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Tuesday, February 21, 2012

श्रद्धा ही मंजिल है


दिसम्बर २००२ 
हमारी कथनी और करनी में अंतर जितना अधिक होगा मन में संशय का कुहरा भी उसी अनुपात में बढ़ेगा. कोई घटना कितनी देर तक मन पर प्रभाव डालती रहती है इससे भी दम्भ के घने होने का पता चलता है. ऐसे में कोई सहायता कर सकता है तो वह है श्रद्धा...वही इस संशय को दूर कर सकती है. वही हमें अपने स्वभाव में टिकाती है तब दिखावे या आडम्बर की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती. तब प्रार्थना उठने से पूर्व ही सुन ली जाती है. जीवन का लक्ष्य एक हो, राह एक हो, मन में दृढ़ता हो, तभी मंजिल मिलेगी. अंतर में प्रेम का झरना सूखने न पाए, रिसता रहे, बूंद-बूंद ही सही, संवेदना भीगी रहे, वाणी में रुक्षता न आये न आँखों में परायापन, प्रेम सभी पर समरस रूप से बरसे तब ही मानना चाहिए कि श्रद्धा अटूट है. 

Friday, July 15, 2011

यथार्थ और आदर्श

जनवरी २००१ 
मानव के पास भाव, विचार, और विवेक का बल है, लेकिन वह उसका सदुपयोग नहीं कर पाता. अपने बाहरी व्यक्तित्व को सजाने- संवारने का प्रयत्न तो करता है किन्तु भावनात्मक, बौद्धिक और आत्मिक व्यक्तित्व को निखारने का प्रयास नहीं करता, सो आडम्बर और पाखंड पूर्ण जीवन जीता है. भीतर से हम जितना सत्य के निकट होंगे, यथार्थ का सामना करेंगे, वास्तविकता को पहचानेगें उतना ही आंतरिक व्यक्तित्व व्यक्त होगा, अन्यथा दोहरी जिंदगी जीने को विवश होंगे. हमें अपने आदर्शों को  मूर्त रूप देना होगा तथा उसे जीवन में यथासम्भव उतरना होगा. सच्चा आनंद, मन की शांति का अनुभव हमें तभी होता है जब हम आदर्शों के निकट होते हैं.