जड़-चेतन में समाया है. उसी का प्रकाश सूर्य आदि नक्षत्रों में है और उसी का प्रकाश है जो आँखें बंद करते ही उसे घेर लेता है. 

Monday, January 30, 2012

परम पुकारे अपनी ओर


अक्तूबर २००२ 
यह जगत प्रतिपल बदल रहा है. मनुष्य किसी भी स्थिति में क्यों न हो हँसी और खुशी उसका साथ नहीं छोड़ती जैसे दुःख उसका चिर साथी है. दोनों आते-जाते रहेंगे भिन्न भिन्न रूपों में, पर एक तो वही है अपना आप, जिसे न दुःख व्याप्ता है न सुख, जो प्रेम है, आनंद है, और मधुमय है, रसमय  है. जो जीवन को अर्थ देता है, एक चुनौती देता है, लक्ष्य देता है. जो बाहें फैलाये खड़ा है हमें हर पल पुकारता है. जो अपना दिव्य स्वरूप धारे हमें अपनी ओर आकर्षित करता है उसका जैसा बनने की हमें प्रेरणा देता है. वह हमें खुद सा बनाना चाहता है बल्कि उसने हमने खुद सा बनाया ही था, निष्पाप, निर्दोष..पर हम ही उससे दूर चले गये और जगत नाम की उस वस्तु को थामने लगे जो हाथ से मुट्ठी से रेत की तरह फिसलती जाती हैं, हमारा तन जो दिन रात जरा की ओर बढ़ रहा है, कोई न कोई व्याधि इसे सताती ही है, हमारा मन जो सदा किसी न किसी ताप में जलता ही रहता है. और वह शीतल फुहार सा, अलमस्त झरने सा, प्रेम का सोता हमारे भीतर ही कहीं बह रहा है उससे हम अनजान ही बने रहते हैं. 

Friday, January 27, 2012

जीवन उत्सव है


पत्रं पुष्पं फलं तोयं......श्रद्धा रूपी पत्र तथा मन रूपी पुष्प, हमारे कर्मों का फल रूपी फल और अपने अंतर का प्रेम भरा अश्रुजल यही तो हमें कृष्ण को अर्पित करना है. कृष्ण प्रेम का दूसरा नाम है, उसे प्रेम करो तो वह हजार गुणा करके लौटाता है. उसकी ओर जो एक बार चल दे उसे वह भटकने नहीं देता, किसी न किसी तरह अपनी ओर बुला ही लेता है. उसके सम्मुख जाते ही अपना सब कुछ उसे अर्पित करने का मन होता है बल्कि अपना कुछ है ही नहीं यह भाव उदित होता है. और तब यह भी पता चलता है कि हमारे भीतर ही ज्ञान है, प्रेम है, शक्ति है, ऊर्जा है, साहस है....सब कुछ अकारण है जैसे ईश्वर के पास इन सबका भंडार है...अकारण, वह लुटा रहा है. वही भीतर से सामर्थ्य देता है, प्रेरणा देता है, निर्देश देता है. जीवन तब उत्सव बन जाता है.  

Thursday, January 26, 2012

पायी संगत जो संतन की पायी पूंजी अपने मन की


अक्तूबर २००२ 
साधक की एक अनुभूति ऐसी भी होती है जब वह कह उठता है...“पायी संगत जो संतन की पायी पूंजी अपने मन की” सदगुरु ने हमें स्वयं से मिला दिया है और अब हमें स्वयं से प्रेम हो गया है. पहले स्वयं से आँखें मिलाते से डरते थे और दूसरों से भी, अब हर जगह वही दिखता है तो डर किसे और किसका? हमने स्वयं ही अपने लिये बाधाएं खड़ी की हुई थीं और ज्ञान से इन बाधाओं का अंत होता नजर आता है. तन, मन व बुद्धि को स्वयं से अलग देखने की कला ने हमारे सच्चे स्वरूप को उजागर कर दिया है. बुद्धि को पृथक करते ही वह आग्रह तज देती है, मन को तज देने से वह खाली हो जाता है और जैसे खाली घट में जल भर जाता है, खाली मन उस परम की शांति से स्वतः ही भर जाता है. तन को पृथक देखने पर उसकी पीड़ा छूती नहीं उस तरह जैसे पहले छूती थी. कितना अद्भुत है यह ज्ञान.  

