दिसम्बर २००२
हमारी कथनी और करनी में अंतर जितना अधिक होगा मन में संशय का कुहरा भी उसी अनुपात में बढ़ेगा. कोई घटना कितनी देर तक मन पर प्रभाव डालती रहती है इससे भी दम्भ के घने होने का पता चलता है. ऐसे में कोई सहायता कर सकता है तो वह है श्रद्धा...वही इस संशय को दूर कर सकती है. वही हमें अपने स्वभाव में टिकाती है तब दिखावे या आडम्बर की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती. तब प्रार्थना उठने से पूर्व ही सुन ली जाती है. जीवन का लक्ष्य एक हो, राह एक हो, मन में दृढ़ता हो, तभी मंजिल मिलेगी. अंतर में प्रेम का झरना सूखने न पाए, रिसता रहे, बूंद-बूंद ही सही, संवेदना भीगी रहे, वाणी में रुक्षता न आये न आँखों में परायापन, प्रेम सभी पर समरस रूप से बरसे तब ही मानना चाहिए कि श्रद्धा अटूट है.