Tuesday, January 24, 2012

मध्य मार्ग ही उत्तम है


अक्तूबर २०१२ 
कर्म और ज्ञान दोनों में समन्वय होना चाहिए. प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों के मध्य का मार्ग अपनाकर ही हम योग साधना कर सकते हैं. सदगुरु न तो हमें भोग की ओर ले जाते हैं न त्याग की ओर, वे हमें त्याग करते हुए भोग की बात बताते हैं. वे जटिल प्रश्नों का कितना सरल हल बताते हैं. भक्ति व ज्ञान का समन्वय हो तो हम अहंकार व अकर्मण्यता दोनों से मुक्त रहेंगे. भक्ति में हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं, ज्ञान होने पर स्वयं को आत्मा जानकर हम उससे समानता का अनुभव करते हैं. वह और हम दो नहीं हैं, जुदा नहीं हैं, सदा से एक हैं, दोनों अविनाशी, शाश्वत, ज्ञान व प्रेम स्वरूप. उसे खोजने कहीं दूर नहीं जाना है. पहले भक्ति के द्वारा हृदय को शुद्ध करना है, चित्त को निर्मल करना है फिर वह हमें उसी तरह प्राप्त होगा जैसे हवा और धूप...सहज ही. एक एक कर दोषों को निकालने की बजाय एक ही बात करनी है उसका स्मरण... प्रतिपल वह याद रहे तो हम गलत कार्य की ओर उन्मुख ही न हों. 

Monday, January 23, 2012

ईश्वर अंश जीव अविनाशी


परम की अनुभूति अंतर को अनंत सुख से ओतप्रोत कर देती है, और परम तक ले जाने वाला कोई सदगुरु ही हो सकता है. सर्व भाव से उस सच्चिदानंद की शरण में जाने की विधि वही सिखाते हैं. हम देह नहीं हैं, देही हैं, जिसे शास्त्रों में जीव कहते हैं. जीव परमात्मा का अंश है, उसके लक्षण भी वही हैं जो परमात्मा के हैं. वह भी शाश्वत, चेतन तथा आनन्दस्वरूप है. जिसका भान होने पर सारा का सारा विषाद जाने कहाँ चला जाता है. 

Sunday, January 22, 2012

कर्म में ही आनंद है फल में नहीं


जब हम कोई कार्य बिना किसी आकांक्षा के करते हैं, हमें कर्म करने मात्र में आनंद मिलता है,  हमारा मन शुद्ध होता जाता है. शुद्ध मन में शांति का वास होता है और शांति से ही सुख मिलता है. सुख यानि मोक्ष या निर्वाण इसी जन्म में मिल जाता है. यही ब्राह्मी स्थिति है, और एक बार इस स्थिति में टिकना आ जाता है तो साधक कभी इससे च्युत नहीं होता. ईश्वर अब उसका आधार बन जाते हैं. ईश्वर अर्थात अखंड सात्विक आनंद. इसी को कृष्ण कर्मयोग कहते हैं, उनकी कृपा से ही यह निष्कामता आती है. फल की अपेक्षा जब तक रहेगी तब तक उनकी ओर नजर न जायेगी. ईश्वर की निकटता का अनुभव निर्दोष भाव से अपनी सीमाओं का ध्यान रखते हुए उसके पास जाकर हो सकता है. प्रकृति के पाश से, तीन गुणों के बंधन से, माया के जाल से अर्थात दुःख से यदि बचना है तो उनकी शरण में जाना होगा, अर्थात मन में सम भाव रखकर स्वीकार भाव से जीना सीखना होगा.

Friday, January 20, 2012

दीनबन्धु दीनानाथ मेरी डोरी तेरे हाथ


प्रेम किये बिना कोई रह नहीं सकता तो क्यों न हम उस अनंत अविनाशी से ही प्रेम करें. विवेक जगाकर हम प्रेम के मूल तक पहुँच सकते हैं. सागर में झाग, लहर, भंवर, बुलबुले पानी के आधार पर टिके हैं, यदि लहर कहे मैं सागर को नहीं जानती तो कैसा विरोधाभास लगेगा, वैसे ही मन, बुद्धि व भावना सभी उसी आत्मा के आधार पर टिके हैं. मन जब उसमें डूब कर ऊपर आता है तो आत्मिक सुख का अनुभव करता है, इसी को धर्म मेघ समाधि कहते हैं जैसे मेघ हमें भिगो डालता है, वैसे ही आनंद हमें भिगो देता है. हम उस आनंद के खंड हैं, पर वह तो अखंड है तो हम सदा सर्वदा उससे संयुक्त ही हैं. वह तो सदा हमें निहार ही रहा है. हमारे प्रेम से भी कई गुना अधिक है उसका प्रेम. 

Wednesday, January 18, 2012

सत्य और असत्य


अक्तूबर २००२ 
सत्य एक है, सत्य ही धर्म है, सत्य ही वह पथ है जिस पर चल कर सत्य का अनुभव होता है. हमारे भीतर जो हलचल असत्य बोलने पर होती है वह सत्य की ही खबर देती है. कितनी ही बार हम बिना झिझके असत्य बोल जाते हैं, कभी सहज भाव से कभी विनोद में ही, कितना भी निर्दोष हो हमारा असत्य सत्य पर ही एक आवरण डाल रहा होता है. जितना-जितना हम इस बात को स्वीकार करते हैं, सत्य भी स्पष्ट होता जाता है और एक दिन असत्य झर जाता है. साक्षी भाव जब सधता है तब जो भी भीतर घटता हो उसे सहज भाव से देखते हुए ही हम विकार से मुक्त हो जाते हैं. सजग होकर आखिर कितनी देर तक हम पथ से दूर रह सकते हैं.

Tuesday, January 17, 2012

परम बुलाए अपनी ओर


अक्तूबर २००२ 
जैसे दुःख अपने आप आता है, मांगना नहीं पड़ता, वैसे ही सुख भी स्वयंमेव ही आयेगा. हमें अनासक्त रहकर दोनों से ऊपर उठना है. सुख में आसक्ति भी दुःख का कारण है. यह जगत ईश्वर का क्रीडांगन ही तो है, हमें उसके खेल में सहयोगी होना है. हमारे सारे कार्य उसकी याद में हों. उसकी  स्मृति वैसे ही बनी रहे जैसे अपना आप कभी नहीं भूलता. एक दिन वह स्वयं ही अपनी उपस्थिति का अहसास कराएगा. वह भी तो हमसे मिलने को आतुर है. जितनी निकटता की कामना हम करते हैं, वह उससे भी निकट है. स्वाध्याय हमारे मन को अनावृत करता है. हम तृप्ति का अनुभव तभी करते हैं जब भीतर संतोष जगता है, आनंद व ज्ञान का स्रोत वह परमात्मा ही हमें यह संतोष प्रदान करता है. हम उनके अंश हैं और उस आनंद व ज्ञान के भी भागी हैं, हमारा यह स्वाभाविक अधिकार है. हमने स्वयं ही उससे खुद को वंचित कर रखा है. जो हमारा है, वह तो हमें सहज प्राप्य है ही, बस दृष्टि उस ओर करने की देर है. वह हमारी प्रतीक्षा कर रहा है. 

Monday, January 16, 2012

श्रद्धावान लभते ज्ञानम


अक्तूबर २००२ 
मन श्रद्धा से भरा हो तभी विश्वास भी टिकता है. वही विश्वास हमें कैसी भी परिस्थिति में डिगने नहीं देता. परमात्मा अथवा सदगुरु का स्मरण भी हृदय को कैसी शीतलता पहुंचाता है. वे साक्षी भाव में रहते हुए जगत को देखते हैं, उससे लिप्त नहीं होते. उन्हें कोई कामना नहीं सताती और न किसी वस्तु के खो जाने का भय रहता है. आत्मा से बढ़कर वे किसी को नही जानते और आत्मा को न खोया जा सकता है न पाया जा सकता है, उसकी मात्र प्रतीति की जा सकती है, जीवनमुक्त आत्म भाव में रहकर सहजता का जीवन जीते हैं. वे हमें भी उसी पथ पर चलने की प्रेरणा देते हैं.